Monday, 27 January 2014

जीवन

जीवन 
दोनों के पास है
एक  है इससे क्षुब्ध
दूसरा है इससे मुग्ध
एक पर है भार बनकर बैठा
दूजा इसपर बैठकर है ऐंठा। 
जीवन 
दोनों के पास है,
एक ही सिक्के के,
दो पहलूँ कि तरह। ।
जीवन 
एक महल में भी कराहता है 
तो कहीं फूंस के छत के नीचे दुलारता है। 
कोई अमानत मान इसे संभाल लेता 
तो दूजा तक़दीर के नाम पर इसे झेलता। 
जीवन 
दोनों के पास है 
एक ही मयखाने के 
भरे हुए जाम और टूटे पैमाने की तरह। । 
जीवन 
मुग्ध सिद्धार्थ जाने क्यों
हो गया इससे अतृप्त,
अतृप्त न जाने कितने
होना चाहते इसमें तृप्त। 
जीवन 
दोनों के पास है ,
एक ही नदी के 
बहती धार और पास में पड़े रेत की तरह। ।
जीवन 
शीतल बयार है यहाँ
वहाँ चैत की दोपहरी,
वो ठहरना चाहे कुछ पल 
जबकि दूजा बीते ये घडी। 
जीवन 
दोनों के पास है ,
एक ही पेड़ के 
खिले फूल और काँटों की तरह। । 
एक ही नाम के 
कितने मायने  है ,
बदरंग से रंगीन 
अलग-अलग आयने है, 
लेकिन जीवन अजीब है 
बस गुजरती है जैसे घड़ी की  टिक-टिक। 
उसका किसी से 
न कोई मोह न माया है ,
वो तो गतिमान है उसी राहों पर 
जिसने उसे जैसा मन में सजाया है। । 

Sunday, 26 January 2014

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ

हर वर्ष जब दिन ये आता करते सब ये प्रण,
बदलेंगे हम देश का भाग्य देकर तन-मन-धन। ।
किन्तु इसके बाद फिर बिसरा देते सब  भाव,
तब तो  वर्षो बाद भी नहीं बहुत बदलाव। ।
चिंगारी साम्प्रदायिकता की जो सैतालिस में भड़की
आज तलक है बुझी कहाँ रह-रह कर है धधकी। ।
जात-पात के नाम पे करते बड़ी-बड़ी जाप
किन्तु फिर भी जाने क्यों नहीं मिटा ये श्राप। ।
गरीबी का हो उन्मूलन गाते सब ये गान
पर भूखो न जाने कितने त्याग दिये है प्राण। ।
इतने वर्षों बाद भी ऐसे है हालात 
हो कोई भी, गण हम, चिंता की ये बात।।
चढ़ शूली जो सपना देखे आजादी के परवाने 
बदले हम तस्वीरे जिससे व्यर्थ न जाए बलिदाने। । 
बीति ताहि बिसार के अब आगे कि सोंचे 
विश्व गुरु हो पुनःप्रतिष्ठापित आओ कर्मों से इसे सींचे। । 

------------सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ  --------------- 

Wednesday, 22 January 2014

क्षुधा


धड़कने धड़कती है
पर कोई शोर नहीं होता
रेंगते से जमीं पर
जैसे पाँव के नीचे  से
जीवन  निकल रहा ।
यहाँ ये किसका वास है। ।  
खुद से ही 
रोज का संघर्ष
देखते है जिंदगी जीतती है
या हार जाये भी तो 
जीत का है भान करता ।
ये किसका ऐसा अहसास है। ।  
प्रारब्ध का बोध देती 
तृष्कृत रेखा से पार 
समतल धरा के ऊपर 
अदृश्य कितनी गहरी ये खाई ।  
किसके परिश्रम का ये  सार है  । ।
अनवरत ये चल रहा 
बंटा हुआ  ह्रदय कपाट 
शुष्कता से अब तक सोखता 
जाने कैसे है पनपा ये  अतृप्त विचार।  
कैसे बुझेगी क्षुधा किसका ये भार है। । 

Monday, 20 January 2014

एक किसान

चित्र;गूगल से
हर समय देखता उसके तन पर
बस एक ही कपडा।
मैं  किंचित चिंतित हो पूछता जो
वो कहता -
हर मौसम से है उसका
रिश्ता गहरा।
बारिस के  मौसम से
बदन की गंदगी धूल जाती है,
मौसम कि गर्मी से ज्यादा तो
पेट कि अगन झुलसाती है,
जुए से जुते बस चलते है,
फिर सर्दी में भी बदन दहकते है। 
फिर मैंने पूछा -
क्यों शाम होते ही
यूँ बिस्तर पे चले जाते।
वो कहता -
क्या करूँ
मेरा मित्र गाय-बैल ,चिड़ियों की चहचहाट
जो शाम के बाद साथ नहीं निभाते।
सुबह इतनी जल्दी जाग कर
क्या करना है
वो कहता -
घूमते है हरि ब्रह्म मुहूर्त में
बस उनसे ही मिलना है।
क्यों इस खेत-खलिहान में
अब तक हो उलझे,
कुछ करो ऐसा की
आने वाला जिंदगी सुलझे।
मुस्कुरा कर वो कहता-
किसी को तो इस पुण्य का
लाभ कामना है
सब समझे कहाँ माँ के आँचल में 
ख़ुशी का जो खजाना है। 
बेसक अर्थ में जो 
इसका हिसाब लगाएगा ,
इन बातो को 
वो नहीं समझ पायेगा। 
जीने के लिए तो 
सभी कुछ करते है,
पर सिर्फ मुद्रा से ही 
पेट नहीं भरते है। 
हमारे उपज  से ही
सभी कि क्षुदा शांत होती है ,
तृष्णा फिर हजार 
सभी मनो में जगती है। 
वो दिन भी सोचो 
जब विभिन्न योग्यताओं  के ज्ञानी होंगे ,
पर खेती से अनभिज्ञ सभी प्राणी होंगे। 
कर्म तो कर्म है 
उसे करना है 
पर निजहित में 
परहित का भी 
ध्यान रखना है। 
सब इस भार को नहीं उठा पाते 
भगवान् इसलिए किसान बड़ी जतन से बनाते।।

Saturday, 18 January 2014

शिक्षा और दुरियाँ

घर के रास्ते
बस चौराहे पर मिलते थे ,
दुरी राहो की
दिल में नहीं बसते  थे।
मेरी माँ कभी
अम्मी जान हो जाती थी
तो कभी अम्मी माँ रूप में नजर आती थी।
नामों के अर्थ का
कही कोई सन्दर्भ न था ,
सेवई खाने से ज्यादा
ईद का कोई अर्थ न था।
उसका भी आरती के थाली पे
उतना ही अधिकार था ,
कोई और ले ले प्रसाद पहले
ये न उसे स्वीकार था।

पैरो कि जूती
बराबर बढ़ रही थी,
मौसम बदल कर लौट आता
किन्तु उम्र बस  बढ़ रही थी।
तालीम अब हम
दोनों पाने लगे ,
बहुत अंजानी बातें
अब समझ हमें आने लगे।
ज्यों-ज्यों ज्ञान अब बढ़ता गया,
खुद में दिल बहुत कुछ समझाता गया।

घर के रास्ते से ये चौराहे की दुरी
कई दसको से हम नापते रहे,
अब भी कुछ वहीँ खरे है ,
दसको पहले थे जहाँ से चले।
घर ,रास्ते सब वहीँ  पड़े है ,
पर नई जानकारियों ने नये अर्थ गढ़े है।
टकराते चौराहे पर
अब भी मिलते  है ,
पर ये शिक्षित होंठ
बड़े कष्ट से हिलते है।

किन्तु वो निरा मूरखता की बातें ,
जाने क्यों दिल को है अब भी सताते।
वो दिन भी आये जो बस ये ही पढ़े हम
मानव बस मानव नहीं कोई और धर्म। । 

Thursday, 16 January 2014

पन्नों में दबी चींख

गर्म हवा जब मचलती है ,
सारे पन्ने फरफरा उठते है। 
एक बार फिर लगता है कि  
जिंदगी ने जैसे आवाज दी। 
हम ढूंढते है ,खोजते है, 
गुम साये को 
आज में तलाशते है। 
ये पन्नों कि फरफराहट 
चींख सा लगता है। 
दबे शिला में  जैसे कोई घुँटता है।  
अक्षरों कि कालिख , 
स्याह सा छा जाता  है।  
धुंधली तस्वीर 
आँखों में कई उतर आता है।  
कितने ही साँसों का ब्यौरा 
बचपन कि किलकारी 
यौवन का सपना 
धड़कते दिल से इंतजार 
शौहर का करना 
बूढ़े नयनों में आभास 
समर्थ कंधो की 
जो छू ले नभ वैसे पंजों की। 
जो धड़कते थे , जाने कैसे रुक गए  
कारवां ख़ुशी के  
बीच सफ़र में ही छूट गए ।   
हर एक की कहानी 
इन पन्नों में सिमटी है ,
एक नहीं अनेकों  
रंग बिरंगे जिल्द में ये लिपटी है। 
सागवान के मोटे फ्रेमों में 
पारदर्शी शीशे के पीछे 
किसी कि साफगोई, 
या किसी चाटुकारिता कि किस्सागोई ,
न  जाने कितनी अलमारियाँ 
सजी-सजी सी पड़ी है। 
प्रगति और विचारवानो के बीच 
ड्राइंग रूम कि शोभा गढ़ी है। 
किन्तु बीच -बीच में 
न जाने कैसी हवा चलती है ,
इन आयोगों के रिपोर्ट में दबी 
आत्मा कहर उठती है। 
वो चीखतीं है ,चिल्लाती है ,
काश कुछ तो ऐसा करो  
की  इन पन्नों को 
रंगने कि जरुरत न पड़े। 
हम तो इन पन्नों में दबकर 
जिसके कारण अब तक मर रहे ,
उन कारणों से कोई 
अब न मरें। ।

Monday, 13 January 2014

संक्रांति का संक्रमण


कर्म में लीन 
पथ पर तल्लीन 
रवि के चक्र से बस इतना समझा 
दक्षिणायण  से  उत्तरायण में
प्रवेश कि बस  है महत्ता। । 

ग्रहों के कुचक्र हमसे ओझल  
जो उसे बाधित नहीं कर पाता  
मास दर मास न विचलित हो 
पुनः धरा में नव ऊर्जा का  
तब संचार है कर पाता। । 

हम उस प्रयास को 
भरपूर मान देते है 
लोहड़ी ,खिचड़ी ,पोंगल मना  
इस संक्रमण को 
किसी न किसी रूप में सम्मान देते है। । 

बिंदु और जगहवार
उसकी पहचान करते है  
बेवसी और ख़ामोशी से  
कल्पित हाथ हर पल   
जहाँ उठते और गिरते है।। 

कि आज का ये दिन 
पिछले मासों के कालिख भरी पसीनो को 
आज का स्नान धो देगा 
ये कटोरी में गिरते तिल के लड्डू 
इस आह में ख़ुशी भर देगा। । 

चलो संक्रांति के इस संक्रमण को 
इस विचार से मुक्त करे 
हाथ उठे न कि उसमे 
हम कुछ दान करे 
सतत प्रयास हो जो मानव सम्मान करें। ।

(सभी को मकर संक्रांति कि हार्दिक शुभकामना )

Saturday, 4 January 2014

कल क्या किया ?

                    आज सप्ताह का पहला दिन ऑफिस कि दिनचर्या से निपट कर सदा कि भांति मोटर साईकल से निकलने ही वाला था कि विभाग के अन्यत्र  ऑफिस के  एक परिचित कार्मिक  मिल गए। मित्र नहीं है किन्तु हमदोनों के व्यवहार मित्रवत सा ही है।कुसमय के मिलन ने  दिल में कोफ़्त चेहरे ने मुस्कान बिखेरा।  औपचारिकता निभाते हुए पूछा -और क्या हाल है?
उनमे औपचारिकता कम था बेतक्लुफ्फ़ अंदाज में जबाव मिला- बढ़िया
आप कैसे है ? -मैंने भी कहा ठीक-ठाक
अन्य सहकर्मी के अभिवादन में दृष्टि उनसे हटाते ही  बोले  -लगता है लेट हो रहे है श्रीमतीजी को समय दे के आये है क्या ?
कुछ सही होते हुए भी सहज दिखावा कर  मैंने कहा -नहीं ऐसी कोई बात नहीं ,समय क्या देना हर रोज तो यही समय होता है। गुजरते हुए सभी जल्दी में दिख रहे थे।
उन्होंने इसपर कोई खास ध्यान नहीं दिया।
 मेरी आँखों में झांककर पूछा -और कल क्या किया ?
बड़ा अजीब सा प्रश्न मै असहज हो कर पूछा -मैं कुछ समझा नहीं।
उन्होंने मेरी स्थिति भांप ली। अरे नहीं आप से मेरा मतलब था कि इस ऑफिस की दिनचर्या से कुछ अलग भी करते है या इसी में उलझ कर रह जाते है।
समय अपनी रफ़्तार से निकल रहा था मैं  मन ही मन उसे कोस रहा था। कम्बख्त निकलते समय क्यों मिल गया। मैंने मुस्कुराने का प्रयास करते हुए कहा- और कुछ काम करके नौकरी से निकलवाने का इरादा है क्या?
अरे नहीं -आप तो कुछ और ही समझ बैठे।
मैं बैठा कहाँ था अच्छा खासा जाने को तैयार खड़ा था किन्तु ये नाचीज कहाँ से आ टपका। मैंने बात समाप्त करने के इरादे से कहा -नहीं कल और कुछ नहीं किया और   मोटर साईकल की सीट पर बैठ गया। उन्होंने इसको नजर अंदाज करते कहा -नहीं मेरा मतलब था कि इस दिनचर्या से अलग और कुछ नहीं करते। लगता है ये खुन्नस निकाल रहा है और वेवजह इतनी सर्दी में मुझे विलम्व करा रहा है। थोड़ा चिढ़ते हुए मैंने कहा नहीं करते है न -बाजार जाता हूँ ,बच्चो को घर में पढ़ाता हूँ और कल भी ये सभी काम किये थे,आस-पास परिवार के साथ घूम भी आये इससे ज्यादा कुछ नहीं  ।
इसके अलावा और कुछ नहीं।काफी दिनों बाद उनसे मुलाकात हुई थी ,मन ही मन मैंने सोचा की लगता है सर्दी कि वजह से इनका दिमाग जम गया है। उल-जलूल बाते कर रहे है।
इसके अलावा और क्या काम होता है आकस्मिक छोड़ कर और वक्त किसी काम के लिए मिलता कहाँ । थोड़ी शुष्कता आवाज में आ गई।रोड लाईट ने रौशनी बिखेरना शुरू कर दिया।
अरे नहीं आप तो नाराज हो गए। मैं तो बस ऐसे ही पूछ बैठा-मुस्कुरा कर कहा।
पता नहीं क्यों पुनः   मोटर साईकल को स्टैंड पर लगा खड़ा हो गया।अपनी खींझ को दबाकर लगभग चिढ़ते हुए  पूछा -किन्तु आपने अभी तक नहीं बताया की आपने कल क्या किया ?
मुस्कुराते हुए कहा -आपने अब तक पूछा कहाँ। मैं झेंप गया। सिहरन शरीर में दस्तक देने लगा।
उन्होंने फिर कहा -बगल के बस्ती में अपने मुहल्ले से सारे पुराने कपडे इक्क्ठा कर बाटने गया था। सर्दी बहुत बढ  गई है न ,अभी फिर वही जाना है कल थैले छोड़ आया था  अगले हफ्ते फिर जरुरत पड़ेगी । यही तो एक अवकाश का दिन होता है अपने काम के अलावा थोडा बहुत प्रत्येक सप्ताह ये कुछ जरुरत मंदो के हिसाब से करने कि कोशिश करता हु,अपने परिवार के भी समय का ध्यान रखते हुए । ये काम तो चलता ही रहेगा और  दिन में चौबीस घंटे होते है ये तो सभी को पता है,उसी घंटो में से कुछ समय ऐसे लोगो के लिए निकालने की कोशिश करता हूँ । उनकी नजर मेरे चेहरे पर था और मेरा चेहरा सर्द। अच्छा अभी जरा बिलम्व हो रहा हूँ
उन्होंने मोटर साईकल चालू कर शुभ रात्रि कहा और चल दिए। पता नहीं क्यों मैं अनमयस्क सा उन्हें जाते हुए देख रहा  था। ……सर्दी से ठिठुरते  रोड किनारे के  कुछ चेहरे मेरे आँखों में परावर्तित होने लगे।  

Wednesday, 1 January 2014

नव वर्ष सबको मंगलमय हो।

नव वर्ष सबको मंगलमय हो

काल चक्र के  नियत क्रम में,
समां गए गत वर्ष अनंत  में,
क्या खोया क्या पाया हमने,
करे विवेचन स्व के मन में। ।

नए ओज उत्साह का भान कर,
स्व से विमुक्त हम का मान कर,
सम्पूर्ण धरा सुख से हो संवर्धित,
मनुज सकल को हो सब अर्पित। ।

घृणा ,क्रोध,सब असुर प्रवृति,
दिन-हिन् दारिद्र्य सी वृति,
बीते काल समाये गर्त में,
न हो छाया इसकी नव वर्ष में। ।

मंगल मन मंगल सी भावें,
ह्रदय मनोरथ और जो लावें,
कृपा दृष्टि सदा नभ से बरसे,
   न कोई वंचित उत्कर्ष मन हर्षे। । 

कटु सत्य यथार्थ भी कुछ है, 
नागफनी, कहीं चन्दन वृक्ष है ,
पर जिजीविषा हर जगह अटल है ,
घना तिमिर अरुणोदय पल है। । 

यश अपशय से ऊपर उठकर ,
सहज भाव आत्म सुख से भरकर, 
नव आलोक मुदित सब मन हो 
नव वर्ष सबको मंगलमय हो। । 

Saturday, 28 December 2013

आने वाला नव वर्ष

                                        अस्ताचलगामी रथ पर आरूढ़  काल  चक्र अपने पथ पर सतत गतियमान अंतिम परिदृश्य को नाट्य मंचन पर सफल सम्प्रेषण कर अतीत के गर्भ में वर्ष २०१३ लगभग  विलोपित होने के कगार पर  .......।  नूतन किशलय से सुस्सजित,स्वर्ण आवरण से विभूषित नव् नव वर्ष २०१४  के प्रथम नव किरण के सुस्वागत हेतु विहंग दल कलरव को तत्पर  ..........।   अनंत उम्मीदो के दामन संकुचित मन से थामे,हर्ष के अतिरेक संभानाओं के असीम द्वार के ऊपर चक्षु अधिरोपित किये ,श्याम परछाई को गीता मर्म समझ कर्म कि गांडीव पर नूतन प्रत्यंचा का श्रृंगार, सफलता के सोपान पर विजय पताका आशाओ के डोर के साथ नभ में बल खाने को मन आतुर … ………  । आशा से निराशा का संचार, अवसाद से विलगाव, चुके लक्ष्य को पुनः भेदने कि मंशा, सुप्त  ह्रदय में ओज का भान, नव का आगमन भविष्य के गर्भ में समाये मणिकाओ का वरण,क्षितिज के अंतिम बिंदु तक छू लेने की  आश का प्रस्फुटन  अनगिनत लोचन में परिलक्षित ………।  ।
                             देश और काल से इतर उन्नत मानव की  गरिमा मानव के द्वारा ही बिभिन्न द्वारों पर ठोकर खाती हिंसा कि घृणित विकृत सोच से कुचली हुई महसूस करती आँखें , जहाँ नवीन का प्रकाश और विगत के तम में न भेद लक्षित नहीं है और न ही इसे भेद कर पाने की इच्छा शक्ति , जो अपने भाग्य की अदृश्य रेखा को वर्त्तमान के धुंधलेपन में खोजने के अलावा कही शिकायत नहीं करते ,उन आँखों में नए अरुणोदय से नए विश्वास का सृजन हो   ……।       विकास के अवधारणा से  गर्वित  जन में , खुद को इस गौरवान्वित  मानव प्रतिष्ठा से वंचित के प्रति धारणा में सकारात्मक बदलाव उनके पारिस्थितिक और मानसिक उन्नत्ति में सहायक बने  वर्ष के रूप में  प्रतिष्ठित हो इस विश्वास  का संचार हो …....... …।  
                          इच्छाओ की अनंत विमाएं हर वक्त किसी न किसी कोण से जागृत होती है और काल की वृति अपने मनोयोग से गुजरती जिससे पहुँच अधूरा रह जाता  जो  अपूर्णता का भान कराती है.………।   शायद इसी अपूर्णता को भरने का क्रम ही जिंदगी है और नव दिवस का आगमन इस उत्साह को पुनः ह्रदय लक्ष्य कर उस अपूर्णता को पूर्ण करने का सांकेतिक परिघोषणा……   ।   आने वाले नव  किरण की  छटा बिखरते स्व-कल्याण से अभिमत मन में सम्पूर्ण लोक के प्रति समदृष्टि का संचार सदैव से समरूप में धरा पर बिखरती किरणो से हर किसी के ह्रदय में उत्त्पन्न हो.……… । नव प्रभात की  बेला विगत के स्याह अनुभव, अंतर्मन के पारस्परिक द्वन्द का दोहन कर असीम ऊष्मा का नव संचार करे........... । नव वर्ष २०१४ का आगमन सभी को  सांसारिक सुख से संवर्धित करने  के साथ-साथ नए आत्मिक उत्थान को प्रेरित  कर धरा के विभिन्न वर्गों में परस्पर आत्मिक सम्बन्धो के  संचार से वसुधैव कुटुंबकम्ब की दिशा में कोई नया सूत्र प्रतिपादित करेगा,  इसी आशा एवं विश्वास के साथ सभी को आने वाले  नव वर्ष की  हार्दिक शुभकामना  ………… 

Monday, 23 December 2013

तन्द्रा

कुछ-कुछ हवा सख्त थी 
बेचैन अनगिनत कुंठाओ से 
तन्द्रा टूट सी गई ,
मूक जिव्हाओ ने 
चोंगाओ से गठबंधन कर 
हाहाकार चहुँ ओर व्याप्त किया ,  
खरखराते पत्तियां टूट-टूट 
जलने को एक जगह इक्कठ्ठा हो आये , 
ओह अब ये जल पड़ेगा 
कोठीओ के झरोखों तक 
इसका ताप पहुचेगा ,
बड़े सूखे-सूखे से है ये पड़े 
चिंगारिओ को और क्या हवा देगा। 

गीले हरे लट -पट अधर 
नजर में श्रृंगाल सा सगल ,
क्या सपनो का बाज़ार 
थम सा गया है 
टूटी क्यों तन्द्रा आज 
कही कुछ कम सा गया है ,
सपनो को हकीकत से क्या लेना ,
क्या है इनका जो पाना चाहे 
सब छोड़ ये जलना चाहे ,
अब और सब्र न कराना है 
कोई नया ख्वाब दिखाना है।  

चलो एक बौछार छोड़ो 
गर्म संताप पे कुछ ठंडक घोलो ,
पत्तिया लड़खड़ाती -खड़खड़ाती 
कुछ नर्म झोंका से फरफराया 
उष्ण मन में कुछ शीत का झोंका पाया ,
पुनः तन्द्रा सा सबपे छाया है 
सब बदल गया ऐसा ही माहौल बनाया है ,
जब तक ये ठंडक है 
बैचैन होने का कोई कारण नहीं ,
तंद्रा फिर से छाने लगा है 
जगे-जगे से सोये 
फिर सब नजर आने लगा है। । 

Monday, 16 December 2013

मेरा गाँव और भूत का बसेरा

                     भूत बाल्यकाल से आकर्षित करता रहा है। देखने की जिजीविषा  उतनी  ही उत्कट होती थी  जितना की आज-कल दिल्ली के लोगो को दिल्ली में सरकार को देखने के लिए है।कुछ पत्रिकाओ में गल्प कथाये प्रकाशित होती थी,वैसे अभी भी होती है।जिसका विशेष रूचि के साथ अनवरत अध्यन होता था। कहानियो की अंतहीन श्रंखला वो देखने और सुनने की अभिलाषा संभवतः इन तथाकथिक बौधिक पुस्तको  में लगता तो ..?...तो पता नहीं क्या ?  भूत का अस्तित्व नहीं होता ,क्या विद्यालय की  किताबो में मन लगाने से भूतो की महिमा कम हो जाती ? शायद मन लगाने से कुछ विशेष उपाधी  मिल जाता   और उसी उपाधी को आधार बना कर  भूतो की तार्किक ब्याख्या करने  का प्रयास करता। पढ़ने वाले भी उसे किसी बुद्धिजीवी का लेख मान  उसपर कोई टिप्पणी  कर देते या कुछ नए विश्लेषण कर हमारे  भी दिल की उत्सुकता  को शांत करने में सहयोग देते। खैर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं तो उसकी चर्चा क्यों  ? चलिए  बात मै  भूतो की कर रहा था।भूत के विषय में जो भी सीमित जानकारी था उसके ग्रहण का ज्यादा  स्रोत उपनिषद के अवधारणा की  तरह  श्रवण विधि ही था। भूत वो जो बीत गया ,भूत वो जिसकी आत्मा बेवक्त साथ छोड़ गया, भूत वो जो आकस्मात  भगवान को प्यारे हो गए।उस तनय उम्र में यमराज  से  संशय  के वावजूद उनके प्लानिंग पर संदेह उठ ही जाता था जैसे अभी सरकार के प्लानिंग को लेकर मन में सन्देह रहता है।आकस्मिक अवकाश  की तरह यमराज  भी आकस्मिक लोगो को क्यों बुलाते है ? लगता है जैसे राजनीति कब कौन से गड़े  मुद्दे उखाड़ दे वैसे ही पता नहीं यमराज के दूत  भी कब किसको गाड़ दे।
                  उन दिनों  गाँव  में भूतो का काफी सम्मान था। उनके अस्तित्व पर कोई प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं था। बेसक दिन के उजाले में कोई नजर न आता हो किन्तु रात्रि काल के उसके कारनामे की चर्चा  दिन भर होती थी जैसे आजकल केजरीवाल के द्वारा दिल्ली में सरकार बनाने को लेकर हो रही है। कभी-कभी स्कूल के  कक्षा में भी व्याकरण के पढाई के दौरान कालो कि व्याख्या के साथ ही सब कुछ भूल कर भूतकाल के भूतों पर ध्यान चला जाता था। फिर मास्टरजी कि गिध्ध  दृष्टि में कैद होने के बाद ही वर्तमान  में आगमन हो पाता  था।  भगवान्  श्रीकृषण ने गीता में कैसे कहा की सभी मुझसे ही इस संसार में आते है और पुनः मुझमे ही समां जाते।किन्तु वो कौन सी आत्मा भटक कर भूत बन जाते है पता नहीं।लेकिन कक्षा में लेख लिखने के दौरान जब इस तथ्य को घोषित करता की देश कि आत्मा  गाँवो  में निवास करती है, तो भूतों का आवास फिर कहाँ होगा इस पर लेश मात्र भी संदेह नहीं था। 
                 उस समय भूतो का निवास  गाँव  के बाहर  डबरे के किसी किनारे पेडो के ऊपर हुआ करता था। शायद भूतो के सोसाईटी में कोठी पीपल का पेड़ हो,इसलिए ज्यादा भूत आशियाने के रूप में पीपल का पेड़ पसंद करते। क्योंकि ज्यादा से ज्यादा  भूत पीपल के ऊपर ही होते है ऐसा कहा जाता था। हमें उस समय तो समझ में नहीं आता कि  भूत का निवास  गाँव  के अंदर क्यों नहीं होता ,वो इंसानो से इतनी नफरत क्यों करते कि इतनी दूर जा बसते है ? जबकि हमारे घर के पीछे का बागान उनके लिए उपयुक्त था ऐसा हमें लगता था ,फिर सोचता कि इंसानी दुनिया से मुक्त होने के बाद वो पुनः कुसंगति में नहीं पड़ना चाहते होंगे।   उन्मुक्त बालपन गाँवो की गोधुली की बेला,उस वक्त बेफिक्र आनंद उत्सव का समय , घर के अन्दर रहने की बंदिश से मुक्त । बाहर चौकड़ी में हुरदंग की  सामाजिक स्वीकार्यता। उधम -चोकड़ी के बाद आराम का पल ,सांसो को अपने वेग को  यथावत लाने के लिए उबड़ -खाबड़ मेड़ो पर बैठ सुस्ताने  की प्रक्रिया। जैसे -जैसे रात की सुगबुगाहट होती सूरज के अनुचर चुपके-चुपके छुपना शुरु कर देते।कुछ-कुछ अहसास  होता सूरज की अनगिनत किरणे  भले गर्मी दिखाए मगर रात का अँधेरा भी कम ताकतवर नहीं है जो  सढ़क-सढ़क के इनपर अपना कब्ज़ा जमा ही लेते है और सूरज देवता ठन्डे हो निंद्रा मग्न हो जाते।अतिबल शाली सूरज  को हनुमान जी के साथ इन अंधेरो से भी डर लगता ही होगा। इन बातो से कुछ खास मतलब तो थी नहीं, ध्येय  भूतो के दर्शन का होता।
                     हमारे  गाँव   में उस समय तक एडिसन का प्रताप नहीं छाया था। लालटेन और डिबरी का साम्राज्य शाम  होते ही दिखने लगता किन्तु ये रौशनी चाहरदीवारी को भेदने में सक्षम नहीं थी,विकास के तमाम दावो के बाद आज भी  वक्त वे वक्त के लिए  भरोसा उस पर  कायम है।गरीबी  कि तरह डिबरी कि चिंगारी बदसूरत जल रही है। शायद कुछ लोगो के लिए ये  विलुप्तप्राय अविष्कार की श्रेणी में भी हो कुछ कह नहीं सकते। घर के सदस्य इन्ही डिबरी के  चिरागों से स्याह घूँघट में लिपटी दिवा रानी के स्वागत की तैयारी में  लगे होते थे उस विशेष काल को हम भूतो  के दर्शन लीला के उपयोगी अनुपयोगी तत्व , संभावित खतरे ,अच्छे और बुड़े ,हानिप्रद या हितकारी,होनी - अनहोनी,उसके आतंक  इत्यादि गाव की देहरी पर होने वाली रामचरितमानस के वाचन की तरह  चर्चा में  मशगुल होते।कल्पनाओं की असीमित दुनिया,समय-समय पर भूत लगने की सुचना ,उसके झांड़ -फुक की जीवंत दृश्य  एक अलग ही सृष्टि  का सृजन करता था। भूत उजाले में  पेंट सर्ट में क्यों नहीं होते इसकी जिज्ञासा अनावश्यक  रूप से भी कभी नहीं हुआ।सफ़ेद साड़ी  ,लम्बे बाल , उलटी पैड ,इन सबने मन मस्तिष्क पर भूत के रेखाचित्र का अनोखा अभेद्य आकृति उकेड़ रखा था,पुरुष भूत कि जानकारी निम्न थी । खैर हमें मतलब भूतो से था न की उसके लिंग से।अच्छा है वरना  भूतो में भी समलैंगिकता को लेकर बहस  शुरू हो जाता। 
                    अपलक निहारते ,उन चौकड़ी के बीच गाँव   की अंतिम सरहद जहा से शाम के बाद उस लक्छ्मन रेखा को लांघना अनेक अनजाने संभावित खतरे को अमंत्रीत  कर सकता था।  अतः हिदायत सख्त थी किसी भी परिस्थिति में बिना बड़े बुजुर्ग की संगति के उधर का रुख नहीं करे।अब हम कोई छुई-मुई तो थे नहीं की हमें चेतावनी की बात छू पाते  और घर में सिकुड़ जाते बालपन का मन जिसके लिए मना  करो उसको करने की उत्सुकता ज्यादा होती है, मगर  इन चेतावनी ने  सही कहे तो जाने- अनजाने डर ही भूतो से विशेष लगाव का कारण बना । तुलसीदास जी ने तो कह दिया भय बिन होहु ना प्रीति । खैर  अभी भी लगता है की ज्यदातर आदेश भय के ऊपर ही ग्रहण किया जाता है।जहा इसकी आशंका नहीं हो वह लोग किसी बात को मानने के बजाय  उसे बदहजमी समझ  कर आदेशो का कई कर देते है।
                     गाँव का सरहद शाम के बाद भारत पाकिस्तान के सरहद से भी ज्यादा संवेदनशील हो जाता था। उस समय तक घर के चाहरदीवारी के भीतर शौचालय को प्रवेश नहीं दिया गया था। सभी लोगो सूर्यास्त के साथ साथ ही बाधो -जंगलो में नित्य क्रिया  कर आते थे की रात अँधेरे में कही उधर का रुख न करना पड़े।आजकल खैर ये सुविधा लगभग  सभी को उपलब्ध है। हम भारतीय रेल के समय सारणी की तरह विलम्ब से घर का रुख करते।  परिवार के और सदस्य रोज की दिनचर्या में मशगुल हो किन्तु ध्यान अवश्य  रहता था की हम उस लक्छमन रेखा की उलंघन करने का दुसाहस तो नहीं कर रहे।किन्तु जैसे पुलिस के मुस्तैद रहने के बावजूद भी आतंकी घुस आते है वैसे ही तमाम मुस्तैदी के बावजूद हम भी भूतो के मुहल्लो के सरहद तक जा पहुचते। 
                    काफी दिनों से से हमारा कार्यक्रम पूरा नहीं हो पा रहा था। बिलकुल बीस सूत्री  कार्यक्रम कि तरह। किन्तु हम कोई सरकार तो थे नहीं कि कोई नया कार्यक्रम बनाते। भूतों  को देखने के कार्यक्रम पर हमारा ध्येय अडिग था जैसे अण्णा  जन लोकपाल से लेकर अब लोकपाल पर अडिग है । जिस तरह सी बी आई जांच में छेड़ -छाड़ की  बात लिक होने पर मंत्री महोदय को बाहर जाना पड़ा , हमारे इस कार्यक्रम कि बात लिक हो जाने के कारण कुछ मित्रो ने अपने घर के दबाव में इससे बाहर रहना ही उचित समझा। किन्तु हमकुछ साथी भूतो के दर्शन से मिलने वाले भविष्य के पुण्य लाभ से अपना लोभ संवर नहीं कर सके। लक्ष्य मछली कि आँख कि तरह साफ़ था। आज अमावस्या थी इसकी जानकारी स्वतः हो गई ,कोई विशेष  पुस्तक का अध्यन नहीं करना पड़ा। एकादशी ,संक्रांति ये दैनिक जानकारी कि चीज थी उस समय,, खैर अब ये सब पता नहीं चलता। क्योंकि अब थोड़े से आधुनिक हो गए है। सभी अपने -अपने घर से तैयार हो के निकले थे। मुझे भी पता था कि आज बाबूजी कोई विशेष काम से गाँव से बाहर है ,उनके आने तक हम अपने इस अभियान में सफल हो ही जायेंगे। माँ को विश्वास में लेना हमेशा  कि तरह बहुत ही आसान काम था सो हो गया। शाम के बाद लोगो कि आवाजाही गाँव में कम हो जाती  थी  तथा जिनसे थोडा बहुत खतरे का डर था उनके ऊपर हमने अपना खुफया पुलिस  लगा ही रखा था। जनतांत्रिक व्यवस्था कि जड़ काफी पुरातन कालीन है अपने देश में बाकी तो शहर  के विस्तार में कुछ सिमट गए,शहर में तो लोग सिर्फ वोट देते है , लेकिन  गाँव में राजनीति हवा में घुलती है सो हमें उसका पता था,किनको कैसे वश में करना है ।  
                         गर्म अमावस्या कि रात ,हवा के तेज झोंको से निकलने वाली सरसराहट कि आवाज उदेश्य में सफल होने के रोमांच के साथ-साथ अंदर का डर  चेहरे पर पौष कि रात का सर्द परत सा उभर रहा था। हम हर कोई अपने अंदर के डर को सहेज कर रखने के प्रयास करते तथा दूसरे के चेहरे कि हवाइयों पर मुस्कुराने कि कोशिश करते,जैसे चुनावी हार के बाद नेता जनता के सामने मुस्कुराते । गाँव से बाहर आकर जो अंतिम रास्ता नहीं पगडण्डी कहेंगे उससे आगे बढ़ने कि हिम्मत दिल्ली में बी जे पी जैसे सरकार बानाने कि नहीं कि वैसे ही हम भी नहीं कर पाये। वैसे वो पगडंडी बेचारी अभी भी अपने -आपको रास्ते में तब्दील होने कि बाँट जोह रही है। उसी पगडण्डी के किनारे खेत के मेड़ पर हमने दिल्ली के जंतर-मंतर में धरने कि तरह बैठ गये। डर  एकता के लिए कितना जरुरी है पहली बार मुझे ज्ञात हुआ। किसी ने कोई विरोध नहीं किया और सबने वहीँ रुकने का निश्चय किया। भूतो के प्रकोपों का हमें बिलकुल समसामियक जानकारी थी। जैसे ही हम बैठे कि एक के मुह से तेज चींख निकला  और एक ने बिना समय गवाएं उसके मुँह को दबा दिया। उसकी चीखे अंदर घुट कर दम तोड़ दिया। वो मेड़ो के अरहर के कटे जड़ो से अनजान लग रहा था। क्योंकि खेतो के अलावा उसके मेड़ो पर भी अरहर बो देते है जो कि फागुन के बाद काट लिया जाता है। वो  गाँव में रहते हुए भी इन तथ्यो से अनजान था बिलकुल वैसे जैसे  राहुल गांधी राजनीति में रहते हुए राजनीति से अंजान  लगते है। इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा और बाकी हम समझ बैठे कि भूत महराज ने उसे प्रथम दर्शन दिया और वो खुशी से चीखा है। हमने हमेशा कि तरह यहाँ भी पीछे रहने के कारण अपने भाग्य को कोसा। किन्तु वास्तविक तथ्य को जानकार उसके दुःख से भी एक संतोष का ही अनुभव किया ,साथ-ही साथ उसके अल्प ज्ञान के लिये उसके  कुपित दृष्टि भी आरोपित किया ,पता नहीं क्यों?
                                 दम साधे हम बैठ गए। शांति ऐसे जैसे किसी कि शोक सभा में बैठे हो। जुगनू का प्रकाश भी अँधेरे में हौसला देने में सक्षम है पहली बार उसको महसूस किया। झींगुर कि खनकती आवाज और   उसके  मधुर संगीत के  आनंद पर अंदर बैठा डर बार -बार चोट कर रहा था। एक घंटे का समय हमने जैसे-तैसे काटा बीच -बीच में दूर पीपल के हवा के संग निकलती चिंगारी को देख भूत के उद्भव का अनुमान लगाने के साथ ही हनुमान चालीसा उलटी-सुलटी चौपाई  भी बुदबुदाने लगते ,तेज आवाज में किसी को सुन जाने कि शंका समाहित थी। आँख स्वतः बंद हो जाते उसमे हनुमान जी के लिए श्रद्धाभाव था या भूतो का डर भाव ये निश्चित नहीं कह सकते। आँखे खोलने में भी  ताकत लगता है इसका  भी एहसास उस समय हुआ जब सभी एक दुसरो को हाथ-से हाथ दबा कर इसका निश्चय किया कि कब आँखे खोले। आँखे खोलने के बाद उसी रूप में सब कुछ कही भूत जैसी कोई आकृति के दर्शन नहीं ,मन में बिठाई आकृत कभी-कभी किसी को दिख पड़ता और घिघयाते हुए कहता जैसे कोई उसे चोरी करते पकड़ा हो और उसके देखने कि क्षमता पर सवाल उठा देते जैसे केजरीवाल सरकारी लोकपाल कि क्षमता पर सवाल उठाते है। हौसला हमारा धीरे -धीरे कम होता जा रहा था किन्तु कोई कहने को तैयार नहीं था ,सभी शीला दीक्षित कि तरह हार का इन्तजार कर रहे थे। पुरे बदन और कपडे धूल से संधि कर चुके थे ,अपने परिवेश के अभिन्न अंग होने के बावजूद वर्ण व्यवस्था कि तरह उससे दुरी बनाये रखने को बाध्य किया जाता था। खैर उतने ज्ञानी हो चुके थे कि भविष्य को ध्यान देकर कि कल माँ कौन-कौन से प्रश्नो के तीर बाबूजी के सामने छोड़ेंगी हमने अपना ध्यान पूरी तरह से भूत के ऊपर केंद्रित कर रखा था। उस समय सभी के कान सतर्क हो गए जैसे पहले चुनाव-परिणाम के बाद पार्टिओ के दल-बदल को लेकर हो जाते थे। एक स्याह परछाई सभी को लगभग दिखाई पड़ रहा था किसी को किसी के देखने इस   क्षमता  पर संदेह वैसे ही नहीं था जैसे कि अपने क्रिकेट टीम को अपने देश में जितने पर नहीं होता है। वो परछाई अब धीरे-धीरे नजदीक मेड़ो को तरफ आ रहा था ,जिस पीपल पर हमने नजर टिक रखा था अब नजर उधर से पलट गई , ओबामा अफगानिस्तान से नजर हटाते बिल्कुल वैसे ही। गर्भ में छिपे भ्रूण में जैसे बेटे कि चाहत होती है हमारे मन में भी वो भूत कि तरह ही पल रहा था और पल-पल निखरने लगा। परछाई ज्यादा काली होने लगी और आकृति ने आकार लेना शुरू कर दिया। अभी तक का ज्ञान धोखा दे रहा था श्वेत-धवल आकृति के जगह ये काली सी आकृति ,मन ने इसके लिए रात के अन्धकार को कोसा। अब हमने उस आकृति के पैरो पर अन्धेरे को चीरते हुए नजर जमाया और एक फुसफुसाया अरे इसके पाँव तो सीधे है। अब वो आकृति बिलकुल दस गज पर उससे पहले हम कुछ समझते तीन शेल वाले  टॉर्च का तेज प्रकाश आँखों के ऊपर छा गया। तेज प्रकाश आँखों को वैसे ही धोखा देती है ज्यादा ऑक्सीजन मछली को। कुछ देख पाते-समझ पाते उससे पहले जोरदार चांटा घुमा,धोनी कि हेलिकॉप्टर शॉट कि तरह। गेंदवाज की  तरह हमारे पास समझने को कुछ नहीं था। चांटे का दर्द कुछ पहली बड़ी धड़कन को थामने में कारगर रहा। दिल में तस्सल्ली हुई भूत आखिर नहीं है,लेकिन दूसरे शॉट की आशंका भाप हाथ खुद-ब-खुद गाल के बाउंड्री पर जा पंहुचा । बाबूजी आज जल्दी लौट आये जो कि अंदेशा न था। इतनी रात में यहाँ क्या हो रहा है -एक तेज आवाज गूंजी ? मैं कुछ समझ पाता और मित्रो से मदद की आश में नजर उठाता ,मै अंपने-आपको अकेला पाया ,बाकी तब तक भागने में सफल हो गए मेरे मित्र के भागने कि गति  बिलकुल ऑस्ट्रेलिया के चौदह वर्षीय धावक कि तरह तेज था या उससे भी ज्यादा इसे कहना मुश्किल है। भविष्य की आशंका को दिल में धारण कर एक हाथ से गाल को  संभाले कानून के प्राकृतिक सिद्धांत का उल्लंघन से द्रवित दूसरे गाल के विषय में सोचता हुआ उनके पीछे-पीछे घर कि ओर चल दिया। और भूतों के दर्शन का इस बार का हमारा प्रयास असफल हो गया।कल सुबह के होनी अनहोनी के लिए मन ही मन भगवान् पर आश्रित हो गया।                                     

Saturday, 14 December 2013

अपने-अपने पैमाने

                               हमने अपने-अपने तराजू बना रखे है। पैमाना भी सबका अपना -अपना है। मानव इतिहास को छोड़ अपने देश के  ही इतिहास कि बात करे तो बाकई हम अद्भुत दौर में है। ग्लोबल विश्व कि अवधारणा अब डी -ग्लोबलाइज की तरफ है या नहीं ये तो कहना मेरे लिए जरा  मुश्किल है किन्तु लगता है शासन व्यवस्था का विकेंद्रीकरण में अब ज्यादा समय नहीं है।  अब  कुछ लोगो के  समूह द्वारा  अपने अपने केंद्र में सभी को स्थापित कर अपने-अपने शासन को सुचारु रूप से चलाएंगे ,ऐसा सराहणीय  प्रयास जारी है में है। हर किसी को अधिकार चाहिए। लेकिन कौन किससे  मांग रहा है या कौन किसको देने कि स्थिति में है ये पूरा परिदृश्य साफ़ नहीं हो पा रहा है 
                               जनता को स्वक्छ शासन चाहिए था। सभी ने उनसे अपना वोट माँगा। दिलदार जनता दिल खोल के अपने वोटो का दान भी किया। किन्तु अभी भी कुछ लोगो को संदेह था कि वाकई में कौन ज्यादा स्वक्छ है ,सभी के अपने-अपने पैमाने जो है। दुर्भागयवश वोटो के दान दिए हुए जनता को अब अपने लिए सरकार कि मांग करनी पर रही है। सभी दिलदार हो गए सभी देने के लिए तैयार किन्तु शासन अपने हाथ में लेने को तैयार नहीं। वाकई भारतीय राजनीति का स्वर्ण युग। जनता कि सेवा के लिए सभी भावो से निर्लिप्त बुध्त्व कि ओर अग्रसर। अब देखना बाकी है कि मिल बाट  कर सेवा कर जनता को कुछ देते है या पुनः उनसे मांगने निकल पड़ते। 
                                  अभी तक अल्पसंख्यको से तो बस धर्म या जाती विशेष में ही बटें लोगो कि जानकारी थी। किन्तु अब एक नया वर्ग उभर कर आ गया। बस साथ -साथ रहने कि ही बातें तो कर रहे ?पता नहीं ये अनुच्छेद ३७७ क्या कहता है। सरकार के  मुखिया का दिल भी  द्रवित हुआ जा रहा है आखिर दकियानुसी लोगो के पैमाने पर इन्हे क्यों तौले । पता नहीं कानून बंनाने वाले इस धारणा  पर कैसे पहुचे होंगे कि ऐसे वर्ग अपनी पैठ बनाएगा जो इतने सालो पहले ही इसे अपराध घोषित कर दिया। प्रेम हर धारणा  को तोड़ सकता है ऐसी धारणा  क्यों नहीं कायम कर पाये। अवश्य पैमाने कि गडबडी है।ऐसे समय में जब मानव समुदाय में प्रेम बढ़ाने  की जरुरत है लोग प्रेम करने वाले को दूर करने में लगे है। 
                                   शायद लगभग  ३२  प्रतिशत से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय माप-दंड के अनुसार गरीबी देश में छाई है ,अपने राष्ट्रीय पैमाने पर ये आंकड़ा लगभग २९.८ प्रतिशत अपने खुद के बनाये रेखा से निचे है। इनका भी अपना वर्ग विशेष समूह है। इनको समय -समय पर सम्बोधित भी किया जाता है। कई बार रेखा को बढ़ाया जाता है तो कई बार उसे घटाया जाता है। आखिर सरकार भी क्या करे जब भी गरीबो क कम दिखने का प्रयास करती है ,गरीबो से प्यार करने वाले दल उनका आकड़ा कम नहीं होने देते। आखिर उनका भी अपना पैमाना है। 
                                ऐसे भी अब विशेष कोई समस्या इस देश में है नहीं। हर जगह उनको दूर करने का प्रयास हो ही रहा है ,किन्तु मिडिया मानने  को तैयार नहीं है और वो भी अपने बनाये पैमाने में उसे उछालते रहती है। आखिर उनका भी कोई वर्ग विशेष है। उनके भी अधिकार है।जनता जो सोई है आखिर उसे जगायेगा कौन ? 
                              फेहरिस्त लम्बी है आप भी अपने पैमाने पर उसे जांच ले  ताकी अपने अधिकार नाप सके। 

Wednesday, 11 December 2013

हर्षित पद रचाऊंगा

जिन छंदो में पीड़ा झलके,
शोक जनित भावार्थ ही छलके
वैसे युग्म समूहो में
मैं शब्दो को न ढालूँगा
त्रस्त भाव को अनुभव कर भी
हर्षित पद रचाऊंगा । ।

सुख-दुःख का मिश्रण जब जीवन
यह यथार्थ नहीं कोई कोई भ्रम
तब क्यों आखर को व्यर्थ कर
बुधत्व भाव बनाऊंगा
त्रस्त भाव को अनुभव कर भी
हर्षित पद रचाऊंगा । ।

समर भूमि के इस प्रांगण में 
कर्म डोर थामे बस मन में 
गीता भाव सदा बस गूंजे 
क्यों अर्जुन क्लेश जगाऊंगा  
त्रस्त भाव को अनुभव कर भी
हर्षित पद रचाऊंगा । ।

छल ,फरेब ,धोखा की  बाते 
ठोखर खाकर छूटती सांथे 
मेरे पंक्ति में न छाये 
बस हाथ मदद में उठते को सजाऊंगा  
त्रस्त भाव को अनुभव कर भी
हर्षित पद रचाऊंगा । ।

Sunday, 8 December 2013

"आप" की जीत


                               शंका और सवाल हर वक्त कायम रहते है। बदलाव कि प्रक्रिया काफी बैचैन करने वाली  होती  है। तात्कालिक परिणाम भविष्य  के अपेक्षित चाह को कितना भरोसा देती है इसके लिए धौर्य आवश्यक  है। गुणात्मक बदलाव कि अपेक्षा, हमेशा औरों से उम्मीद  करने की प्रवृति शायद अपेक्षित परिणाम से रोक देती  है। व्यबस्था के सर्वांगीण विकास में व्यक्तिगत निष्ठा और संगठन के विचार,इसमें  फर्क करना मुश्किल  होता है।समझते-समझते हो गई क्षति को भरना उससे भी कठिन।  किसी आभा के तहत कई बार सूक्ष्म छिद्रो पर नजर नहीं जाता। अपेक्षा का स्तर और चाह संगठन के शैशव कालीन निर्माण के बाद के विकास  में समय के साथ कुरूपता भर देता है। इसके उदाहरण  से हमारा लोकतंत्र समृद्ध है। चाहे वो जन संघ का निर्माण हो या जयप्रकाश कि क्रांति हो या लोहिया का आदर्श सभी यौवन काल तक पहुचते-पहुचते चारित्रिक विकारो से ग्रस्त हो गए। आश्चर्यजनक रूप से विचारो की  प्रषंगिकता का हर चुनाव के पूर्व तथाकथित अनुयाइयों द्वारा जाप किया जाता है किन्तु उसके बाद उसका उन विचारो को व्यवहारिकता के नाम पर कैसे धूल कि तरह झाड़ा जाता है ये कोई विशेष ज्ञान बातें  नहीं है । हम भी शायद व्यवहारिकता पे ज्यादा भरोसा करते, नहीं तो ये  विचार सिर्फ तथाकथित बौद्धिक जनो के  विचार का मुद्दा न रहकर जड़ तक इसका अनुपालन हो, इससे बेखबर हो जाते। अपेक्षित चाल -चलन और विचारो का बदलाव जो कि दिल्ली विधान सभा के चुनाव में  इस बार देखने को मिला है इसका वास्तविक रूपांतरण अगर व्यवस्था संचालन में आगे  आने वाले समय में होगा तो बेहतर प्रजातंत्र से इंकार नहीं किया जा सकता है। और लकीर पकड़ कर चलने में माहिर राजनेता इन आदर्शो को चुनाव जितने में सहयोग के तौर पर देखते हुए बेशक मज़बूरी में चले तो भी स्वागत योग्य है।  किन्तु हर बार कि तरह इसमें योगदान देने वाले जनता अपने लिए व्यक्तिगत  उपदान की अपेक्षा अगर रखने लगे तो सिर्फ इसबार "आप" बधाई कि पात्र होंगे तथा इतिहास बनाते-बनाते कही ऐतिहासिक में न तब्दील हो जाए ये देखना बाकी है। फिर भी अंत में बदलाव स्वागत योग्य है और शंकालू प्रवृति से ही सही किन्तु उम्मीद कि रौशनी तो फूटी है।  

Saturday, 7 December 2013

भ्रम



कितने विश्वास .... 
अति विश्वास ? के भवर में ,
डूबते और निकलते है ,
कि तैर कर बस हमने पार कर लिया ,
इस प्रकृति पे अपना 
अधिकार कर लिया। 
और देखो वो बैठ कर 
मुस्कुराता है..... 
कहकहा शायद नहीं ,
क्योंकि अपनी रचना पर 
कभी-कभी........ 
हाँ कभी-कभी शायद पछताता है, 
कि हमने क्या बनाया था 
आज ये क्या बन गए है। 
जितने भी आकृति उकेडी है ,
सब एक ही नाम से, 
अब तक जाने जाते है। 
पर ये इंसान  जाने क्यों ?
सिर्फ हिन्दू-मुसलमां ही कहाँ ,
न जाने कितने सम्प्रदायों में 
खुद को बांटते चले जाते है। 
भ्रम के जाल में ,
उलझे दोनों परे है अब। 
रचना खुद को रचनाकार समझ बैठा ,
और जिसने  सींचे  है इतने रंग
वो सोचता हरदम  
कब फिसली मेरी कूची 
कि ये हो गया बदरंग। ।

Wednesday, 4 December 2013

तिनके का जोश


वक्त की आंधी उठती देख 
तिनको में था जोश भड़ा ,
अबकी हम न चूकेंगे 
है छूना आकाश जरा। 
दबे-दबे इन वियावान 
कब तक ऐसे रहे पड़े ,
चूस गए जो रस धरा का 
देखे कैसे अब  वो इसे सहे।  
हलके -हलके झोंकों ने 
जब भी हमको पुचकारा ,
ऊँचे दीवारो से टकराकर 
पाया खुद को वहीँ पड़ा।  
है सबका एक दिन यहाँ 
ऐसा हम तो सुनते है ,
पाश ह्रदय के नयन में हमको 
आज अश्रु से दिखते है। 
ओह देखो अब आन पड़ा है 
है बिलकुल ही पास खड़ा ,
इन झंझावात के वायुयान से 
देखूं अब  नया आसमान जरा। । 

Thursday, 28 November 2013

कुछ पंक्तियाँ यूँ ही ......

सुख से ख़ुशी है या ख़ुशी से सुख
इस जीवन में किसकी हो भूख  । 

आधार एक दूजे से ऐसे है मिलते
रेत पे लकीर जैसे बनते - मिटते।

खुशियां जीवित मन का उमंग
सुख बनते वस्तु निर्जीव के संग। 

कदम-दर-कदम दोनों की  आस
उठती है मन में दोनों कि प्यास। 

इस मरीचिका को कैसे है समझे 
मन कि तरंग यतवत भटके। । 

Thursday, 31 October 2013

द्वन्द

नजर अधखुली सी 
ख्वाव अधूरे से 
आसमान कि गहराई पे पर्दा 
बादल झुके झुके से। 
अविरल धार समुद्र उन्मुख 
पूर्ण को जाने कैसे भरता। 
एहसास सुख का या 
सुख क्या? एहसास कि कोशिश।  
हर वक्त एक द्वन्द 
किसी और से नहीं 
खुद से खुद का तकरार। 
नियत काल कि गति 
फिर क्यों नहीं कदम का तालमेल। 
जो है उसे थामे,सहेज ले 
या कुछ बचा ले जगह 
जो न मिला उसकी खोज में। 
हर रोज जारी है 
अधूरे को भरने कि  
और भरे हुए को हटाकर 
नए जगह बनाने का द्वन्द । । 

Saturday, 26 October 2013

लक्ष्य


ह्रदय व्यथित चित्त अधीर
मुख  मलिन शांत क्यों ?
दृष्टि यूँ झुंकी -झुंकी
नयन ज्योति क्लांत क्यों ?
अर्थ शब्द नित-नियत  ,
भाव  क्यों बदल रहे  ?
अथाह मन जो धीर था,
सिर्फ बातों से  उथल रहे  ?
हताश  पस्त अस्त-व्यस्त
जाने क्यों डिग रहे। 
लहर के  हर प्रहार सा
कदम कदम पर झुक रहे। । 
किससे ये द्वन्द है
         किसपर विजय गुमान है,
      धरा नीर जब रक्त-पथ
              तब कहाँ अतृप्त निदान है ?
खुद से  है छल रहे,
  जाने क्यों मचल रहे 
                मस्तष्क मणि अहिन्ह* चाह 
            गरल सिक्त मन कर रहे। 
       दम्भ-दंड पर जब खड़े  
       ऊंचाई का कहाँ भान हो 
       असीम तृष्णा वेग प्रवाह 
                  वेद सूक्त कैसे न निष्प्राण हो।। 
जब प्रलय थी अथाह
गति न थम पाई तब 
मनुज अंश एक यगुल
असंख्य रूप प्रकट अब। 
एक काया एक तब 
असंख्य कोशिका मेल सब। 
शूल का कही प्रहार 
असहय वेदना कहीं उभार। 
मनुज मन समग्र हो 
इतना न व्यग्र  हो 
देव अंश सब धरा पे 
पल कुचक्र पर न अधीर हो। । 
            कृपणता बस त्याग हो 
            ह्रदय शक्ति संचार हो 
    शूरवीर वंशजो में 
          बस मनुजता वास हो  
तरकशें है पड़ी 
       सब वाण से है  भरीं 
      थपेड़ो से मन उभार 
        कर प्रत्यंचा से श्रृंगार 
    मन से बस एक हो 
   नहीं कोई संदेह हो 
         शत्रु दंभ ,विचार अधर्म 
       सभी लक्ष्य भेद हो।।  
*सर्प