Thursday, 27 October 2016

"तमसो माँ ज्योतिर्गमयः"

सच तो यही है कि 
हर रोज श्वेत प्रकाश की किरण 
बिखर जाते  है कोने कोने में 
किन्तु भेद नहीं पाती 
मन के अँधेरी गुफाओं को। 
और हमें भान है कि 
हमने पढ़ लिया सामने वाले के 
चेहरे पर उठने वाली हर रेखा को 
जो मन के कम्पन से स्पंदित हो उभर आते है। 

फिर सच तो यह भी है कि 
तम घुप्प अँधेरी चादर के 
चारो ओर बिखरने के बाद भी।  
हलकी सी आहट बिना कुछ देखे ही 
मन में उठने वाली स्पन्दन से 
चेहरे पर उभरे भाव को पढ़ने के लिए 
रौशनी के जगनूओ की भी जरुरत नहीं 
और हमारा मन देख लेता है। 

चारो ओर बिखरे अविश्वास की परिछाई 
जाने कौन से प्रकाश का प्रतिबिम्ब है 
जिसमे देख कर भी एक दूसरे को
समझने की जद्दोजहद जारी है। 
कुछ तो है की मन के कोने    
विश्वास कि  किरणों से दूर है। 
क्यों न मिलकर ऐसा दीप जलाये 
जो दिल में घर अँधेरे को रौशन करे 
और हम कहे -"तमसो माँ ज्योतिर्गमयः" ।।  
                
                दीपावली कि हार्दिक शुभकामना 

Monday, 17 October 2016

डाकिया दाल लाया .......

                         
                            प्रसन्न होने के लिए हर समय वाजिब कारण हो ऐसा तो जरुरी नहीं  है। खुशियो के प्रकार का कोई अंत नहीं है। बीतते पल बदलते रूपो में नए नए कलेवर के साथ खुद को आनंददित करने के नए -नए बहाने देते रहते है। बसर्ते आप उसको पहचानने की क्षमता रखे। फिर वो बाते जो बचपन में उसको एक झलक देखकर अंतर्मन को आनद से झंकृत करने की सम्भावना जगाता रहा उस मृतप्राय  अहसास के पुनः पल्लवित होने कि  सम्भावना वाकई सुखद लगता है।  बात आप सभी के लिए भी बराबर ही है। 
                           गुजरे दौर में इस देश समाज में जिस सरकारी कर्मचारी ने अपनी उपयोगिता का प्रत्यक्ष अहसास सभी को कराया वो डाकिया ही था। कक्षा दसवी तक न जाने इसकी भूमिका ख़ुशी और अवसाद के पलों पर उसका प्रभाव विभिन्न परीक्षाओ में विभिन्न तरह से कितनी बार वर्णित हुआ होगा इसका लेखा जोखा शायद मिले। हिंदी फिल्मो में इसका चित्रण और गीतों का दर्शन संभवतः कितना है कहना मुश्किल है। डाकिये का पराभव समाज के बदलते स्वरूप और भागते समय के साथ कही पीछे छूट सा गया और बिखरते सामजिक परिदृश्य में यह भी कही खो गया।  जब आधार स्तम्भ ही डगमगा गए तो संरचना का टिकना तो मुश्किल ही है।कभी समाज में हर तबके के लोगो के आँखों का तारा डाकिया ,जिसको देखते ही लोगो के मन अनायास ही कितने सपने सजों  लेते और साईकिल जब घर के पास न रूकती तो अपनों के बेरुखीपन को भी डाकिये का करतूत समझ लेते। फिर भी जल्द अगली बार फिर से उसका इन्तजार रहता। आज वही डाक विभाग एक उपेक्षित और असहाय सा गांव और शहर के किसी कोने में अपने वजूद से लड़ता दिखाई पर जाता है। आखिर अब इतना समय किसके पास है की एक खत के लिए सुनी अँखियों से उसकी राह निहारते रहे। जबकि बेसक अब भी दिन में चैबीस घंटे क्यों न हो।  
                           इतिहास से सबक लेने वाले लोग विवेकशील ही माने जाते है और प्याज ने कितने को रुलाया कि उसकी आह से सरकार चल बसी। इससे सबक हो या कुछ और  किन्तु लगता है अब डाकघर और डाकिये के अच्छे दिन आने वाले है। आज ही समाचारपत्र में देखा है कि अब सरकार डाक घर के माध्यम से दाल बेचने वाली है।आखिर जब दाल रोटी भी नसीब  होना दुश्वार होने लगे तो कुछ न कुछ क्रांतिकारी कदम तो उठाना ही पड़ेगा। विश्व की महाशक्ति से होड़ लेने की ख्वाहिश  पालते देश के नागरिक दाल से वंचित रहे। ये देश के कर्ता -धर्ता को आखिर कैसे शोभा देगा। व्याप्त अपवित्रता की जड़ो को पवित्र करने के लिए आखिर पहले ही  गंगा कि अविरल धारा तो डाक घरो के दहलीज तक पहुच ही चूका था। अब दाल कि खदबदाहट भी आपको डाकघर पर सुनाई और दिखाई देगा। चाहे तो आप गंगा जल के साथ ही साथ दाल भी खरीद ले ताकि अगर दाल में कुछ काले की सम्भावना नजर आये तो गंगा जल छिड़क कर उस सम्भावना को ख़ारिज कर सकते है। अब गलती से अगर डाकिया दिख जाए तो जो की सम्भावना कम है आप अपने दाल की एडवांस बुकिंग करवा ले। क्योंकि अगर डाक बाबू के नियत में खोट आ जाये तो कुछ भी संभव है। आने वाले समय में और उम्मीदे पाल सकते है की पर्व त्योहारों पर आप सीधे मनीआर्डर में दाल और अन्य उपलब्ध सामान भेजना चाहे तो भेज  सकते है। साथ ही साथ आज के भी बच्चों को डाकिया और डाकघर की उपयोगिता का पता चल जाएगा। बेसक उनके लिए हो सकता है फिर से डाकिये ऊपर निबंध आ जाए।  ऐसा भी नहीं है की यह करने से सिनेमा या संगीत की रचनाशीलता में कोई कमी आ जाएगा बल्कि उसमे नए आयामों की सम्भावना और बलबती होगा। किन्तु जब तक गीतकार कोई नया गीत नहीं रचते आप बेसक यह गुनगुना सकते है - डाकिया दाल लाया ,डाकिया दाल लाया  ....... । खुश होने के बहाने तलाशिये तनाव तो  हर जगह मुफ्त उपलब्ध है।

Tuesday, 11 October 2016

विजयी कौन .....?

                       बस अब युद्ध अंतिम दौर में है। किसी भी क्षण विजयी दुंदुभि कानो में गूंज सकती है। सभी देवतागण पंक्तिबद्ध हो अपने -अपने हाथो में पुष्प लिए अब भगवान के विजयी वाण के प्रतीक्षा में आतुर दिख रहे है। सभी के मुख पर संतोष की परिछाई दिखाई दे रहा है। अब इस महापापी का अंत निश्चित है। आखिर कब तक महाप्रभु के बाणों से अपनी रक्षा कर पायेगा। काल को अपने कदमो तले दास बनाने वाले को अब सम्भवतः अवश्य ही काल अपने चक्षु से दिख रहा होगा। अहंकार का दर्प अवश्य ही पिघल रहा है। राक्षसों की सेना में भी   मुक्ति की व्याकुलता दिख रही है। वानरों की सेना में असीम उत्साह का संचार एक -एक कर राक्षसों को मुक्ति मार्ग पर प्रस्थान कर रहे है। 
                         महाबली महापराक्रमी रावण रथ पर आरूढ़ आसमान से विभिन्न प्रकार के शस्त्र का प्रहार कर अपने वीरता के  प्रदर्शन में अब भी लगा हुआ है। महाप्रभु राम उसके हर शस्त्र का काट कर उसके साथ कौतुक कर रहे है। किन्तु अब भगवान् के चेहरे पर धारण मंद स्मित रेखा पर खिंचाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। देवतागण भगवान् के मुख पर उभरे इस रेखा को पढ़ कर आनंद और हर्ष से भर गए है। प्रभु राम अपने धनुष की प्रत्यंचा पर वाण धर अब इस कौतुक पर पूर्ण विराम करना चाह रहे है और प्रत्यंचा की तान प्रभु के और समीप खिंचता जा रहा है। प्रत्यंचा की तान से जैसे आसमान में बिजली सी कौंध गई और रण भूमि में दोनों ओर की सेनाओ को लगा जैसे रावण का काल बस उसके नजदीक आ गया। बदलो की टकराहट से पूरा रणक्षेत्र कंपायमान हो गया। दोनों ओर की सेनाये लड़ना भूल जैसे मूक दर्शक हो  महाप्रभु की ओर एकटक देखने लगे। अचानक इस दृश्य को देख देवतागण भी विस्मित से दिखने लगे। हाथो में धारण किये पुष्प इस गर्जन को सुन जैसे प्रभु के ऊपर बरसने को आतुर होने लगे। किन्तु अभिमानी रावण अब भी बेखबर भगवान् के लीलाओ को समझने में अक्षम लग रहा। उसके आँखों पर अभिमान का दर्प राम के देवत्व को देखने में बाधक था। भगवान् की प्रत्यंचा पर धारण वाण बस अपने आपको को भगवान् के तर्जनी और अंगूठे से मुक्त हो इस महापापी को महाप्रस्थान के लिए जैसे आतुर दिख रहा है। इसी क्षण बस राम ने वाण को मुक्त कर दिया। वाण का वेग देख जैसे वायुदेव का  भी सांस थम गया। पुरे रणभूमि में एक स्तब्धता छा गया। जिस क्षण की प्रतीक्षारत  देव ,मानव ,गन्धर्व ,आदि अब तक थे अब वो क्षण बिलकुल नजदीक दिख रहा है। प्रभु के धनुष से निकला वाण द्रुत गति से सीधा जाकर रावण की नाभी में समा गया। आसमान भार मुक्त, किन्तु  महापंडित रावण का भार अब भी पृथ्वी उठाने को तत्पर दिखी। रथ से अलग हो रावण का शरीर अब रण भूमि में चित पड़ गया। 
        यह क्या जोर-जोर की अट्टहास रण भूमि पर पड़े रावण के मुख से आ रहा और अपने बड़े-बड़े नेत्रों से राम को घूरा।  उसका अट्टहास मृत्यु पूर्व अंतिम उद्घोष था या चुनौती देवतागण भी विचारमग्न ,प्रभु के अधर पर स्वभाविक मंद स्मित मुस्कान। रावण अट्टहास करता करता दर्पपूर्ण स्वर में कहा - राम क्या तुमने मुझे सच में परास्त कर दिया ,
राम -रावण क्या अब भी अभिमान नहीं गया। क्या मृत्यु को इतने पास से भी देखने में सक्षम नहीं हो। अहंकार जब नजरो में छा जाता है तो ऐसा ही होता है। 
रावण -अहंकार मेरे शब्दो में नहीं राम तुममे झलक रहा है। रावण कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं हो सकता। राम आज तुमने सिर्फ एक रावण का वध किया है। रावण की इस नाभि में बसे अमृत अभी सूखा कहा है। वह तो बस छिटक कर इसी पृथ्वी पर फ़ैल गया है। राम ये तुम नहीं जानते की तुम एक रावण के कारण कई रावण को जन्म दे दिए। रावण आज भी जिन्दा है और कल भी रहेगा। आने वाले युग में इस रावण की गुणों से युक्त कितने क्षद्म मानव होंगे तुम सोच भी नहीं सकते। चलो माना की तुम भगवान् हो और इस धरती पर अवतरण लिए। किन्तु जब मानव ही  रावण के गुणों से युक्त होगा किस मानव के रूप में आओगे। ये  तो मारीच से भी गुनी होंगे कब राम का रूप धर रावण दहन करेंगे और कब रावण का रूप धर सीता हर ले जाएंगे तुम्हारे देवता को भी समझाना मुश्किल हो जाएगा। हर कोई एक दूसरे को रावण कहेगा खुद को राम कहने वाला शायद ही मिले। यह राम तुम्हारी जीत नहीं हार है। जिस पृथ्वी से पाप मिटाने के लिए तुमने एक रावण का वद्ध किया उस रावण से कई रावण निकलेंगे यह तुम्हारी हार है। राम अभी तक तो तुमने पृथ्वी को  रावण मुक्त किया लेकिन आने वाले समय के लिए भार युक्त कर दिया। अब तो वर्षो यह मानव मेरा गुणगान करेंगे। अपने अंहंकारो की तुष्टि हेतु बस मेरे पुतले पर वाण चलाएंगे। राम मेरा शरीर नहीं मरा है वह तो तुम्हारे वाण से क्षत -विक्षित हो  बिखर गया चारो दिशाओ में। राम विचारो यह तुम्हारी विजय है या पराजय। पुनः अट्टहास जोर और जोर से, चारो दिशाए उन अट्टहास से जैसे कांपने लगा। 
         अचानक जैसे  उसकी तन्द्रा खुली खुद को रावण दहन के भीड़ में घिरा पाया। रावण सामने वाले मैदान में धूं -धूं कर जलने लगा। फटाको की आवाज से कान बंद सा हो गया। लेकिन उसके कानो में अभी भी रावण के प्रश्न  और अट्टहास गूंज रहे , भीड़ मदमस्त है और उसकी नजर राम को तलाश रहा है ।    

(आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामना )

Sunday, 9 October 2016

किस फलसफे पर जाऊं .....

किस फलसफे पर जाऊं 
मौत की युक्तियां तलाशें  
या सिर्फ जिंदगी को गले लगाऊं ।।

खिंची है कितनी दीवारें 
हर नजरो में नजर तलाशती है , 
हमें शक न हो अपनों के मंसूबो पर  
इसलिए सरहद पर जमाये बैठे है ।। 

बुझ रहे खुद के  दियें हर रोज  
इसकी किसी को कोई खबर नहीं ,
रह रह कर जला दो  उसे 
हर तरफ शोर ये सुनता ।। 

भूख से कोई मरे इसमें कोई तमाशा नहीं 
खुद कि  बदनीयत पे कौन शक करे ,
शुक्र है की वो बगल में पाक सा  है 
उसी की ख्वाहिस का इल्जाम क्यों न करे ।। 

अपनों से ही मासूम से सवाल पर उबल जाए 
लगता है रक्त की तासीर बदल सी गई है , 
शायद इन लाशों में बहुत कुछ छिपा है 
जमाये गिद्ध की नजरो से पूछो जरा ।। 

बहुत माकूल अब माहौल है 
वो अपना भी लिबास हटा देते है , 
कई सालो के सब प्यासे है 
एक रक्त का दरियां क्यों न बहा देते है ।। 

किस फलसफे पर जाऊं 
मौत की युक्तियां सुझाऊं 
या सिर्फ जिंदगी को गले लगाऊं ।।   

Tuesday, 27 September 2016

प्रवाह...


बादलो का कोई कोना छिटककर 
जैसे फ़ैल गया मेरे चारो ओर , 
और मैं घिर गया 
किसी  अँधेरी गुफा में। 
साँसों का उच्छ्वास टकराकर 
उस बादलो से ,
गूंजती थी नसों के दीवारों में 
न सुंझाता कुछ, 
फिर फैलते रक्त की लालिमा 
जाने कैसे उस कालिखो पर भी 
घिर कर उभर आया ।  
बीते आदिम मानव के कल का चित्रण 
या उन्नतशील होने का द्वन्द ,
संहार के नित नए मानक 
गर्वोक्ति संग उद्घोषणा , 
बैठे कर विचार करते सब आपस में 
कैसे हम रक्त पिपासु बने।  
कहीं इतिहास तो नहीं दोहरा रहा 
अब आदिम मानव रूप बदल ,
अपने गुणों का बखान कर रहे। 
अनवरत सदियो के फासले 
नाप कर भी 
उद्भव का संक्रमण 
शायद हमारे रुधिर में 
उसी प्रवाह के साथ विदयमान है। 
झटक कर मस्तिष्क झकझोड़ा 
छिटकते धुंध से बाहर आया 
या उन रौशनी में 
जहाँ शायद कुछ दीखता नहीं। 
पता नहीं क्या ?

Friday, 23 September 2016

पछतावा

                 
                    मनसुख के गांव में आज गर्वयुक्त उदासी बिखरी हुई है।  एक शहीद की अंत्येष्ठि में शामिल होना है।  बड़े -बड़े कदम भरते सभी उसी ओर चल पड़े जिधर हजारो कदम बहके बहके से चले जा रहे है। बहुत दिनों बाद ऐसा लग रहा है, देश और देशभक्ति की अनोखी बयार हवा में घुल गई है। सभी मन ही मन गौरवान्वित महसूस कर रहे है। हर कोई उस शहादत में अपना भी हिस्सा देख रहा है। तिरंगे में लिपटा शव पर फूल मर्यादित रूप से अपने आप को सहेज कर रखा हुआ है। इस मौके पर कोई भी पंखुरी अपने आपको उस तिरंगे से अंतिम विदाई देने के पूर्व विच्छेदन नहीं चाह रहा है। पीछे-पीछे सेना की टोली अनुशासित रूप से, कदम-से-कदम मिलाकर अपने साथी का साथ, महाप्रस्थान से पूर्व अंतिम कदम तक हौसला बनाये चल रहा है। क्या बूढा क्या जवान हर कोई इस पल को जीना चाह रहा है। आखिर देश के लिए उत्सर्ग कोई अपने आपको कर दिया है। नीले आसमान में चमक रहे सूरज भी लगा जैसे इन पलो में गमगीन हो अपने आपको बादलो में ढक लिया और दोनों हाथो से वृष्टि पुष्प उसके कदमो में बरसाने लगा। सारा गांव उस समय थम सा गया। पर्दे के लिहाज भूल महिलायें भी उस वीर जवान को एक झलक देख  अपने पलकों में बसा लेने हेतु उत्सुकता से अपने चहारदीवारी के किसी खाली झरोखे को ढूढने में प्रयत्नशील लग रही। सरकार के बड़े अधिकारी भी अपने इस मौके पर अपनी उपस्थिति सुनिश्चित कर रखे है। मनसुख भी उस भीड़ का हिस्सा है ,लखन चाचा भी साथ ही साथ चल रहे थे। 
                       मनसुख भी  पीछे-पीछे चला जा रहा है।  किन्तु दृश्य उसके सामने पांच साल पहले का चलचित्र की भांति घूमने लगा। जब  लखन चाचा का बेटा अपने एक और साथी के साथ  बहुत खुश होकर आया और कहा की -बाबूजी हमारा फ़ौज में सलेक्शन हो गया और पत्र सामने रख दिया।मनसुख भी वही बैठा था।  तीनो हम उम्र मित्र थे। साथ साथ दोनों के चयन से बहुत खुश। किन्तु एक ही बेटा और फ़ौज की नौकरी अपने हाथो मरने मरने भेज दे। अंतरात्मा काँप गई थी। कहा- बेटा अपने पास काफी जमीन है खेती कर फ़ौज-वॉज में कुछ नहीं रखा है। मनसुख ने भी लखन चाचा से तरफदारी की किन्तु वो टस से मस  नहीं हुए।देश के प्रति मनसुख का लगाव कुछ कम हो ऐसा नहीं था ,किन्तु फ़ौज के लिए जो हौसला चाहिए वो नहीं था।  वो खेती कर खुश था और उसका दोस्त फ़ौज में ख़ुशी देख रहा था। कई बार मनाने पर भी नहीं माने। अंततः  मन  मसोसकर उसका दोस्त अपने बाबूजी की बात मान गया।  खेती को उन्नत विधि से करने के लिए लोन लिया। और सुखार ने सारे के सारे अरमान पर पानी फेर दिया। एक सुबह बेटे का शव घर के पीछे बगान में पेड़ से लटका पाया।सब कुछ ख़ामोशी से निपट गया। मनसुख उस वक्त भी  साथ था और अपने को गैर होते और दुःख पर कुटिलता के वाण अलग से चले ।
              आज लखन चाचा के बेटे के  मित्र की विदाई है।अचानक तेज बिगुल की धुन सुनाई दी। मनसुख जैसे लगा नींद से जगा। अचानक तेज उठती लपटे लगा जैसे आसमान को भी अपने में समेटने को उधृत हो रहा हो। आसमान से रिमझीम फूलो का अर्पण चिता को सम्मानित कर रहा था। बगल में ही खड़े लखन काका को मनसुख ने देखा। नजरो में भुत गतिमान लग रहा था। आँखों के किनारे आंसू की बुँदे ढलकने को तत्पर लगा। मनसुख नहीं समझ पाया ये इस शहादत का दुःख या बीते कल का पछतावा।

( यह कहानी मेरा दूसरा ब्लॉग "मनसुख का संसार " से है )

Sunday, 18 September 2016

जो शहीद हुए है ....

    
                    सच है की कोई इसलिए शहादत नहीं देता की हम पत्थर की दीवार बन जाए।  ये शहादत तो इसलिए है की पत्थर नहीं तो उसके प्रतीक जो हम बनते ही जा रहे है उस जड़ मानसिकता को झकझोर सके ।संवेदना की चिंगारी को प्रज्वलित करने के लिए हर बार सैनिको को आखिर रक्त की आहुति क्यों देना पड़ता है।जब तक इसप्रकार की कोई घटना नहीं होती हम यंत्रवत सा बस चलते रहते है।किन्तु प्रतिकार या खुद को सुरक्षित रखने की भाव जब गाहे बगाहे इन घटनाओ के बाद हम प्रयास करते ,स्वयम्भू बुद्धिजीवी एक नए व्याख्यान के साथ खड़े हो जाते है।
                      कलात्मक एवं काव्यात्मक लेखनी से मन तो मोहा जा सकता है,लेकिन सच के आवरण पर पूरी तरह झूठ का पर्दा पड़ा रहे ये बहुत समय तक संभव नहीं रहता। ऐसा लगता है महान  विचारक बन उभरने का भाव तो कही नहीं इस तरह सोचने को मजबूर करता है और आत्मकुंठित हो लगता है की समग्र रूप में देख रहे है। लेकिन  संभवतः लिक से हटने की चाहत से विचार सुदृढ़ नहीं हो सकते बल्कि  उस महान विचार की पुष्टि भी आम जान मानस की सहमति आवश्यक कारक होता है। अपनी उपस्थिति इस भीड़ में दिखाने के लिए ये आवश्यक है कि प्रचलित अवधारणाओं से हटकर ही चले। व्याख्यानों में लंबे और छरहरे वाक्यो से नापाक मनसूबे से प्रेरित तत्व प्रभावित नहीं होते ,किन्तु गोली की एक आवाज कई को थर्रा देती है। तभी तो हम इस  दिग्भ्र्मितता की स्थिति से बाहर नहीं निकल पा रहे है की आखिर हमें करना क्या चाहिए।दुश्मन अपने इरादे में सफल होता जा रहा और बहुतों  अभी तक अपने स्वस्वार्थ प्रेरित क्षद्म मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे है। बेसक उदार विचारो के उदार लोग अगर कुछ ठोस कहने और करने की स्थिति में न भी हो तो किसी खास परिस्थिति को खास रूप में आकलन करने की कोशिस का ही प्रयास रहे तो बेहतर होगा। सामान्य रूप में देखने का प्रयास अंततः नुकसान देह हो सकता है। जिसका विकृत परिणाम सभी के ऊपर बराबर ही होगा। चाहे को  किसी भी विचारधारा से प्रेरित हो। 
                   संभवतः कुछ लोग इस तरह के घटना से व्यथित नहीं होते इसलिए उनमे विचलन न होना अस्वभाविक नहीं है किन्तु ऐसी शहादत पर कुछ व्यथित तो होते ही है इसलिए विचलन स्वभाविक है। इस विचलन को शब्दो को चासनी में उड़ेलकर वाक्यों की लंबी शृंखला से कम नहीं किया जा सकता। हर घटना को अंदर की बातो से तौलना और सामान्य रूप में लेने प्रयास काफी घातक हो सकता है। जब भी आप इस वाकये से एकाकार हो तो सैनिको की बलिदान को बलिदान के ही रूप में देखे।वास्तव में ये बहादुर जवान हमें पत्थर की दीवार से बाहर निकल संजीदा होकर सोचने हेतु ही बलिदान दिए की अगर खोखली विचारधारा से बाहर निकल संजीदा होकर हम न सोचे तो कल शायद इतना बहस करने का समय हमारे पास न हो।
                        राष्ट्रवाद से सम्बंधित अवधारणाओं की फेहरिस्त बहुत  लंबी है। किन्तु हम जिस समाज और काल को जीते है उसी की प्रचलित अवधारणों के अनुसार ही आचरण की अपेक्षा करते है।बीते कल की विवेचना और भविष्य की रुपरेखा पर कल्पित रंगों का आवरण आज में बदरंग हुए दीवारों की तस्वीर नहीं बदलेगा। सैनिक राष्ट्र के नाम पर सदियो से बलिदान होते आये है और आगे भी होते रहेंगे। इस बलिदान पर आँखे नम बेसक न हो किन्तु बलिदानो के विभिन्न निहितार्थ अगर निकालने में हम व्यस्त रहेंगे तो यह नापाक मनसूबे के खिलाड़ियो की बहुत बड़ी विजय होगी चाहे वो देश के अंदर हो अथवा शत्रु देश हो। बुराई से ग्रस्त मानव मन कई कमजोरी धोतक हो सकता है किन्तु देश और देशभक्ति के मामले में भी संजीदा होता है इसकी कई कहानी प्रचलित है। भाषा तो विचार के आदान-प्रदान का माध्यम भर है और जरुरी है की जब आप किसी से संवाद करना चाहते है तो उसे आपकी भाषा का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। अथवा जिस भाषा में अगला संवाद कर रहा हो उस भाषा की जानकारी आपको होना चाहिए। बेसक भावुकता  हमें समग्र मानववाद , युद्ध और विनाश जाने कितने विषय हमारे जेहन में तरंगे बन झिकझोड़ने लगता है और हम इसी बात पर भावुक हो इंसान और इंसानियत की दुहाई देते हुए अपने को कमजोर साबित करने में उलझ बैठते है। ये सत्य है की युद्ध हमेशा बेनतीजा रहा हो किन्तु ये भी उतना ही सत्य है की युद्ध का भय शत्रु को वार्ता के मेज तक खीच के लाते है। कम से कम कायरता तो हमारे शब्दो में नहीं दिखनी चाहिए, हथियार के जवाव में हमेशा हथियार ही चला है। ताकतवर हथियार ही घुटने टेकने को मजबूर करता है। इस बात को कौन कैसे परिभाषित करेगा की यहाँ कौन नौटंकी कर रहा है। वो जो मीडिया में बैठ कर इस तरह के हमलो का जबाब देने को तैयार है या वो जो शब्दो की बाजीगरी करते हुए इस हरकत को सामान्य ठहराने का प्रयास कर रहा है। दोनों में से कोई भी सरहद पर इन स्थितियों में अपने को नहीं पायेगा सामने तो बस सैनिको की छाती ही होगा। किन्तु उस करवाई को भरोसा हम जैसे के विचार ही मजबूती प्रदान करेंगे। बेशक भावनाओ की बेईमानी नहीं होने दे अपने विचार को स्थापित करने के लिए कही ऐसे-ऐसे तर्क अथवा कुतर्क गढ़ बैठे की विभिन्न अनगिनत पाटो में पहले से बटें इन जनसमूहों पर देश का आवरण जो चढ़ा हुआ है उसके तंतुओ को कमजोर करने के आप आरोपी हो। बलिदान होने वाले सैनिक आखिर हमारे भाई है ,ये फिर अपने आपको न दोहराये इसको तो हमें ही अंतिम स्तर पर जाकर सोचना होगा।एक ऐसे कुचक्र का शिकार हो जान गवाते सैनिक और हम समझने में भी अक्षम हो की इसे युद्ध या क्या समझे, वास्तव में उस राष्ट्र के नागरिकों के ढुलमुल विचार सरकारी नीति के रूप में परिलक्षित होता है ।  विचारों के ऊपर जमे पुराने धुंध को हटाने का समय है और बदलाव स्वभाविक प्रक्रिया है।
                     सभी शहीद को शत -शत नमन। 

Sunday, 11 September 2016

कराहता आज ......

मायने बदलते रहते है पल-पल
शायद कल के होने का 
आज में कोई मायने नहीं रहता,
किन्तु फिर भी ,
इतिहास के पन्ने के संकीर्ण झरोखे से
आने वाले कल के होने के मायने में 
व्यस्त हम सब
बस कुचलता जाता है आज।। 
बेचारा जीर्ण-शीर्ण,
बेवश लाचार आज,
कल को सींचने में 
पल-पल बस मुर्झाता जाता है।। 

कल के दबे कुचले
घिनौने से अतीत जिसकी दुर्गन्ध
आज की कारखानों में बनी सभ्यता के इत्र 
दूर नहीं कर पाते,
किन्तु ऊपर निचे ढलानों
बराबरी और गैर बराबरी के तराजू पर तौलते
विरासत के बोझ से दबे बीते कल 
निकलने को आज में आतुर
किन्तु आने वाले कल के मायने में 
आज फिर कुचल दिए जाते।। 

बीते कल पर शोध और सत्यरार्थ कि तलाश 
अँधेरी गर्त पर परी गहन धूलो को 
बार-बार झारने की चाहत ,
किन्तु पल-पल आज पर 
परत -दर -परत जमा होते धूलो को 
हटाने की बैचैनी का 
कहीं कोई निशा दीखता ?
बस सुनाई देती है शोर 
हर एक नुक्कड़ खाने पर 
कल को बदल देने के वादे का ,
और कल को तराशने हेतु 
हर पल चलता रहता है हथौड़ा आज पर 
आज बस  कराहता और कराहता है।  
किन्तु अमृत पान हेतु 
गरल - मंथन कि कथा से 
हमसब  प्रेरित लगते है,
शायद आज में कुछ न रखा है।। 

Wednesday, 31 August 2016

दिल्ली और बारिश

                       
                                 क्या आप दिल्ली में रहते है ? हम तो खैर नहीं है फिलहाल वहा। तो फिर आपको दिल्ली की बारिश रुलाई या आपने रास्तो पर पटे पानी के सैलाब को स्विमिंग रोड समझ उसको पार करते  समय इंग्लिश चैनल पर विजय की खुशफहमी का अहसास किया, अगर नहीं है तो उसे कोसने की जगह नगरपालिका का शुक्रिया अदा करे और इसका आनंद ले । इन रोड पर बहते धार को देखकर भावुक होने से बचे। लगता है अपने लोगो में भावुकता की कमी हो गई है तभी तो मीडिया हमें भावुक होने के बहाने देता और खुद भी भावुक हो जाता है। पहले पत्रकारिता में भावुकता कम तथष्टता ज्यादा होता था किन्तु समय कि मांग ने लगता है कुछ प्रभाव बदल दिया है ।असहिष्णुता का राग अलापते-अलापते ये खुद कही असहिष्णु तो नहीं हुए जा रहे है। ये तो हमारे सांस्कृतिक उद्घोषणा है की हम आलोचना को अपने उत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील औजार समझते है। तभी तो कबीर ने कहा -"निंदक नियरे    राखिये " और हम है की सबके सब पीछे ही पर गए। 
                              अब ऐसा भी क्या कह दिया।  बहुत छोटा सो सवाल तो पूछा ,आखिर जब दिल्ली के रोड पानी से तृप्त हो तो भला ये जानने में कोई गुनाह तो नहीं है की आखिर पहुचने के लिए और कौन से साधन लिए गए,रोड पर कार और नाव एक साथ हो इससे सुन्दर दृश्य और क्या होगा? उन्होंने तो अगर देखा जाय तो भरतीय छात्रों के अंदर किसी भी कार्य को पूरा करने की जिजीविषा को सलाम किया। और हम है की उनकी आलोचना समझ बैठे है। लगे हाथ हमने अपने सरकारों को भी कोसना शुरु कर दिया। लेकिन हम भूल रहे है की हमारे यहाँ हर साल रूप बदल-बदल कर ये सैलाब कही न कही आता ही रहता है। कही के सड़क जाम हो जाते तो कही के कही पूरा क्षेत्र ही कट जाता। इन सबसे नीति-नियंता वाकिफ है। अब अगर वो दिल्ली को दुरुस्त कर दे फिर हम दिल्ली के बाहर वाले ही कहना शुरू कर देंगे कि हमारे साथ भेद-भाव किया जा रहा है। आखिर ऐसी परिस्थिति के दिल्ली में उत्तपन्न होने के बाद ही बाकियों का दुख-दर्द समझा जा सकता है। नहीं तो उड़न  खटोला पर बैठ का इन स्थितियों का जायजा लेने जाना पड़ता है। इससे सरकारी खजाना पर बोझ पड़ता वो अलग। दिल्ली का ये सब नजारा सरकारी धन का दुरूपयोग रोकने में मददगार है हम ऐसा क्यों नहीं सोच सकते। ताज्जुब है। हमें भी ख़ुशी होती है जब सबको एक प्रकार से देखा जाता है। और रही दिल्ली की सुंदरता की बात तो यह सिर्फ राजधानी है और हम है कि दिल्ली को "राजरानी" समझने लगे है। दिल्ली सभी को मोहती है स्वभाविक रूप से विश्व के अन्य गणमान्य भी दिल्ली के इस सुदरतम नज़ारे का आनंद लेने आ सकते है। पर्यटन विभाग को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। 
                      ऐसे मीडिया भी तो दिल्ली में बारिश न हो तब समाचार और बारिश हो जाए तो समाचार। वो तो नगरपालिका से लेकर मंत्री तक खुश होंगे की अपना मीडिया देश की आलोचना सुनना नहीं पसंद नहीं करता , नहीं तो जवाव देते या न देते कैमरा तो पीछे-पीछे तो आता ही। हम है की विश्व की महाशक्ति को अपनी तकलीफ सुना-सुना कर करार पर करार करने में लगे है ऐतिहासिक दस्तावेज की किताब मोटी होती जा रही है। अब जब अगर आप ऐसा समझते है की यह आलोचना है तो हमें तो खुश होना चाहिए की दिल्ली की इस समस्या को विश्व के महाशक्ति ने अगर खुद संबोधित किया है तो इस पर भी एक करार कर ही लेगा ताकि दिल्ली को इससे निजात मिल सके। इस पक्ष को देखने में क्या बुराई है।  बाकी जो इन सैलाब में घिरे है वो चैनलो पर ये दिल्ली जैसे निम्न कोटि का सैलाब कितना देखे। 

Saturday, 27 August 2016

दाना मांझी के बहाने



हम संवेदनशील होने का दम्भ भरते ,
पर जाने वो कब का दम तोड़ चूका है।
कभी -कभी हम दाना मांझी के बहाने
हर ओर से चीत्कार कर,
उस संवेदनशीलता की छाती पर चढ़ बैढ़ते।
इस आशा में की कही ,
इन शब्दो का प्रहार जो कुछ दिन तक मुँह बाएँ,
टीवी की ड्राइंग रूम से ,नुक्कड़ खाने तक
कुत्ते की रोती कर्कश आवाजो में भौकेगा।
शायद संवेदनशीलता जाग जाए।।
किन्तु वो तो कब का जा चूका ,
जब से दुनिया बाजार
और इंसान सिर्फ खरीदार बन के रह गया,
ये ना किसी मांझी की चिंता है
न किसी के दाना की ,
बस सरोकार इस संवेदन के बहाने
बाजारों का सांस चलते रहने की ,
बेसक उसकी कीमत
इंसानी सांस ही क्यों न हो ,
इंसान तो जाने के लिए ही आया है
बाजार का जिन्दा रहना ज्यादा जरुरी है
क्योंकि जब तक हम है
हमें बाजार की जरुरत के बारे में
घुटी में मिलाकर बताया गया है।
ऐसे कितने जिन्दा और मुर्दा लाश 
हम सबके कंधे पर रोज ही घूमता है। 
और हम सब इस इसे न देख 
बस ढूंढते की अगला मांझी
कब इस गठरी को अपने कंधे पर ले निकले 
और फिर हम संवेदना को तलाशे । ।

Wednesday, 17 August 2016

जरा हट के...

                              मैं वाकई चिंतित हूँ ,मानव को लेकर। मैं ही क्यों मुझे लगता है लगभग हर कोई चिंतित रहता है इस मानव को लेकर। खासकर बुद्धिजीवी वर्ग। चिंता के लिए बुद्धि बहुत ही आवश्यक पक्ष है। अभी तक तो पढ़ते आये थे की "चिंता से चतुराई घटे " किन्तु अब लगता है की चतुराई के साथ चिंता आवश्यक है नहीं तो पता नहीं कौन सी जमात में समझे जाएंगे। मैं उलझन में भी हूँ और असमंजस में भी। आखिर ये कुदरत की कौन सी रचना है जिसके रंगों-रोगन का कार्य आज तक बदसूरत जारी है। धरती पर जीवन के उद्भव से लेकर सिर्फ इंसान ही एक ऐसा जीव है जिसका विकास के क्रम अनवरत जारी है। बाकी सब के सब जीव बनाने वाले के काफी कृपापात्र निकले ,जिस रूप में थे आज तक उसी रूप में चल रहे है। आखिर उनके लिए भी कुछ करने को रहने दिया जाता।  मुझे पता नहीं क्यों ऐसा है जिसे ऊपर वाले की सबसे खूबसूरत रचना हम मानते ,ये कभी -कभी सबसे निकृष्ट प्रतीत होता है। आखिर ऐसा क्यों है बाकि किसी भी जीव के मूल स्वाभाव में कोई परिवर्तन नहीं है और एक इंसान है जिसकी प्रवृति बदलता ही जा रहा है। हम सृष्टि के प्रादुर्भाव से संभवतः बदलते ही जा रहे है।  क्या हमारे साथ बनाने वाले ने नाइंसाफी की कि हमें अधूरा बनाकर छोड़ दिया या और कह दिया बाकी बचा हुआ काम हम खुद ही देख ले और हम अनवरत लगे हुए है। नहीं तो इंसान के इस धरती पर कदम रखने के साथ ही आखिर किस खोज में हम बेतहासा लगे हुए है ?
                           मुझे लगता है की इस धरती पर कोई ऐसा काल नहीं रहा है जब आज के जो समस्याए मुंह बाए खड़ी  है वो नहीं रहा हो।बेसक समय समय पर उसके रूप बदलते रहे हो।  अर्थात समस्याएं हमें प्रारब्ध से मिली हुई है और ये अनवरत रहने की ही सम्भावना है। उसके अनुपात में समय समय पर बेसक फेरबदल चलता रहेगा। तो क्या इंसान इंसान ही रहेगा या और कुछ बन जाएगा।क्या आश्चर्य नहीं है कि सबसे बुद्धिमान जीव खुद को मानने वाला इंसान ,आजतक खुद से ही संघर्षरत है ? पूरी मानव समिष्टि क्या दुख की क्षीर सागर पार करने में कभी कायम होंगे या ये रूप बदल बदल कर हमें उसपर विजय पाते रहने की आत्मप्रवंचना का अवसर ही मिलता रहेगा? कही न कही मुलभुत रचना में ही कोई मूल गलतियां बनाने वाले ने जानबूझकर तो नहीं छोड़ दिया। और हम है की उसकी गलतियों को सुधारने का भ्रम पाले बैठे है और वो बैठा बैठा मुस्कुरा रहा हो। 
                            क्या ये जरा हट के भी सोचने और चिंता करने की कोई गुंजाइस है या कही मैं भी तो नहीं सोचने का भ्रम पाल रखा हूँ।     

Sunday, 7 August 2016

रस्मी बादल


फिर लौट आया है       
वो कारवां बदलो का,
जो रुखसत हो जाता है जाने कैसे
बिन बरसे ही इन राहों से।
नजर टिकती है हर वर्ष कि भांति
कि अबकी शायद  बरस जाये
 धो दे कहल सब अंतस के।
बहुत गरजते है सब इस मौसम में
लहलहाने को मचलता मन
सींच देगा ये अबकी बार धरा ऐसे
उर्वरकता बस लहलहा उठेगी।
शोर है , कोलाहल भी छाई है
ये मास ही है कुछ ऐसा
बोने को बीज आतुर सब
सुगबुगाहट देशभक्ति चीत्कार सी  लगती ।
बरसेंगे मन सबके, सावन के फुहारों से
कुछ कर गुजरने कि
बयार मन को लहलहा देगा।
हर बार ये ऋत कुछ ऐसा ही लगता है ,
रस्मी बादल जो न शायद बरसता है।
मिट्टी में दरारें नमीं पर प्रश्न करते
अगर बरसते बादल तो ये कैसे इतना दरकते।।
फिर लौट आया है
वो कारवां बदलो का
जो रुखसत हो जाता है जाने कैसे
बिन बरसे ही इन राहों से।      

Wednesday, 28 October 2015

इच्छाएं ...

आसमान की गहराई अनंत
जैसे हमारी इच्छाएं  ,
गहराते बादल बस उसे ढकने का
चिरंतन से करता विफल प्रयास
दर्शन मोह से विच्छेदित कर
आवरण चढ़ाने को तत्पर  ,
एक झोंका फिर से
उस गहराई को अनावृत कर देता।
और फिर से अनगिनत
टिमटिमाते तारे की तरह
प्रस्फुटित हो आते
कुछ नई लतिकाओं की चाह ,
जब  धीर गंभीर सागर भी
मचल जाते है चन्द्र से बसीभूत हो
तो हम तो मानव है।
सम्मोहन के लहरों 
पर सवार हो उसे पाने की प्रवृति
ही तो  प्रकृति प्रदत है ,
उत्तकंठ लालसा छदम दर्शन से त्याग 
कर्म सापेक्ष न हो 
कही अकर्यमन्यता का पर्याय तो नहीं। । 

Monday, 26 October 2015

......दरार ...

दरारें दिखती है    
दरकती और दहकती सी 
सब कुछ खामोश है ,
बस जैसे ऊपर वाष्प आच्छादित हो 
और नीचे पानी में उबाल है। 
मौन अंदर ही अंदर चीखता है 
काश कोई दिल की आवाज सुने 
किस कदर प्यासे है 
जैसे की धरती अब बंजर हो चली हो। 
आक्रोश और नफरत 
भरे बाजार बिक रहे है 
प्रेम के सौदाई ने नए मुकाम गढ़े 
और नफरत को प्रेम से दिल में बसाया है। 
हकीकत है कि चिंता के लिए 
सभी चिंतित होते है 
रहनुमाओ की फ़ौज तलाश रही है 
इन चिन्ताओ को अपने रहनुमा के लिये। 
अपने ढर्रे पे  तो जिंदगी  लौट ही आती है
कभी रुकी तो नहीं 
बस कुछ के सितारे विलीन हो जाते 
और कितनो के सितारे इसमें चमक जाते है।

Friday, 25 September 2015

अक्षर ,शब्द और हमारे मायने....

शब्द जैसे मात्र अक्षरो का समूह
अपने अर्थ की तलाश में ,
एक दूसरे से टकराते और लिपटते।
वाक्य बस शब्दों का मेल,
आगे और पीछे खोजते अपने लिए
इक उपयुक्त स्थान ,
अपने होने का निहतार्थ और पुर्णता के लिए।
किन्तु एक मात्रा ,अक्षर ,शब्द या वाक्य
सब तो अपने आप मे परिपूर्ण है,
और फिर भी बदल जाते भाव संग सार भी ,
जब समुच्चय में उपयुक्त न स्थान है।
ये तो बस कठपुतली मात्र  है,
किसी सोच और संकल्पना की
जो उभारते है बनके मात्र साधन,
किन्तु खुद झेलते है दंश 
अनर्थ के अपमान का,
त्रिस्कृत  और धिक्कार शब्दों सा । 
पूर्णता भी स्थान और संग में
अपना चेहरा बदलता  है,
अक्षर और शब्दों का विन्यास
शायद ऐसा ही कुछ कहता है।
हमारे अर्थ भी किसी के साथ होने 
या न होने के मायने तय करते है। 
एक उपयुक्त स्थान,
मानक न कोई आगे या पीछे का 
निहित जीवन ध्येय तब ही पूर्ण होते है ।

Saturday, 19 September 2015

बस सच सामने आना चाहिए.....


                   हमें खेलने की आदत है।  पता नहीं कब से सब खेलते आये है।  धर्म  से,जाति  से, क्षेत्र से, जज्बातों और न जाने कितने नए -नए खेल सामने आते रहते है और ये कहानी रोज यूँ  ही चलती जाती है।  कुछ करने के हजार बहाने है और न करने के हजार फलसफे। अब हम जैसे तो दर्शक बन बस अपनी क्षुद्र बुद्धि के अनुसार उसपर बस तालिया ही बजाते निकल जाते। इस आशा में की इस बार शायद हमारे लिए कुछ खास होगा। किन्तु क्रमिक चक्रिक परिवर्तन हमें वही लेकर खड़ा कर देता है,जहाँ से कुछ नया का भान कर हम प्रस्थान करते है ।  कुछ नया होने  का उत्साह आखिर हम किन बिन्दुओ का विश्लेषण कर के करते ये तो बस विश्लेषण का ही विषय है। लेकिन इसी बहाने कुछ नया हो जाय तो क्या छिद्रान्वेषी की भूमिका निभाए या सराहना करे  दिमाग यहाँ किंकर्त्यवबिमूढ़ हो जाता है। 
                   जिस राज को राज रखने के प्रयास कब से जारी था। उसे अब पर्दा के अंदर बेपर्द किया गया है।  आने  वाले कल में ये कितने का राज खोलेंगे ,देश और समाज के उच्चतम मानदंडो को ढ़ोते हुए कदमो को ये राज पिटारे से निकल कर कही लकवा न मार दे।  वैशाखी के सहारे इतिहास के विरासत को ढोते-ढोते थक चुके इन कदमो पर इसका प्रभाव पड़ा तो आने वाली कितनी पीढ़ी इससे प्रभावित होगी कहना मुश्किल है। खैर कुछ नया करने के लिए बिलकुल ५६ '' का चौड़ा सीना हो ये भी नहीं जरुरी है। किन्तु इन कदमो से बहुत सी छातियो में धड़कने सांय -सांय कर धड़कना शुरू कर दिया होगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सब-कुछ करने के पहले शतरंज के विसात के आदि अगली चाल से पहले कौन इतिहास के झरोखे से झांकेगा ये तो अब आने वाला कल ही बताएगा। 
                      परन्तु हमें तो बस आम जान की तरह अपने नायक के विषय में जो हकीकत है उतने से ही मतलब है। स्वभाबिक तौर पर अगर राष्ट्रनायक के विषय में कुछ दशको में गुजरे अतीत एक सच के रूप में सामने न आकर किस्से-कहानियों के रूप में वर्णन हो तो उस देश की प्राचीनतम इतिहास तो हमेशा  संदेह के घेरे में रहेगा। अतः जो भी हो बस सच सामने आना चाहिए। 

Friday, 18 September 2015

अनगढ़े पात्र

चौतरफा शोर और कोलाहल 
भीड़ भरे राहे,
रौंदते कदम व  सरपट  चक्के
अनजान से मंजिल तक,
अनगिनत ये मूक दर्शक
कतार बंद बैठे  
जाने किस इन्तजार में। 
खामोश लब याचना भरे कातर दृष्टि
उसकी ख़ामोशी उस कोलाहल में भी 
जाने कितना कुछ कहती है,
शब्दों में कुछ पनपता नहीं 
पर निगाहे चीत्कार करती है। 
खनकती है टकराकर 
जब कटोरी की दुनिया से सिक्के  
अकुलाहट भरे लब 
सूखी टहनियाँ सी
फ़रफ़राती है।  
इस रंगमंच पे गढ़े है 
ये कैसे अनगढ़े पात्र भी 
इनको देख, गढ़ने वाले भी 
शिलाओं में मुँह छिपाते है।
इन्हे देख पुनर्जन्म पे 
हम यकीं शायद करते है ,
क्योकिं प्रारब्ध का गढ़ भाव 
सब बस आगे-ही-आगे 
बढ़ते जाते है।   

Tuesday, 8 September 2015

नन्हा फरिस्ता

खामोशी चीखती है लहरों से  टकरा कर  
औंधे मुँह लेटा जैसे माँ के गोद  में 
न सुबकता न ही रोता कंकालो की बस्ती से दूर
लगता है गहरी नींद में सोता  ।

------------------------------------
जिंदगी खुद से शर्मसार है
मौत उसको मुँह चिढ़ाती
चिटक रही सूखे टहनियों सी
दम्भी सभ्यता के वट वृक्ष की  ।

------------------------------------
नन्हा फरिस्ता लहरो से खेलकर 
मुस्कुरा के चल दिया 
पाषाण ह्रदय शिलाओं को भी 
आंसुओ से तर गया। 

-------------------------------------
कितने नींद से जागे अब 
उसे सोता सोचकर  
कई राहें अब खुल गई नई 
उन बंद आँखों को देखकर। 
--------------------------------------

Saturday, 5 September 2015

आप सभी को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामना 


अब आडम्बर कोई नहीं,सब तेरा प्रभु इंतजार करे ,
कुछ शुक्ल नहीं दिखता बस चारो ओर अज्ञान भरे। 

कल्कि का कालिख उड़ रहा सब ओर तम  अँधेरा है,
भीग रहे कितने नयने यहाँ छाया अँधियारा गहरा  है। 

कर्तव्य का कोई मोल नहीं मोह ने सबको लीला है, 
गीता ज्ञान की बाते सिर्फ टकराती मंदिर शिला है। 

जो लाँघ चले मंदिरशाला तेरे विकृत गुणगान करे, 
चौसंठ कला नहीं कोई बस रसिया कह सम्मान करे। 
  
इस बार फिर तू आएगा हम मधुर धुन पर नाचेंगे,
कितने ही बिकल विलापो को बस कुछ पल ही  ढाकेंगे। 

अबकि आकर मुरली मनोहर कुछ ऐसा चक्र चला देना, 
शिश अलग अज्ञान का कर पुनः ज्ञान रवि फैला देना। 

Saturday, 7 March 2015

अब हम चलते है ।

कही कुछ ठिठक गया
जैसे समय, नहीं मैं । 
नहीं कैसे हो सकता
जब समय गतिशील है
फिर कैसे ठिठक गया,
अंतर्विरोध किसका
काल  या मन का ?
मन तो समय से भी
ज्यादा गतिमान है
फिर कौन ठिठका
काया जड़ या चेतन मन ?
समय का तो कोई बंधन है ही नहीं
फिर ये विरोधाभास क्यों
मन को समझाने का
या खुद को बहलाने का?
पता नहीं क्या
बस अब हम चलते है ।