Thursday 30 August 2018

जंगल मे मारीच

कुछ शोर और क्रंदन है,
शहर के कोलाहल में
ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं में
जंगलो की सरसराहट है।
वो चिंतित और बैचैन है
अपनी "ड्राइंग रूम" में
की अब पलाश की ताप से
शहर क्यो जल रहा है ?
व्यवस्था साँप की तरह फुफकारता तो है
लेकिन प्रकृति के इन दुलारो को
विष-पान किसने कराया है ?
लंबी-लंबी गाड़ियों से रौंदते
इन झोपड़ियों में पहुंच कर
यहाँ के जंगलों में
ये जहर किसने घोला है?
मतलबों के बाजार में
कब कौन खरीदार बन
व्यापार करने लगे, कहना मुश्किल है ।
चेहरे पर नकाब कोई न कोई
हर किसी ने लगा रखा है
फिर व्यवस्था के संग विरोध
या फिर विरोध की व्यवस्था...?
इसलिए तो अब तक
इन जंगलो में मारीच घूमते है
वो हमको और हम उनको छलने मेंलगे रहते है ।।

Monday 27 August 2018

नीलगिरी की गोद मे ...

"नीलगिरी' नाम काफी सुना सा है और इस नाम के कौंधते ही नजरो के सामने दक्षिण की नीलगिरी पहाड़ियों की श्रीखला तैरने लगता है । जहां "ऊंटी" हरी भरी वादियों के बीच अपने खूबसूरती के लिए विख्यात है।

                 किन्तु वर्तमान जिस "नीलगिरी" में मैं यायावरी कर रहा हूं यह  ओड़िसा के बालेश्वर जिले में है।बालासोर ही बालेश्वर है और बालेश्वर ही बालासोर...। इसको भारतीय रेल ने स्टेशन की पट्टिका के हिंदी और अंग्रेजी की वर्तनी में स्पष्ट कर दिया।बालासोर जिला देश के पूर्वी तट बंगाल की खाड़ी पर स्थित है और यहां से लगभग 20 की मि की चांदीपुर स्थित है। जो  भारतीय थलसेना  की एकीकृत परीक्षण रेंज के लिए विख्यात है।इस रेंज से कई परमाणु सक्षम बैलिस्टिक प्रक्षेपस्त्रो का परीक्षण हो चुका है।

           बालासोर से कोई 20 की मि राज्य हाई-वे 5 पर जंगलो के बीच पहाड़ी की तलहटी में नैसर्गिक सौंदर्य के बीच प्राचीन काल से नीलगिरी ने अब तक लगता है ऐसे ही संजोये रखा है। जो किसी भी मायने में किसी प्रषिद्ध पर्यटन स्थल से कम नही है । इसकी जड़ प्रागैतिहासिक काल से जुड़ी हुई हैऔर पांचवी शतब्दी से इसके राज्यगत इतिहास में दर्ज है। अपनी राज्य की वजूद को नीलगिरी ब्रिटिश शासन में भी बचाये रखा। तो फिर आप समझ गए होंगे कि लगभग 564 देशी रियासत में "नीलगिरी" भी ओडिशा के 26 "प्रिंसली स्टेट"  में एक रियासत था। जो कि आजादी के बाद 1949 में भारत गणराज्य में शामिल हुए। आपको इन यादों से जुड़ी उन काल की राजसी निशानी के तौर पर "नीलगिरी राजबाटी" अब भी मौजूद है। जो कि उस शासन में निर्मित जगन्नाथ मंदिर से बिल्कुल बगल में है।धार्मिक दृष्टिकोण से "पंचलिंगेश्वर महादेव" की अपने आप मे एकमात्र इस प्रकार का विख्यात मंदिर है।

             कण-कण में बिखरे महादेव को मंदिर में देखने जाने से उपयुक्त इन पहाड़ियों के भ्रमण हमे लगा। क्योंकि घड़ी की सुई की रफ्तार बता रही थी कि समय पर्याप्त नही है। पहाड़ी के ऊपर कुछ दूर चढ़ते ही पुरातन पर नवीनता की झलक दिख गई। जहां रास्ता बाधित था और डी आर डी ओ ने इससे ऊपर अपने प्रभुत्व को स्थापित कर रखा है। जिसकी नीव पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अबुल कलाम ने रखा था ऐसी सूचना मौजूद एक शिलापट बता रहा है।

                   रोड के दोनों ओर लंबवत "नीलगिरी" यानी यूकेलिप्टस का पेड़ बरबस काश्मीर में रास्ते को आच्छादित करती चिनार के पेड़ की ओर बरबस ध्यान खींच ले जाता है। सौंदर्य की तुलनात्मक विवेचना तो व्यर्थ का प्रलाप है क्यो असीम की सीमा निर्धारण आपकी चक्षु-क्षमता का पर्याय है तो फिर जैसी जिसके निगाहे...। इन जंगलो में भ्रमण सिर्फ आंखों को आकर्षित तो करती है, लेकिन इन पहाड़ियों में बसे गांव और लोग की वर्तमान की हकीकत शासन के कई दावों की तस्दीक नही करता है।  विरोधाभासी जीवन के यथार्थ में दोहित प्रकृति से सुख तलाशते लोगो को जहां एक ओर यहां की रमणीय प्रकृति आकर्षित करती है । वही अब तक प्रकृति को संजो कर रखे लोगो की जीवन यापन का संघर्ष कलम की पैनापन को और तीखा करने के अवसर भी देता है।




                किन्तु मैं इन सबसे पड़े नीलगिरी की इन खूबसूरत वादियों में ज्यादा से ज्यादा भटकना चाहता हूं कि देखे आखिर नीरवता में बिखरी मोती की चमक  इतना आकर्षित कैसे करता  है...?

Wednesday 15 August 2018

कुछ हट के ....।

मैं सोचता हूँ
कुछ ऐसा ही जेहन में उभरता है,
जब उमंग और उत्साह से लबरेज
इस एक दिन ...शायद हाँ
इस एक दिन
देश प्रेम सार्वजनिक होकर उभरता है।
और जब लहराता है तो
कई जोड़ी आंखे उसे निहारते
वही कही आसमान की
अनंत गहराई में खो जाती है शायद ।
शायद हाँ मेरी भी निगाहे
उस विस्तृत अम्बर में कुछ खिंची हुई
रेखाओ को ढूंढती है
विस्तृत नभ में खोता हुआ
जैसे खुद में सिमटता जाता हूं।
इस एक दिन...शायद हाँ
इस एक दिन
बंधन की कुछ डोर जेहन में
जैसे खुद बांधने लगता है ।
वह उमंग और उत्साह
कुछ मलिन हो चेहरे पर उभरता है
एक-एक कर कई बंधन उभरते है
खुले आसमान में लहराते हुए
आज स्वतंत्र और परतंत्र की
कई गांठे मन मन मे
खुलते और बंधते है।
मैं बस इतना सोच पाता हूं
जैसे तिरंगा बेफिक्र
आसमान में लहरा रहा है
वैसे क्या हम कभी
स्वतंत्र हो इसी धरती पर
कभी विचर पाएंगे ??

       आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

Friday 3 August 2018

कुल्लड़ में चाय ....

बात ईसा पूर्व की है...लगभग 2700 वर्ष...। चीन के सम्राट के हाथ मे गर्म पानी का प्याला था और मचलती हवाओ ने कुछ पत्तो को अपने संग लाया और उसे सम्राट के प्याले में डुबो दिया। पर सूखे पत्ते की गुस्ताखियां देख जब तक सम्राट अपने चेहरे का रंग बदलता गर्म पानी ने अपना रंगत बदल दिया और वाष्प ने अपने संग विशेष खुसबू से सम्राट को आनंदित कर दिया। एक चुस्की पीते ही वह समझ गया कि वह भविष्य के लिए एक और पेय पहचान लिया है और फिर चीन से पूरी दुनिया में फैल गया।
             भारत मे जैसे हर चीजे अंग्रेजो की देन मानी जाती है वैसे ही यह पेय भी उन्ही का देन माना जाता है....उससे पूर्व असमी जो पत्तियों को खौला कर पेय बनाते थे उसे क्या कहा जाय पता नही....?जब तक आप किसी भी चीज का व्यवसायिक दोहन नही करते है तो मुफ्त तो मुफ्त होता है। तो अंग्रेजो ने इसका व्यवसायिक दोहन कर इसके साथ अपना नाम जोड़ लिया ।
           उस समय इसे जो भी कहते पता नही....लेकिन आजकल इसे "चाय" कहते है। बाकी तो आप सभी  इससे परिचित है। इसमें खास कुछ नही है.....बस आज सुबह-सुबह कुल्लड़ में चाय चाय मिल गई..।। अब कुल्लड़ धीरे-धीरे विलुप्त ही होता जा रहा है। एक बार तत्कालीन रेल मंत्री ने 2004 में ट्रेन में मिट्टी के कुल्लड़ चलाया भी लेकिन कुछ सालों बाद मंत्रीजी का राजनैतिक जीवन मिट्टी में मिल गया और आगे चलकर रेल ने भी इस मिट्टी के प्याले से किनारा कर लिया। खैर.....।।
           आज सुबह-सुबह कुल्लड़ देख चाय नही जैसे कुल्लड़ ने अपनी ओर खींच लिया। प्याले में चाय भरते ही चाय ने अपनी तासीर बदली और मिट्टी की सौंधी खुसबू चाय के साथ मिलकर उसके स्वाद को एक अलग ही रंग दे दिया हैं।जो आपको किसी और कप में नही मिल सकता।
           जब धरती ही स्वयं के अस्तित्व के लिए संघर्षरत दिख रही हो तो कुल्लड़ का क्या कहना..?अतः सुबह-सुबह जब सिंधु घाटी सभ्यता से  यात्रा कर पहुची कुल्लड़ फिर आपके हाथ लग जाये और जो सभ्यता के मध्याह्न से प्रचलित पेय से लबालब भरा हुआ हो तो आप चाय के हर चुस्की के साथ सभ्यताओ के बदलते जायके को महसूस करने की कोशिश कर सकते है।इस एक प्याले में जब जीवन के मूलभूत पंच तत्व -थल(कुल्लड़) ,जल (चाय)  पावक( इसकी गर्माहट ), गगन  के तले ,समीरा(चाय का वाष्प) जब एक-एक चुस्की के साथ आप के अंदर समाहित होता है।तो आप महसूस कर सकते है कि  एक प्याला कुल्लड़  से भरा चाय आपको कितने ऊर्जा  से ओतप्रोत कर देता है। 
       जगह और स्थान कोई भी हो मिट्टी में बिखरे आनंद को ढूंढे ...नाहक क्षणों को मिट्टी में न मिलाये।सभ्यता के आदिम रूप जहां बिखरे है वही सभ्यता के भविष्य का रूप है..ये आप समझ ले।तो फिर एक प्याला चाय कुल्लड़ में मिल जाये तो भूत और भविष्य एक साथ एकाकार हो जाते है और ये सर्वोत्तम आनंद का क्षण है....एक कप कुल्लड़ में चाय... है कि नही??
              अंत मे हरिवंश राय बच्चन की "प्याला" शीर्षक कविता की दो पंक्तियां-
            मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
            क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !
    

Friday 8 June 2018

क्या जल रहा है...?

नीरो ...हाँ मैन सुना है....
कही इतिहास दोहरा तो नही रहा...।काल और सीमा से परे जाकर..।
जब हमने उससे द्वेष और ईर्ष्या किया तब ...जब प्रेम से भरी उसके प्रति दीवानगी देखी तब...। हाँ ...कुछ ऐसा ही है ...वो घृणा से उत्त्पन्न असृप्यता के उद्द्बोध से  उन अनगिनत सारो से एकरूप हो एक उत्कट प्रेम में आराध्य है...।ऐसा पहले हुआ क्या...?
   हाँ फिर अब नीरो तो नीरो है....।
तो क्या नीरो अब भी वही है...? क्या वाकई उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम एक रक्तिम गंध फैल गई है..? सांसो में क्या नीरो के बांसुरी से निकली राग कही एकरक्त पिपासा की उत्तकंठा जगाती है...? जल क्या रहा है...? वो रिस गए रेसे जो वाकई इतने कमजोर हो चले कि छिद्र से बस घाव और मवाद रिसते दिखते या फिर सदियो की वो समरसता की तरल भाव जिसको भरते रहने का भार बस तराजू की एक तुला सा किसी एक को...क्या यह जलकर वाष्पीकृत हो रहा है...?
   हाँ... लगता है ...नीरो बासुरी यही कही बजा रहा है...। कैसे धुन पर बिलबिलाए -बौखलाए जो इक्कठे नाच रहे...कौन है ये...?नीरो की धुन में ऐसी क्या खास ...सुनकर एक साथ सिमट गये...।
    जल क्या रहा है....रोम तो सदियो गुजर गए...फिर जलने कि दुर्गन्ध ...नही..नही..मैं तो कहूंगा सुंगंध है...यही कही यज्ञ का हवन कुंड है और लगता है कई मान्यताये एक -एक कर जल रहे हैं..।
     जब ऐसे ही शुभ मुहूर्त का यज्ञ काल चल रहा है तो नीरो बासुरी न बजाए तो क्या करे...?
   कुरुक्षेत्र के युद्ध के दौरान क्या श्रीकृष्ण ने बासुरी का परित्याग कर दिया था...??