Sunday, 12 July 2026

दीघा यात्रा संस्मरण

 कबीरदास कहते हैं -

“हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।
बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥”
अर्थात साधक जब ईश्वर रूपी समुद्र में मिलता है, तो उसका अलग अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
अथाह मिलो तक क्षितिज से एकाकार विशाल विस्तृत फैले पारवार पर मचलते मौज या तो आपके आँखों में समा जाते है या फिर आप उन पलो के लिए इन मौजों में विलीन हो जाते है। जब उर्मी इन सागर पर हिलोरे लेते है तो लगता है जैसे सैंधव राग के सुर कानों में घुलने लगे है।असंख्य लहरों के हिलोरों से जब मधुर संगीत सागर के तट पर संगीत लहरी छेड़ते है तो जैसे आप वर्तमान से खोकर इन्हीं में बेसुध खो जाते है।फिर आप सागर की राग में घुल जाते है या ये राग आपके अंतर्मन में गहरे तक बैठ जाता है।
सागर अपने कई रूप आपको किसी भी तटीय क्षेत्र में सम्मोहित करेगा।बशर्ते आप मोबाइल में अपनी छवि केंद्रित करने ही में पूरी तरह मशगूल न होकर सागर की प्रकृति से अपनी प्रवृति को भी एकाकार करना चाहते हो। इसलिए "बिरकुल" क्षेत्र घूमने की योजना जाजपुर के प्रवास के दौरान कई बार बना किंतु अमली जामा नहीं पहना सका।कोलकाता आने के बाद भी योजना बनते हुए भी कार्यान्वित नहीं हो पाया। वैसे देखे तो यह जगह कोलकाता और जाजपुर रोड के लगभग मध्य में है। दोनों स्थान से लगभग दो सौ किमी की दूरी पर है।
सप्ताहांत के दो दिन सरकारी अवकाश है। किंतु कोलकाता प्रवास अभी तक या तो विभिन्न कारणों से ध्यान नहीं गया या फिर और कई कारण रहे होंगे। उनमें से शायद जगन्नाथ पूरी की गाहेबगाहे कई यात्राएं इसका कारण हो सकता है ,लेकिन सैन्धव के भिन्न क्षेत्र के अनुभव और उसमें उठती तरंग का रोमांच कुछ अलग ही है।हर सागर में लहर एक सी उठती है लेकिन उसके राग हर कोई कई रूप में आनंदित होता है।
वैसे यहां बंगालियों में उनके छुट्टी में पर्यटन क्षेत्र के रूप में आकर्षण में एक नाम उभर कर आता है। कोई अगर कही जाने का प्लान बना रहा हो और अगर आप उनसे पूछेंगे कि कहा का प्लान है। तो उनका उत्तर आयेगा देख छी "दीपू दा" मोदे जाबो। दीपू दा अर्थात दीघा, पूरी अथवा दार्जिलिंग इनमें कही भी जाऊंगा। हमने भी सोचा पूरी और दार्जिलिंग घूम ही चुके है तो फिर दीघा भी देख ही लिया जाए।
ऐसे प्रस्ताव सामान्यतः ध्वनिमत से ही पास हो जाते है, फिर भी गृह मंत्रालय के समक्ष औपचारिकता वश रखा गया, कि उलाहना सुनने को मिले कि जब सारे फैसले पीएमओ ले ही रखा है, फिर हम आखिर कौन है। किंतु जब योजना अनुरूप हो तो चाहे घर हो या सरकार कोई विरोध नहीं होता। अतः हम यात्रा की रूप रेखा तय करने कई पहलुओं को देखने की कोशिश करने लगे।खुद की गाड़ी या यात्रा के अन्य साधनों पर विमर्श के बाद यह तय कर लिया गया कि अपने संसाधन ही यात्रा के लिए उपयुक्त होगा। अब ठहरने के लिए विभिन्न जुगाड़ साधनों में विकल्प को तलाशने का प्रयास किया गया। किंतु चुकी अंतिम योजना अंतिम समय में तय हुआ तो लगभग सभी सरकारी गेस्ट हाउस के संपर्क सूत्र ने बताया कि मैं समय से थोड़ा पीछे प्रयास किया ,अब कोई गेस्ट हाउस खाली नहीं है। अब चूंकि समय के पहले मुझे खुद पता नहीं था कि हम जाने वाले है तो फिर उनको कैसे बताता। अतः अंतर्जाल के बिछे दुनिया में होटल को खंगाल कर हमने अपने लिए एक अदद होटल बुक कर दिया।वैसे आपको इस समय लगभग ढाई से तीन हजार में अच्छे होटल मिल जायेंगे। वैसे आप जानते ही है कि मूल्य हमेशा मांग के समतुल्य होता है। सप्ताहांत में होटल के चार्ज अन्य दिनों के साथ तुलनात्मक अध्ययन से पता चल गया कि बंगाली "दीपू दा" की ओर सदैव आकर्षित रहते है।
वैसे मौसम विभाग ने इस पूरे क्षेत्र को "येलो अलर्ट" के दायरे में रखा था। यह जानकर दिल का घबराना वाजिब है। इन स्थिति में अब्दुल अहद साज़ का ये शेर दिल को दिलासा देने के लिए उपयुक्त लगा -

दोस्त अहबाब से लेने न सहारे जाना
दिल जो घबराए समुंदर के किनारे जाना!!
इसलिए सोचा चल कर एक बार बादलों के कोलाहल के बीच लहरों की अटखेलियां क्यों न देखा जाय। फिर समुद्र आसमान से गिरते मोती को कैसे समेटता है इन दृश्य को दिखना भी अपने आप में एक रोमांच ही है।वैसे इंसान अनुमान तो लगा सकता है, लेकिन वो कितना सही होगा प्रकृति अपनी प्रवृति के अनुरूप इस इंसानी क्षमता को जानता ही रहता है।अपने इच्छानुसार ऐसे मनःस्थिति में हम विज्ञानी भविष्यवाणी से ज्यादा प्रकृति की प्रवृति को अपने अनुकूल मान फैसला ले लेते है।अतः हमने निकलने का फैसला कर लिया। जब ये सीपियां न जाने कब तक इन बूंदों की आश में आसमान की ओर निहारते रहते है तो, अभी तो हमे इन बूंदों को सागर तक पर थिरकते देखने का अनुकूल समय है।तभी तो आचार रामचंद्र शुल्क ने कहा -

स्वाति बूँद जब सीप में, करे प्रवेश अघात।
सहि पीड़ा वह रत्न बन, जग में होय विख्यात॥
बेशक आप कितने भी संकल्प कर ले कि सुबह जल्द से जल्द निकल चलेंगे।लेकिन अगर आप अपने वाहन से निकलना तय करेंगे तो समय का संकल्प आपके सुविधा पर सदैव थोड़ा प्रभाव डाल ही देता है। अतः जहाँ हम पांच बजे निकलने की योजना बना रखे थे, लेकिन हमे निकलते निकलते सात बज गये। शनिवार के दिन और सुबह का समय होने के कारण हम जल्द ही कोलकाता शहर को छोड़ते हुए शिवपुर हावड़ा के रास्ते राष्ट्रीय राजमार्ग-116 पर आ गए। किंतु यह रास्ता थोड़ा सकड़ा और भीड़ भाड़ वाला था, इसके बनिस्पत अगर दक्षिणेश्वर के रास्ते आप राष्ट्रीय राजमार्ग पकड़ते है तो आपको समय कुछ कम लग सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 116 पर चलते हुए सुबह लगभग साढ़े नौ का समय हो गया। नाश्ता के लिए हम कोलाघाट में रुके जो लगभग कोलकाता से पैंसठ की मि दूर है। चूंकि पहुंचने की जल्दी थी अतः नाश्ते में ज्यादा समय न लगाकर हम आगे की ओर निकल गए।
जैसे समुद्र की आती लहरों का कोई तय दायरा नहीं होता और आप सिर्फ अनुमान लगा सकते है। वैसे ही जब आप खुद की वाहन से जा रहे हो तो पहुंचने का अनुमान लगा सकते, क्योंकि रास्ते में आने वाले अवरोध का कोई तय दायरा नहीं हो। कोलाघाट से अभी कुछ दूरी ही तय किया था कि लगभग लंबी जाम के गाड़ी के ब्रेक लग गए। पता चला कि आगे दो ट्रक बीच रोड पर भिड़े हुए है। राष्ट्रीय राजमार्ग के व्यवधान की सूचना स्थानीय प्रशासन को पहुंच चुका था। काफी मशक्कत के बाद लगभग रोड के कुछ दायरों को खाली करा लिया गया, जिसमें छोटे वाहन निकल सकते थे।लगभग डेढ़ घंटे के बाद फिर से गाड़ी ने रफ्तार पकड़ लिया।
अब हम तामलुक पहुंच गए। लगभग सौ कीमी की यात्रा अर्थात दीघा और कोलकाता के मध्य। तामलुक पूर्व मेदनीपुर का जिला मुख्यालय है। रूपनारायण नदी के तट पर बसा यह शहर प्राचीन काल में 'ताम्रलिप्त' के नाम से प्रसिद्ध था और एक प्रमुख बंदरगाह था। अगर आप खड़कपुर के रास्ते आ रहे है तो भी आपको तामलुक आना होगा।दीघा भी पूर्व मेदनीपुर जिला अंतर्गत आता है। अब हम दीघा के रास्ते कार का रुख राष्ट्रीय राजमार्ग 116 B पर मोड़ लिए। अब सड़क के किनारे के नजारे धीरे धीरे तटवर्तीय क्षेत्र के वनस्पतियों से आच्छादित हो गया और हरीतिमा की शोभा निखरने लगा।लंबे लंबे नारियल के पेड़, झाऊ और काजू मुख्य रूप से नजर आएंगे। लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद दीघा के प्रवेश द्वार पर पहुंच गए।गूगल ने बिना किसी व्यवधान के हमे होटल तक ले आया। दिन के लगभग डेढ़ बज गए। अर्थात हम अपने अनुमानित समय से लगभग ढाई घंटे विलंब से दीघा में दस्तक दे रहे थे। समय भोजन का हो गया था। होटल में रेस्टोरेंट होने के बावजूद भी हमे वहां भोजन उपलब्ध नहीं हो पाया। मैनेजर ने कहा यहां सिर्फ उतने ही मेहमानों का भोजन बनता है जो पहले से ऑर्डर दिए होते है। अतः अभी तो नहीं किंतु अगर आप चाहते है तो रात का खाना बन जायेगा। फिर मैनेजर से कुछ आधारभूत जानकारी लेकर हम भोजन और फिर समुद्री लहरों की तलाश में होटल से निकल गए।
खाने के बाद सीधा हम समुद्र तट की ओर निकल गए। होटल से समुद्री किनारा बमुश्किल दो सौ मीटर होगा। अपराह्न का समय होने के कारण अब नहाने का कोई इरादा नहीं था।अतः हम तट से बने भ्रमण पथ से टहलते हुए एक जगह आकर इन लहरों की नृत्य का मजा लेने बैठ गए। वैसे कुल मिलकर दीघा क्षेत्रफ़ल की दृष्टि से कोई बहुत बड़ा नहीं है। फिर भी यह नए और पुराने दीघा के नाम से समुद्री किनारे बटे हुए है और यह पूरा इलाका दीघा शंकरपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी के तहत इसका विकास कार्य किया जा है।
वैसे ऐतिहासिक रूप से देखे तो ब्रिटिशकालीन भारत में पहली बार इस तट के सौंदर्य पर नजर बंगाल के पहले गवर्नर जरनैल वारेन हेस्टिंग का गया और सन 1780 में एक पत्र के द्वारा इसके खूबसूरती का वर्णन अपनी पत्नी को किया।उस समय दशकों तक ब्रिटिश अफसरों के लिए यह प्रमुख पर्यटक स्थल हुआ करता था और कहते है हाथी की सवारी करके कई दिनों की यात्रा के बाद यहाँ पहुंचते थे। स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल के प्रथम मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय ने दीघा के पर्यटन क्षेत्र के तौर पर विकसित करने में काफी दिलचस्पी लिया।
लगभग सात की मी की लंबी तट पर हम जितना हो सके टहलते हुए इन लहरों और तट के बीच संघर्ष से उत्पन्न संगीत कानों में सुमधुर संगीत सुनते हुए समुद्र की मिलों विस्तार के साथ आसमान का मिलन के दृश्य का आनंद लेते रहे। कुछ समय पश्चात नई दीघा के हलचल का अनुभव करने ई रिक्शा की सवारी कर उन तटों पर चहल कदमी करने पहुंच गए।
प्रख्यात जगन्नाथ मंदिर नई दीघा में ही है।शाम के समय फिर हम मंदिर के दर्शन के लिए पुनः एक ई रिक्शा का मंदिर प्रांगण पहुंच गए। वैसे हमे पता था कि अभी मंदिर कपाट बंद है।किंतु भगवान तो हर जगह ही है और हम तो भगवान का प्रांगण जो कि इंसानों ने बनाया है उसे ही देखने जाते।मंदिर के भव्यता पर आप मंत्रमुग्ध होकर बस उसे निहारते रहते है, लेकिन आप थोड़ा मायूस भी होंगे जब प्रभु आपको दर्शन के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। खैर हम विशाल प्रांगण को हर ओर से चहलकदमी कर इसकी भव्यता को निहार कर वापस होटल की ओर निकल गए। रास्ते से चलते हुए निशा के आगमन के साथ साथ पर्यटकों की भीड़ समुद्र को रात में निहारने पहुंच चुके थे। विभिन्न प्रकार की रोशनी से पूरा तट गुलजार होने लगा। इस रात में लहरों को केंद्रित कर लगाये गए विशाल हाई मास्ट लाइट की रोशनी में जैसे लग रहा लहरे थिरक रही हो। रास्ते भर लहरों की इन क्रीड़ा को देखते हुए हम होटल पहुंच गए। जहां मेहमानों के इच्छानुसार होटल के रेस्टोरेंट में खाना तैयार होता होता है। आपने अगर पहले से बता रखा है तो आपको भोजन उपलब्ध होगा अन्यथा आप अपनी व्यवस्था खुद करे। खाने के बाद बिस्तर पर आते समय रात के दस बज गए और कब आँख लगी पता ही नहीं चला।
खुद ब खुद सुबह पांच बजे पलकों से नींद गायब हो गया। मैं फ्रेश हो गया, मां और बेटे अभी भी तन्द्रा में थे।मै सोच ही रहा था कि अब क्या करूं ! तब ये शेर दिमाग में कौंध गया -
उस समंदर की तिश्नगी देखो,
उसको नदियों का ख्वाब दिखता है।
रात ख्वाब में समुंदर ही था। अतः अब सुबह में तट में इन लहरों को मचलते देखना चाहता था। माँ और बेटे गहरे नींद में थे अतः मैं व्यवधान न डालकर समुद्र तट की ओर निकल गया।
आसमान में बादल ने अपना डेरा जमा रखा था। अब बादल के इन बूंदों की डर से मै सुबह का समुद्री हलचल से वंचित रह जाऊ ऐसा नहीं चाहता था। आखिर ये बूंद को तो इन सागर में ही विलीन हो जाना है। होटल से निकलते ही गेट पर इक्का दुक्का ई रिक्शा हम जैसे लोगों को अपने सुप्रभात के लिए इंतजार में थे। मुहाना - मुहाना की आवाज देकर पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचने में लगे थे। मुहाना अर्थात पुरानी दीघा का वो क्षेत्र जहां दूर तक तट के साथ रेत पसरी हुई है।मै इन आवाज को नजरंदाज कर पैदल भ्रमण के उद्येश्य से निकल पड़ा। अब होटल से चलकर तट के साथ रोड पर आ गया। रास्ते के किनारे चाय की दुकान भी सजने लगी। एक दुकान पर रुककर सोचा पहले गर्म ताजी चाय की चुस्की ले ली जाय। चाय पीकर कुछ कदम चलते ही समुद्र के किनारे दूर तक रेत की सपाट चादर बिछी हुई दिखाई दिया। मैं रोड से उतरकर अब रेत पर पहुंच गया। लगभग दो कीमी का फैला हुआ दायरा का अंतिम छोर मुहाना के नाम से चर्चित है।अब धीरे - धीरे समुद्र की लहरों से पांव के संपर्क होने लगे। बीच-बीच में बादलों से आंख मिचौली कर सूरज की किरणें जब इन रेत के संपर्क में आता तो लगता जैसे सुनहरी चादर किसी ने बिछा दिया। लहरों पर सवार किरण बिल्कुल रश्मिरथी की तरह प्रतीत होता। सुबह के साढ़े सात होने को थे, मै फोन कर मां बेटे कोसपनो की दुनिया से जगाकर इस अथाह सागर की क्रीड़ांगन में प्रकृति की वास्तविक दुनिया रूबरू होने के लिया बुला लिया।
रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा है - तट सागर से फुसफुसाकर कहता है: 'मुझे लिखकर बताओ कि तुम्हारी लहरें क्या कहने के लिए संघर्ष कर रही हैं।' सागर बार-बार झाग में लिखता है और एक प्रचंड निराशा में उन रेखाओं को मिटा देता है। इस कथन का मर्म महसुस कर सकते जब नदीकांत के तट पर लहरों की इस क्रीड़ा को अनुभव के लिए आप वहां पहुंचते है। सागर में उठते तरंग और लहर किनारे पर आकर चुपचाप से खामोशी ओढ़ लेना शायद किसी निराशा का पर्याय हो।लेकिन आशा फिर लहरों का रूप धर कर फिर से उस तट से टकराने को दौड़ती है। शायद हमसे तट से टकराना ही उसकी मंजिल है लेकिन एक बार मंजिल तक पहुंच कर वापस लौटने में निराशा नहीं बल्कि आशा का वो स्वरूप है जो दुगुने वेग के साथ मचलते हुए दौड़ती है। यही तो गीता का कर्म योग है।
सुबह के साढ़े साथ बज गए थे। अब मां और बेटे भी इन सुबह का नजारे देखने के लिए मुहाने पर पहुंच गए। कुछ घंटे लहरों की अटखेलियां देखकर अब बगल में ही मछली बाजार का रंगत देखने पहुंच गए। ये विभिन्न प्रकार की समुद्री मछली का एक बड़ा बाजार है। जो मुख्यत एक्सपोर्ट के लिए है और समुद्र से मछली मारकर आने वाले मछुआरे इसी बाजार में अपनी मछली बेचते है। चूंकि सिर्फ आज का ही दिन था और हमें वापस भी निकलना था। अतः नौ बजे तक हम होटल पहुंच कर नाश्ता से निवृत हो गए।
मौसम विभाग के "पीली चेतावनी" अब तक बेअसर साबित हुआ। मौसम की नरमी ने अब तक की यात्रा को काफी अनुकूल बना रखा था।किंतु आगे का हाल हमे पता नहीं, इसलिए अब निकलना उचित लगा।निकलते समय हमें पता था कि रास्ते में कई और बीच प्रसिद्ध है, जिनमें शंकर बीच, मंदारमनी इत्यादि प्रमुख है। शंकर बीच तो दीघा से सिर्फ सात की मी की दूरी पर है, लेकिन वहां किनारा रेतीला न होकर कंक्रीट के लंबी चौड़ी सीढ़ीनुमा तलहटी बनी है। जहां आप घंटों बैठकर इन लहरों का आनंद ले सकते है। समय हमारे गिरफ्त में नहीं होता हम समय के गिरफ्त में होते है। अब समंदर भी एक और लहरों का शोर भी वही। टकराती हुई तट भी एक धरती का टुकड़ा और हमने नाम अलग नवाजा। इसलिए बैठने की इच्छा के बावजूद भी समय इजाजत नहीं दे रहा था कि इन समुद्र की आगोश में कुछ पल और व्यतीत किया जा सके। अतः समुद्र तट के साथ बने रोड पर हम मंदारमनी बीच की ओर बढ़ चले। इस क्षेत्र में काफी रिज़ॉर्ट और होटल है। यहां खासियत है कि ये रिजॉर्ट अपना प्राइवेट बीच पर्यटकों को उपलब्ध कराते है।मंदारमनी की दूरी दीघा से लगभग तीस कीमी है। मंदारमनी में कुछ देर तक इन्हीं इन्हीं नजरों को अपने अंतर्मन और मोबाइल में छवि कैद कर पुनः गूगल मैप पर कोलकाता का निर्देश दे दिया।
जैसे जैसे हम इन तटवर्ती क्षेत्र से दूर होते जा रहे थे मन में कबीरदास का दोहा गूंज रहा था -
“हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।
बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥”
अर्थात साधक जब ईश्वर रूपी समुद्र में मिलता है, तो उसका अलग अस्तित्व समाप्त हो जाता है। बिल्कुल वैसे ही हम बिना साधना के अब भी अपने अस्तित्व से अलग सागर के अस्तित्व में समां रखा हूँ।

तक पीछे से किसी वाहन ने तेज हॉर्न बजाया और मैं इन लहरों से लगा तैर कर बाहर निकल आया।तभी सामने बोर्ड पर राष्ट्रीय राजमार्ग 116-B और कोलकाता एक सौ पैंसठ की मि दिखा रहा था। अब मैं लहरों की बजाय इन रोड पर अपना ध्यान केंद्रित कर अपने गंतव्य के लिए बढ़ चला। आसमान पर बादल अब भी अपना डेरा जमा रखा था।कार के शीशे पर बारिश की बूंदे अपने अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत दिखने लगे। इन बूंदों को देखकर किसी शायर के दो पंक्तियां याद आ गए-
हर बूंद में उसके, एक दरिया-ए-हस्ती है,
समंदर की हर बूंद, एक नई मस्ती है !!








Wednesday, 8 January 2025

सोहबत !

कुत्ता रो रहा था
वही गांव के किनारे
जहाँ इंसानो की बस्ती है !
कुछ कुत्तो को पकड़
आज ले गए थे
आपने साथ
अपनी सोहबत में रखने के लिये !
शायद इसी से
कॉप उठा था उसका अंतरात्मा
की ये कुत्ते भी
इंसानी फितरत
न सिख ले !
हम तो अब तक
काटते आये है भौंकने के बाद
ये काट खाएंगे
अब इंसान की तरह
जो काटने से पहले कभी भौंकते नही !


ड्रॉप या एटेम्पट !

  अयोध्या बाबू विगत तीन साल से कोलकाता में है। सरकारी सेवा के स्थानांतरण क्रम में यह अभी इनका ठिकाना है। इस सेवा की अपनी दिनचर्या है और उनका ऑफिस सुबह साढ़े नौ से शाम छः बजे तक होता है। अयोध्या बाबू  उससे इतर  खुद के लिए खुद की निर्धारित दिनचर्या निर्धारित कर रखे है और उसके लिए स्वतः सजग रहते है।इसी के तहत सुबह टहलना उनका शगल और शौक है। वो कहते है कि ये सुबह का एक घंटा सिर्फ और सिर्फ उनका है, जिसमे वो खुद से बात करते है, खुद को देखते है । नही तो दुनियादारी के कवायद में कभी ठीक से देखे ऐसा मौका भला कहा मिलता है।वैसे तो पारिवारिक जिम्मेदारियों की अपूर्णता को भरने में ही परिवार के मुखिया की पूर्णता समझा जाता है।लेकिन फिर भी यह एक घंटा वो सुबह के भ्रमण में खुद से संवाद के लिए रखते है। इसी दिनचर्या अनुसार अयोध्या बाबू सुबह पांच बजे के आस पास जग गए।

               अप्रैल के महीने में कोलकाता के आसमान में अभी सूरज का आगमन नही हुआ है, लेकिन उसकी आहट से ही रात का साया जैसे ड़र से सिमटने लगा है ।स्वास्थ के प्रति सचेत लोगो की पदचाप अब घर के सामने वाले रोड से आने लगा है। सुबह लगभग साढ़े चार बजे से पक्षियों की चहचहाट की तीव्रता में अब धीमा हो गया है। जैसे सबको जगाने के बाद अब  किसी और काम पर निकल गए हो। कोलकाता के जिस इलाके  में  वो रहते है, वहाँ अमूमन वनिस्पतियो की संख्या अन्य क्षेत्र के तुलना में ज्यादा है। खेलकूद वाले पार्क के साथ-साथ कई वनिस्पतियो वाले पार्क भी है। इसी के कारण चिड़िया जो कई शहरों से विलुप्त होते  जा  रहे सिटी ऑफ जॉय में इन चिड़ियों का रैन बसेरों अभी भी ज्यादा है और कोलकाता का यह क्षेत्र उनमे से एक है।
           
            अमृत के बारहवीं  बोर्ड का परीक्षा हो चुका है और आईआईटी जेईई के लिए अध्यनरत है।  पहला प्रयास जनवरी में हो चुका है और परिणाम अपेक्षानुरूप नही आया। तो फिर अप्रैल में होने वाले दूसरे प्रयास के लिए लग गया। जनवरी से अब तक कभी बोर्ड परीक्षा तो कभी आईआईटी प्रवेश परीक्षा के दरम्यान अपनी तैयारी के तालमेल बैठता हुआ अध्यन करता आ रहा है। अब कुछ दिन हो गए और बारहवीं के परिणाम भी घोषित हो चुके है, परिणाम अपेक्षानुरूप अच्छा  आया और प्रसन्न है, किन्तु अब भी सारा ध्यान अप्रेल के दूसरे प्रयास के जेईई के परिणाम पर टिका हुआ है।
            वैसे तो अयोध्या बाबू बच्चे के दिन प्रति दिन के कार्यकलापों पर नजर रखते है,  लेकिन  विशेष कुछ टोका टाकी नही करते। बस बीच-बीच मे पुछ लिया करते है कि कैसा तैयारी चल रहा है और वो संक्षिप्त सा उत्तर देता है- ठीक चल रहा है पापा !
फिर वो पूछते- ठीक या अच्छा ..?
तो फिर अमृत एक संक्षिप्त उत्तर देता - अच्छा ही है !

              आज जब वो सुबह  बाहर टहलने के लिए निकलने वाले थे, तभी अमृत अपने कमरे से निकलकर आया। सामान्यतः उनके बाहर निकलने के समय वह अपने कमरे में ही अध्यनरत रहता है। इसलिए आज  इस समय अमृत को  देखकर उन्हें लगा कि कुछ कहना चाहता है। इससे पहले की वो कुछ पूछते, लगभग रुआंसा होता हुआ अमृत बोला- रिजल्ट आउट हो गया है..!
            पिछले दो तीन दिन से जेईई प्रवेश परीक्षा के परिणाम घोषित होने की चर्चा चल रही थी और बच्चे बेसब्री से इसका इंतजार कर रहे थे। ताकि परिणाम के अनुरूप अपनी योजना भविष्य के लिए तैयार करे..!
           वैसे तो अयोध्या बाबू अमृत के चेहरे के भाव से ही समझ गए कि परिणाम क्या हुआ है । किन्तु  उसके मन पर घिरे उजास की परिछाई जो चेहरे पर स्पष्ट दिख रहा है, उसको नजरअंदाज करते हुए अपने जूते के फीते बांधते हुए उन्होंने पूछा- क्या हुआ..?
अमृत लगभग रुंधे गले से बोला - नही हुआ...!
     अमृत के चेहरे पर घिर आये निराशा के भाव तो बिल्कुल स्पष्ट ही दिख रहे थे, उसके लिये अयोध्या बाबू को  मनोविज्ञान के किसी विशेष अध्ययन की जरूरत तो है नही। आखिर पचास दशक तक जिंदगी के थपेड़े किसी भी  किताब से ज्यादा ज्ञान दे देता है। वैसे भी स्कूली पढ़ाई का विज्ञान पहले सिंद्धांत देता है और फिर प्रयोग द्वारा सिद्ध करने का प्रयास करता है। लेकिन जीवन अनुभव का विज्ञान तो पहले जिन्दगी की प्रयोगशाला में सिद्ध होता है और फिर उसके अनुरूप सिद्धान्त गढ़ता  है।

            तो अयोध्या बाबू को समझते देर नही लगा कि अमृत दिन-रात एक करके जिस लक्ष्य के लिए समर्पित है, वो उसकी पहुंच से अभी दूर है।परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद का समय एक ऐसी मानसिक उहापोह की रचना कर सकता है, जहां दिल में उठते हतोत्साह की धड़कन, रेत के तूफान की तरह भविष्य के लिए संजोए कई सपनो को रेत के टीले के अंदर दफन कर सकता है।  मन मे उठते उदासी की लहर  को अगर सही समय पर शांत नही किया गया तो यह कई बार बच्चों का भविष्य भी इस तरह के परिणाम से निकले भंवर में घिर कर विलीन हो जाते है। आये दिन इस प्रकार के खबर समाचार पत्रों में छपते रहते है।
         अयोध्या बाबू सुलझे हुए व्यक्तित्व के है। बेटे के भविष्य निर्माण के लिए सजग है, लेकिन अपेक्षाओं का बोझ कभी बेटे पर जाहिर नही होने देते। बल्कि समय-समय पर हमेशा सिर्फ हौसलावर्धन करते रहते है और जब कभी अमृत में अपनी तैयारियों को लेकर कुछ अनावश्यक तनाव में देखते तो मुस्कुराते हुए कवि "नागार्जुन" के कविता के ये दो पंक्ति जोर-जोर से बोलते-
“जो नहीं हो सके पूर्ण काम,
मैं उनको करता हूँ प्रणाम”!
        फिर वो अमृत से कहते बोलो। तो वो भी साथ-साथ इसे दोहराता । ऐसे ही बातों-बातों में  अयोध्या बाबू अमृत  से कहते-,देखो बेटा, भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान यूँ ही नही दिया। वो जानते थे आने वाले काल में हर कोई महत्वाकांक्षा और अपेक्षा के बोझ तले दबा होगा।कई बार अपेक्षाओं का भार इतना बढ़ जाएगा कि जीवन दूभर हो जाएगा। इसलिए  उसको संतुलन में लाने के लिए गीता सार ही उपयुक्त होगा। इसलिए गीता के मर्म को याद रखो। वो कहते सिर्फ अपने लक्ष्य और कर्म के प्रति समर्पित रहो ।वैसे भी फल तो आज के समय मे कुछ ही  है और उसके लिए प्रयासरत  तो कई है। फिर मुस्कुरा देते।

             लेकिन जैसे ही अयोध्या बाबू कहते- देखो बेटा इस लिए बार-बार एक ही मर्म को दोहराया जाता है की कर्म करो और फल की इच्छा मत करो। तो कभी-कभी अमृत कहता- पापा गीता में क्या सिर्फ इतना ही नही लिखा है,मैं भी बीच-बीच मे पढ़ता हूँ।
तो अयोध्या बाबू मुस्कुराकर कह देते- हाँ बेटा गीता में सिर्फ इतना ही नही लिखा है,बल्कि ये तो पूरे जीवन का अलग-अलग अध्याय ही है, लेकिन जीवन के जिस अवस्था  मे तुम हो वहां बस कर्म योग के इसी मर्म का ध्यान रखना काफी है।बाकी भी आगे काम आएंगे।
इसलिए बेटा सिर्फ अपना बेहतर करने का प्रयास करो, अगर इसमे नही हुआ तो इसका अर्थ है कोई और बेहतर प्रयास तुम्हारे इंतजार में है। फिर जोर-जोर से कविता पाठ करने लगते-
“जो नहीं हो सके पूर्ण काम,
मैं उनको करता हूँ प्रणाम”
    अमृत थोड़ा निश्चिंत होकर, मानो जेठ के सूरज पर अचानक से बादल घूमर आने से जैसे गर्मी से राहत का अनुभव होता , उसी निश्चिंत भाव से अपने  अध्यन में लग जाता।

        एक दिन अमृत के तैयारी के ऊपर  बातचीत के क्रम में अयोध्या बाबू अपनी पत्नी से कहते है- अभिभावक बच्चों के भविष्य के प्रति सजग और सचेष्ट रहे यहां तक तो ठीक है, किन्तु जब अपनी अधूरी इच्छा को पूरा करने की अपेक्षा का बीज अपने मन मे पनपने देते है तो कई बार बच्चे अपने ऊपर लादे गए इस अपेक्षा के बोझ से उबर नही पाते है।क्योंकि  यह अपेक्षा का बीज तो एक परजीवी पौधे की तरह है, जो एक बार दिमाग में पनप गया तो आपके दिल को चूसकर  दायरा इतना बड़ा बना देगा कि उसकी घनी परिछाई में बच्चे उसमे जैसे कही खो जाते है।

अयोध्या बाबू की इन बातो को सुनकर सुनकर उनकी पत्नी कुछ नही बोली। सिर्फ यह सोचती रही क्या अयोध्या बाबू घुमाफिराकर उनको तो कुछ कहना नही चाहते।

वैसे भी आये दिन समाचार चैनलों में इस प्रवेश परीक्षा से पूर्व ही बच्चों के आत्महत्या के खबर से मन  सशंकित रहता है। वो कभी-कभी इस समाचार को देखकर कहते हुए अपनी धर्म पत्नी से कहते- पता नही अभिभावक बच्चों को सिर्फ खिलने देना चाहते है या फिर खिलने के बाद इन फूल का माला अपने गले मे डालना चाहते है। तो उनकी पत्नी उनके बातों पर गौर किये बिना कहती- अब बच्चों के आत्महत्या में आप फूल और माला की क्या चर्चा करने लगे। अयोध्या बाबू इसपर बिना कुछ कहे मौन ही रहते।

       तो जैसे ही आज सुबह-सुबह अमृत ने यह कहा की नही हुआ  ! अयोध्या बाबू अंदर से निराश तो बहुत हुए, ये निराशा इस बात का नही था कि उनको बच्चे से कोई ढेर सारी अपेक्षा थी, बल्कि इस बात का था कि अमृत ने परिश्रम में कोई कोर-कसर नही छोड़ा था। लेकिन दिल के भाव को चेहरे पर आने नही दिया।
       तभी अमृत की मम्मी  रसोई घर से  दो कप चाय ट्रे में लेकर वहां पहुंच गई। टहलने से पूर्व लगभग नित्य का नियम है कि एक कप गर्मा गर्म चाय पीकर ही बाहर निकलते है। वैसे तो सर्दी के मौसम में सुबह-सुबह इस एक चाय की तासीर अमृत से कम नही होता। लेकिन अन्य मौसम चाहे वो अप्रेल या मई क्यों न हो, आदत में सुमार चीज की तासीर लगभग एक जैसा ही होता है।
  जैसे ही अमृत के मम्मी यह सुनी की - नही हुआ.! वो हाथ मे चाय का ट्रे पकड़ी हुई ऐसे देखने लगी जैसे कोई बहुत बड़ी अनहोनी हो गई है।
       सामान्यतः माताएं आजकल बच्चों के भविष्य के प्रति कुछ ज्यादा संवेदनशील हो गई है। इस संवेदनशीलता के तह में कब बच्चे के भविष्य से ज्यादा अपनी अहम की पूर्ति की लताये पनप जाती उनको पता ही नही चलता। बच्चों के भविष्य के प्रति अनावश्यक सजगता कब बच्चों पर भार बनकर उसे अवसाद में धकेल देता है, वो भी पता नही चलता।कभी माँ तो कभी पिता इस रूप में पेश आते तो कभी दोनों।
     खासकर आर्थिक रूप से मध्यमवर्गीय परिवार में यह एक सामान्य गुण या कहे अवगुण विकसित हो गया है। बाकी आर्थिक रूप से झूझ रहे परिवार में तो बच्चे बचपन से ही संघर्ष में तपकर निकलते है। बेशक प्रवेश परीक्षा में कम उत्तीर्ण होते है और नही भी होते है तो संघर्ष के जज्बा से प्रेरित ही रहते है । अवसाद के लक्षण इनको छूने में थोड़ा हिचकिचात  है।जबकि आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार कई बार इसके बल पर बच्चे का भविष्य अनुकूल करने में सफल हो जाते है।
     जैसे ही अयोध्या बाबू ने अमृत के माँ को हाथ मे ट्रे लिए मूर्तिवत देखा, वो समझ गए कि मन मे संजोये हुए शीशमहल अमृत के इस कथन का बोझ  नही ढो सका और भरभराकर ढह गया है। इसके पहले की उसके बोझ से ट्रे भी गिर जाए उन्होंने चेहरे पर अनावश्यक मुस्कुराहट लाते हुए कहा- क्या हुआ चाय दो !
अमृत की मम्मी चेहरे पर उभर आये तनाव को छिपाने का असफल प्रयास करते हुए एक कप चाय उनकी ओर बढ़ा दिया और वही रखे सेंटर टेबल पर ट्रे सहित चाय का कप रख दिया। फिर अमृत की ओर देखते हुए पूछा - क्या कह रहे थे बेटा, क्या नही हुआ ? क्या परीक्षा का परिणाम निकल गया ? मैं इतने दिन से बार-बार कह रही थी! ठीक से पढ़ाई करो..ठीक से पढ़ाई करो। लेकिन मेरा कोई सुने तब तो। आजकल के बच्चे तो खुद को ही बहुत होशियार समझने लगते है। लो अब...अब क्या करोगे..? एक ही सांस में वर्तमान और भविष्य से सभी संबंधित प्रश्न पूछ बैठी।

आयोध्या बाबू आंखों के भंगिमा से उनकी द्रुत गति पर रोकने का प्रयास करते रहे ! लेकिन जिसके सपने सुबह के चिड़ियों की चहचहाट में टूटू जाये तो उनका ध्यान उस शोर पर होता है, वो चेहरे का भाव कम और आवाज पर ध्यान ज्यादा देते है।
अयोध्या बाबू थोड़ा संयत से बोले- अरे आखिर ऐसा क्या हो गया, जो सुबह-सुबह इतना बोल रही हो।आखिर पूरी बात तो सुनो।
उनकी पत्नी कुछ न बोल ट्रे से कप उठाकर चाय पीने लगी। तो अयोध्या बाबू अमृत की ओर देखते हुए बोले- तो रिजल्ट कब निकला !
अमृत ने फिर संक्षिय सा उत्तर दिया- रात में ! लगभग बारह बजे के आसपास।
       अयोध्या बाबू समझ गए कि अमृत के रात की नींद इस परिणाम के इंतजार में रूठा हुआ था और अब परिणाम अमृत से रूठ गया है !अर्थात यह एक ऐसी परिस्थिति में पहुंच गया है, जहां अवसाद इसे अपने गिरफ्त में लेने को तैयार बैठा होगा। उसपर अमृत के मम्मी की प्रतिक्रिया लगभग उसे उस घेरे की ओर धकेल ही दिया है।अमृत वही चुपचाप नजरे नीचे किये खड़ा है और पैर के अंगूठे से फर्स को कुरेद रहा है। कमरे में एक खामोशी पसर गई है, सिर्फ घर के बाहर रोड से बीच-बीच मे पदचाप की आवाज आ रही है। अयोध्या बाबू  अपने जूते का फीता बांध सीधे होकर सोफा पर बैठ गए है और चाय का कप हाथ मे लिया। अमृत की मम्मी वही सामने वाले सोफा पर चुपचाप बैठे जैसे कही और खो गई है।
            एक घूंट चाय पीने के बाद अमृत की ओर देखकर कहते है- तो फिर अब क्या सोचा है ? अमृत कुछ कहता उससे पहले अमृत की माँ थोड़ी उत्तेजित होकर बोली- तो अब क्या, अब कॉलेज में एडमिशन लेगा, जिसमे भी होता है ले लेगा, कही से आखिर इंजिनीरिंग तो करेगा!
              काफी समय से चुप खड़ा अमृत अपनी माँ की इस बात पर तुरंत बोला- मैं एड्मिसन नही लूंगा, मुझे कोई अच्छा कॉलेज नही मिलेगा । कहकर फिर अंगूठे फर्स को कुरेदने का प्रयास करने लगा।
तो अयोध्या बाबू फिर से अमृत की ओर उन्मुख होकर बोले तो फिर क्या चाहते हो ?
अमृत ने कहा- मैं "ड्राप" लूंगा !
अयोध्या बाबू थोड़ा गंभीरता से पूछे- ड्राप मतलब...?
अमृत- मैं एक "एटेम्पट" और लेना चाहता हूं !
अयोध्या बाबू इस पर स्मित मुस्कान के साथ बोले- "ड्राप"या "एटेम्पट" यह तो स्पष्ट होना  चाहिए! क्योंकि कई बार हमारे द्वारा प्रयुक्त शब्दो के अर्थ हमारे परिणाम या फल को प्रभावित करता है।
अमृत अयोध्या बाबू का आशय समझते हुए इस बार आवाज में थोड़ी दृढ़ता के साथ बोला - एटेम्पट ! फिर अपनी मम्मी की ओर देखा। वो अयोध्या बाबू और अमृत के बीच इस बातचीत को निर्रथक समझ इसके ऊपर कोई ध्यान नही दे रही थी।
        तबतक अयोध्या बाबू अपनी धर्मपत्नी को देखते हुए बोले- एक और प्रयास करना चाहता है तो क्या दिक्कत है।
वो बोली मैं कब बोल रही हूं कि कोई दिक्कत है, हाँ बच्चे का ध्येय और लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए।
       अयोध्या बाबू मुस्कुराते हुए बोले- बेटा असफलता एक स्वभाविक प्रक्रिया है। जीवन मे अलग-अलग मोड़ पर इससे सामना होता ही रहता है। बड़ी बात ये है कि उसको स्वीकार कर फिर से एक बार लक्ष्य निर्धारित कर पिछले गलतियों से सबक ले प्रयास करना ही असली विजय है और यही गीता मर्म भी है। इसलिए फिर से एक बार उसी जोश और जुजुन के साथ फिर से एक औऱ प्रयास में लग जाओ। फिर से नागार्जुन की कविता के दो पंक्तियों ऊंचे स्वर में अपनी आदत अनुसार पाठ करने लगे-
“जो नहीं हो सके पूर्ण काम,
मैं उनको करता हूँ प्रणाम”!
         आयोध्या बाबू का चाय का कप खाली हो चुका और सामने उनकी धर्मपत्नी चाय पीने में लगी हुई है। अमृत चेहरे पर छाई उदासी के बादल जैसे अयोध्या बाबू के शब्दों से कही विलीन हो गए। चहरे पर एक आत्मविश्वास की किरण तैरने लाग।
           अयोध्या बाबू उठकर सुबह के भ्रमण पर निकल गए और अमृत अपने अध्ययन कक्ष की ओर चल दिया। चिड़ियों की चहचहाट अन्य दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा गूंज रही है।

  

Sunday, 14 April 2024

मैदान.....रिव्यू...!!

           अगर आप मैदान अभी तक नही गए है तो अवश्य जाइये। मैदान पर तीन घंटा बिताना आपमे एक जोश और स्फूर्ति भर देगा। मैदान पर दौड़ते ही ये आपको भारतीय फुटबॉल के पचास से साठ के दशक में ले कर चला जायेगा । तत्कालीन भारत में खेल की स्थिति और उसमें मुख्य रूप से फुटबॉल का यह एक क्रमिक इतिहास है और इसे भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम दशक कहा जाता है। यह मैदान उस इतिहास की बानगी है कि खेल या कोई और क्षेत्र क्यों न हो उसमें राजनीति हमेशा भारी रही है। लेकिन यही मैदान दस्तावेज के कई ऐसे पृष्ठ भी दर्ज कर रखा जहां खेल के प्रति समर्पण में राजनीति परास्त हो गया है।

                         तो अभी तक आप समंझ गए होंगे कि मैं फ़िल्म मैदान की बात कर रहा हूँ। शायद फ़िल्म में  प्रोमोशन की कमी हो या फिर मेरी स्वयं की उदासीनता इसका नाम मैंने नही सुना। जब अचानक से लोकतांत्रिक संवाद के तहत इस निर्णय पर पहुंचा गया कि आज कोई फ़िल्म  देखी जाय तो संवाद में अपनी उस्थिति दर्ज कराते हुए बेटे ने कहा--चलिए फ़िल्म मैदान देखते है। तो असहमति कोई कारण न था। आखिर धरना का निर्माण स्वयं के आकलन से चाहिए न कि किसी और कि धरना का विश्लेषण कर।

                         थियेटर खाली-खाली सा ही था। संभवतः अभी दर्शक इधर आकर्षित नही हुए है या फिर वीकेंड का इंतजार है। वैसे तो खेल की पृष्ठभूमि पर कई हिंदी  फ़िल्म बने है।। उसमें भी कई बॉयोपिक है जिसमे मेरीकॉम, एम एस धोनी, दंगल इत्यदि कई नाम है। जहां चक दे इंडिया हॉकी पर आधारित था, वही मैदान फुटबॉल के खेल पर आधारी है। दोनो ही फ़िल्म के कहानी का केंद्र बिंदु  कोच है। लेकिन अंतर इतना ही है कि फ़िल्म चक दे इंडिया का कोच काल्पनिक है जो हकीकत लगता है वही फ़िल्म मैदान का कोच वास्तविक है और फ़िल्म में भी कही से फिल्मी नही लगता है।

                         तो फ़िल्म "मैदान" भारतीय फुटबॉल खिलाड़ी और कोच एस ए रहीम पर आधारित है। इस कोच के साथ फ़िल्म की यात्रा करते हुए तत्कालीन कोलकाता, हैदराबाद को काफी करीब से देखते है और रह-रह कर भारतीय खिलाड़ी और खेल में व्याप्त विभिन्न असंगति को समझना हो तो आप पाएंगे ये सब कुछ पूर्ववत है। इसके बावजूद की परिस्थितियों में बदलाव दृष्टिगोचर है।कोलकाता में रहते हुए, फ़िल्म में पचास-साठ के दशक के कोलकाता को देखना एक अलग अनुभव है और इसे कितनी सूक्ष्मता से उभरा गया है यह फ़िल्म देखने पर ही पता चलेगा।

                          पूरी फिल्म का केंद्रबिंदु कोच रहीम साहेब है।मैदान’ की कहानी आजाद भारत की फुटबॉल टीम के कोच सैयद अब्दुल रहीम और उनकी टीम पर आधारित है। फिल्म में जज्बा, जुनून और इमोशन सब दिखाया है।लगभग एक सौ अस्सी मिनट की फ़िल्म आपको बांधने में सफल रहता है। यह जानते हुए भी की यह एक स्पोर्ट्स ड्रामा है और अंत भी प्रेडिक्टेबल है, फिर भी अंत तक आप बंधे रहते है। मुख्य भूमिका अर्थात रहीम कोच की भूमिका में अजय देवगन खुद है और आप कह सकते है कि वो सिर्फ खुद को साबित कर रहे है। उनकी पत्नी की भूमिका में  प्रियामणि अच्छी है। बाकी सभी पात्रों का चयन बिल्कुल पात्र के अनुरूप है और शायद वास्तविकता के करीब। लेकिन रहीम साहेब के अलावा फिल्म जिन पात्रों के इर्द-गिर्द फ़िल्म घूमता है उसमें एक मुख्य पात्र राय चौधरी है और इसकी भूमिका निभाया है गजराज राव । यह आपको अलग से प्रभावित करते है। फिर सुभन्कर के पात्र में  रुद्रमणि घोष तो ऐसे लगते है कि किरदार की आत्मा उनमें प्रवेश कर लिया हो। वैसे भी रुद्रमणि घोष बंगला फ़िल्म के अभिनेता होते हुए भी राजनीति में काफी सक्रिय है।

                            जी स्टूडियो के तहत बने इस फ़िल्म का  निर्देशन किया है अमित शर्मा ने। मुख्यतः विज्ञापन फ़िल्म बनाते है लेकिन इससे इन्होंने बोनी कपूर द्वारा प्रोड्यूस फ़िल्म बधाई हो का निर्देशन किया था,  जिसे काफी सराहा गया। और यह फ़िल्म इनको और स्थापित करेगा इसमें कोई संदेह नही है। संवाद लेखन काफी उत्कृष्ट है। "जब नींव कमजोर हो तो छत बदलने से कुछ नही होगा", यही एक खेल है जिसमे भाग्य की रेखा हाथ से नही बल्कि पैर से लिखा जाता है, कहने को एक सबसे छोटा है लेकिन यही सबसे बड़ा भी है आदि कई डायलॉग आपका ध्यान फ़िल्म में कहानी के स्थिति के अनुरूप आपका ध्यान खीचेंगे। बाकी संगीत "ए आर रहमान" का है और आप जानते है नाम ही काफी है।बैकग्राउंड संगीत बिल्कुल उनके ट्रेडमार्क का है, गीत गुंजाइश के अनुरूप है और फ़िल्म में अच्छे लगते है।

                             तो कुल मिलाकर यह एक स्वस्थ मनोरंजक, प्रेरणास्रोत, पारिवारिक फ़िल्म है और यह सब आनंद आपको फ़िल्म की समीक्षा पढ़ने में नही बल्कि फ़िल्म को देखने मे आएगा...है किन्ही  ?

Thursday, 14 September 2023

हिंदी दिवस

 सबसे पहले आप सभी को हिंदी दिवस की बधाई..!

                   हिंदी की मुखरता यह है कि यहां कोई मात्रा अथवा वर्ण "साइलेंट" नही रहता। एक बिंदु भी अपने वजूद को मुखर होकर कहता है। लेकिन अंग्रेजी में "साइलेंट" एक सामान्य बात है। तो फिर इस "साइलेंट" होने के अपने महत्व है।कई बार आप चाहते हुए भी बहुत कुछ नही कह सकते, चाहे वह आपका घर हो या दफ्तर..! वक्त वेवक्त आपको "साइलेंट" रहना पड़ता है..! सीनियर ऑफिसर किसी काम मे खोट निकाल कर आपको उपदेश दे रहे हो या घर मे श्रीमतीजी किसी बात से रुष्ट हो..! आपको पता है की यहां  "साइलेंट" रहना ही आपके हित मे है अन्यथा यह कभी भी आपके अनावश्यक तनाव का कारण बन सकता है..!  

ये "साइलेंट" की प्रवृति ही ऐसी है कि आपके प्रकृति को बनाता है..! यह हर समय संभव नही है..! जैसे अंग्रेजी के हर शब्द में "साइलेंट" नही होता है..! आपको पता रखना पड़ता है कि कब कौन सा वर्ण कहा "साइलेंट" हो गया है..! इसी "साइलेंट" की प्रवृति को पकड़ने के लिए लोग अंग्रेजी की ओर ज्यादा झुकाव रखते है..! क्योंकि हिंदी में ऐसी कोई प्रवृति नही है और न हिंदी की ये प्रकृति है कि वो कही भी "साइलेंट" रहे। जो भी आता है अपनी उपस्थिति और पहचान को पूरी मुखरता के साथ कहता है..!

           अब जिनको सफलता के सोपान पर चढ़ना है तो कहाँ "साइलेंट" रहना है, ये जानना तो जरूरी है..! जो गांव की पंचायत से लेकर देश की राजनीति में आपको हमेशा दिख जाएगा..! चाहे मुद्दे कितने भी गंभीर क्यों न हो , "साइलेंट" रहना है या बोलना है उसका कोई तय पैमाना नही होता है..! यह मौका और परिस्थिति ही निर्धारित करता है। उसी प्रकार अंग्रेजी भाषा मे कौन सा वर्ण कब "साइलेंट" हो जाएंगे इसका का कोई कायदा और कानून तो है नही। जबकि हिंदी भाषा ने, कब बिंदु का प्रयोग होगा और कब चंद्र बिंदु लगाना है या फिर आधा "र" कब नीचे लगेगा और उसे कब ऊपर बैठना है , उसके भी नियम निर्धारित कर रखे है..! अब इतने नियम कानून कहाँ तक पालन हो सकते है भला ..!

              फिर जिस राह पर चल कर सफलता मिले लोग स्वभाविक रुप से उसी राह पर चलते है..! इसलिए मुझे लगता है देश मे अंग्रेजी के प्रसार-प्रचार में इस भाषा मे निहित "साइलेंट" का खास योगदान है..!

           अब हम हिंदी भाषा पर कितना भी शोर मचाये, लेकिन अंग्रेजी को पता है कि "साइलेंट"  रह कर भी कितना विस्तार हो सकता है...है कि नही..?