कबीरदास कहते हैं -
अंतर्नाद की थाप
अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं । अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥ "कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्यनही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं ।" — शुक्राचार्य
Sunday, 12 July 2026
दीघा यात्रा संस्मरण
Wednesday, 8 January 2025
सोहबत !
वही गांव के किनारे
जहाँ इंसानो की बस्ती है !
कुछ कुत्तो को पकड़
आज ले गए थे
आपने साथ
अपनी सोहबत में रखने के लिये !
शायद इसी से
कॉप उठा था उसका अंतरात्मा
की ये कुत्ते भी
इंसानी फितरत
न सिख ले !
हम तो अब तक
ड्रॉप या एटेम्पट !
अयोध्या बाबू विगत तीन साल से कोलकाता में है। सरकारी सेवा के स्थानांतरण क्रम में यह अभी इनका ठिकाना है। इस सेवा की अपनी दिनचर्या है और उनका ऑफिस सुबह साढ़े नौ से शाम छः बजे तक होता है। अयोध्या बाबू उससे इतर खुद के लिए खुद की निर्धारित दिनचर्या निर्धारित कर रखे है और उसके लिए स्वतः सजग रहते है।इसी के तहत सुबह टहलना उनका शगल और शौक है। वो कहते है कि ये सुबह का एक घंटा सिर्फ और सिर्फ उनका है, जिसमे वो खुद से बात करते है, खुद को देखते है । नही तो दुनियादारी के कवायद में कभी ठीक से देखे ऐसा मौका भला कहा मिलता है।वैसे तो पारिवारिक जिम्मेदारियों की अपूर्णता को भरने में ही परिवार के मुखिया की पूर्णता समझा जाता है।लेकिन फिर भी यह एक घंटा वो सुबह के भ्रमण में खुद से संवाद के लिए रखते है। इसी दिनचर्या अनुसार अयोध्या बाबू सुबह पांच बजे के आस पास जग गए।
वैसे भी आये दिन समाचार चैनलों में इस प्रवेश परीक्षा से पूर्व ही बच्चों के आत्महत्या के खबर से मन सशंकित रहता है। वो कभी-कभी इस समाचार को देखकर कहते हुए अपनी धर्म पत्नी से कहते- पता नही अभिभावक बच्चों को सिर्फ खिलने देना चाहते है या फिर खिलने के बाद इन फूल का माला अपने गले मे डालना चाहते है। तो उनकी पत्नी उनके बातों पर गौर किये बिना कहती- अब बच्चों के आत्महत्या में आप फूल और माला की क्या चर्चा करने लगे। अयोध्या बाबू इसपर बिना कुछ कहे मौन ही रहते।
Sunday, 14 April 2024
मैदान.....रिव्यू...!!
अगर आप मैदान अभी तक नही गए है तो अवश्य जाइये। मैदान पर तीन घंटा बिताना आपमे एक जोश और स्फूर्ति भर देगा। मैदान पर दौड़ते ही ये आपको भारतीय फुटबॉल के पचास से साठ के दशक में ले कर चला जायेगा । तत्कालीन भारत में खेल की स्थिति और उसमें मुख्य रूप से फुटबॉल का यह एक क्रमिक इतिहास है और इसे भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम दशक कहा जाता है। यह मैदान उस इतिहास की बानगी है कि खेल या कोई और क्षेत्र क्यों न हो उसमें राजनीति हमेशा भारी रही है। लेकिन यही मैदान दस्तावेज के कई ऐसे पृष्ठ भी दर्ज कर रखा जहां खेल के प्रति समर्पण में राजनीति परास्त हो गया है।
तो अभी तक आप समंझ गए होंगे कि मैं फ़िल्म मैदान की बात कर रहा हूँ। शायद फ़िल्म में प्रोमोशन की कमी हो या फिर मेरी स्वयं की उदासीनता इसका नाम मैंने नही सुना। जब अचानक से लोकतांत्रिक संवाद के तहत इस निर्णय पर पहुंचा गया कि आज कोई फ़िल्म देखी जाय तो संवाद में अपनी उस्थिति दर्ज कराते हुए बेटे ने कहा--चलिए फ़िल्म मैदान देखते है। तो असहमति कोई कारण न था। आखिर धरना का निर्माण स्वयं के आकलन से चाहिए न कि किसी और कि धरना का विश्लेषण कर।
थियेटर खाली-खाली सा ही था। संभवतः अभी दर्शक इधर आकर्षित नही हुए है या फिर वीकेंड का इंतजार है। वैसे तो खेल की पृष्ठभूमि पर कई हिंदी फ़िल्म बने है।। उसमें भी कई बॉयोपिक है जिसमे मेरीकॉम, एम एस धोनी, दंगल इत्यदि कई नाम है। जहां चक दे इंडिया हॉकी पर आधारित था, वही मैदान फुटबॉल के खेल पर आधारी है। दोनो ही फ़िल्म के कहानी का केंद्र बिंदु कोच है। लेकिन अंतर इतना ही है कि फ़िल्म चक दे इंडिया का कोच काल्पनिक है जो हकीकत लगता है वही फ़िल्म मैदान का कोच वास्तविक है और फ़िल्म में भी कही से फिल्मी नही लगता है।
तो फ़िल्म "मैदान" भारतीय फुटबॉल खिलाड़ी और कोच एस ए रहीम पर आधारित है। इस कोच के साथ फ़िल्म की यात्रा करते हुए तत्कालीन कोलकाता, हैदराबाद को काफी करीब से देखते है और रह-रह कर भारतीय खिलाड़ी और खेल में व्याप्त विभिन्न असंगति को समझना हो तो आप पाएंगे ये सब कुछ पूर्ववत है। इसके बावजूद की परिस्थितियों में बदलाव दृष्टिगोचर है।कोलकाता में रहते हुए, फ़िल्म में पचास-साठ के दशक के कोलकाता को देखना एक अलग अनुभव है और इसे कितनी सूक्ष्मता से उभरा गया है यह फ़िल्म देखने पर ही पता चलेगा।
पूरी फिल्म का केंद्रबिंदु कोच रहीम साहेब है।मैदान’ की कहानी आजाद भारत की फुटबॉल टीम के कोच सैयद अब्दुल रहीम और उनकी टीम पर आधारित है। फिल्म में जज्बा, जुनून और इमोशन सब दिखाया है।लगभग एक सौ अस्सी मिनट की फ़िल्म आपको बांधने में सफल रहता है। यह जानते हुए भी की यह एक स्पोर्ट्स ड्रामा है और अंत भी प्रेडिक्टेबल है, फिर भी अंत तक आप बंधे रहते है। मुख्य भूमिका अर्थात रहीम कोच की भूमिका में अजय देवगन खुद है और आप कह सकते है कि वो सिर्फ खुद को साबित कर रहे है। उनकी पत्नी की भूमिका में प्रियामणि अच्छी है। बाकी सभी पात्रों का चयन बिल्कुल पात्र के अनुरूप है और शायद वास्तविकता के करीब। लेकिन रहीम साहेब के अलावा फिल्म जिन पात्रों के इर्द-गिर्द फ़िल्म घूमता है उसमें एक मुख्य पात्र राय चौधरी है और इसकी भूमिका निभाया है गजराज राव । यह आपको अलग से प्रभावित करते है। फिर सुभन्कर के पात्र में रुद्रमणि घोष तो ऐसे लगते है कि किरदार की आत्मा उनमें प्रवेश कर लिया हो। वैसे भी रुद्रमणि घोष बंगला फ़िल्म के अभिनेता होते हुए भी राजनीति में काफी सक्रिय है।
जी स्टूडियो के तहत बने इस फ़िल्म का निर्देशन किया है अमित शर्मा ने। मुख्यतः विज्ञापन फ़िल्म बनाते है लेकिन इससे इन्होंने बोनी कपूर द्वारा प्रोड्यूस फ़िल्म बधाई हो का निर्देशन किया था, जिसे काफी सराहा गया। और यह फ़िल्म इनको और स्थापित करेगा इसमें कोई संदेह नही है। संवाद लेखन काफी उत्कृष्ट है। "जब नींव कमजोर हो तो छत बदलने से कुछ नही होगा", यही एक खेल है जिसमे भाग्य की रेखा हाथ से नही बल्कि पैर से लिखा जाता है, कहने को एक सबसे छोटा है लेकिन यही सबसे बड़ा भी है आदि कई डायलॉग आपका ध्यान फ़िल्म में कहानी के स्थिति के अनुरूप आपका ध्यान खीचेंगे। बाकी संगीत "ए आर रहमान" का है और आप जानते है नाम ही काफी है।बैकग्राउंड संगीत बिल्कुल उनके ट्रेडमार्क का है, गीत गुंजाइश के अनुरूप है और फ़िल्म में अच्छे लगते है।
तो कुल मिलाकर यह एक स्वस्थ मनोरंजक, प्रेरणास्रोत, पारिवारिक फ़िल्म है और यह सब आनंद आपको फ़िल्म की समीक्षा पढ़ने में नही बल्कि फ़िल्म को देखने मे आएगा...है किन्ही ?
Thursday, 14 September 2023
हिंदी दिवस
सबसे पहले आप सभी को हिंदी दिवस की बधाई..!
हिंदी की मुखरता यह है कि यहां कोई मात्रा अथवा वर्ण "साइलेंट" नही रहता। एक बिंदु भी अपने वजूद को मुखर होकर कहता है। लेकिन अंग्रेजी में "साइलेंट" एक सामान्य बात है। तो फिर इस "साइलेंट" होने के अपने महत्व है।कई बार आप चाहते हुए भी बहुत कुछ नही कह सकते, चाहे वह आपका घर हो या दफ्तर..! वक्त वेवक्त आपको "साइलेंट" रहना पड़ता है..! सीनियर ऑफिसर किसी काम मे खोट निकाल कर आपको उपदेश दे रहे हो या घर मे श्रीमतीजी किसी बात से रुष्ट हो..! आपको पता है की यहां "साइलेंट" रहना ही आपके हित मे है अन्यथा यह कभी भी आपके अनावश्यक तनाव का कारण बन सकता है..!
ये "साइलेंट" की प्रवृति ही ऐसी है कि आपके प्रकृति को बनाता है..! यह हर समय संभव नही है..! जैसे अंग्रेजी के हर शब्द में "साइलेंट" नही होता है..! आपको पता रखना पड़ता है कि कब कौन सा वर्ण कहा "साइलेंट" हो गया है..! इसी "साइलेंट" की प्रवृति को पकड़ने के लिए लोग अंग्रेजी की ओर ज्यादा झुकाव रखते है..! क्योंकि हिंदी में ऐसी कोई प्रवृति नही है और न हिंदी की ये प्रकृति है कि वो कही भी "साइलेंट" रहे। जो भी आता है अपनी उपस्थिति और पहचान को पूरी मुखरता के साथ कहता है..!
अब जिनको सफलता के सोपान पर चढ़ना है तो कहाँ "साइलेंट" रहना है, ये जानना तो जरूरी है..! जो गांव की पंचायत से लेकर देश की राजनीति में आपको हमेशा दिख जाएगा..! चाहे मुद्दे कितने भी गंभीर क्यों न हो , "साइलेंट" रहना है या बोलना है उसका कोई तय पैमाना नही होता है..! यह मौका और परिस्थिति ही निर्धारित करता है। उसी प्रकार अंग्रेजी भाषा मे कौन सा वर्ण कब "साइलेंट" हो जाएंगे इसका का कोई कायदा और कानून तो है नही। जबकि हिंदी भाषा ने, कब बिंदु का प्रयोग होगा और कब चंद्र बिंदु लगाना है या फिर आधा "र" कब नीचे लगेगा और उसे कब ऊपर बैठना है , उसके भी नियम निर्धारित कर रखे है..! अब इतने नियम कानून कहाँ तक पालन हो सकते है भला ..!
फिर जिस राह पर चल कर सफलता मिले लोग स्वभाविक रुप से उसी राह पर चलते है..! इसलिए मुझे लगता है देश मे अंग्रेजी के प्रसार-प्रचार में इस भाषा मे निहित "साइलेंट" का खास योगदान है..!
अब हम हिंदी भाषा पर कितना भी शोर मचाये, लेकिन अंग्रेजी को पता है कि "साइलेंट" रह कर भी कितना विस्तार हो सकता है...है कि नही..?
