Sunday, 12 July 2026

दीघा यात्रा संस्मरण

 कबीरदास कहते हैं -

“हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।
बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥”
अर्थात साधक जब ईश्वर रूपी समुद्र में मिलता है, तो उसका अलग अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
अथाह मिलो तक क्षितिज से एकाकार विशाल विस्तृत फैले पारवार पर मचलते मौज या तो आपके आँखों में समा जाते है या फिर आप उन पलो के लिए इन मौजों में विलीन हो जाते है। जब उर्मी इन सागर पर हिलोरे लेते है तो लगता है जैसे सैंधव राग के सुर कानों में घुलने लगे है।असंख्य लहरों के हिलोरों से जब मधुर संगीत सागर के तट पर संगीत लहरी छेड़ते है तो जैसे आप वर्तमान से खोकर इन्हीं में बेसुध खो जाते है।फिर आप सागर की राग में घुल जाते है या ये राग आपके अंतर्मन में गहरे तक बैठ जाता है।
सागर अपने कई रूप आपको किसी भी तटीय क्षेत्र में सम्मोहित करेगा।बशर्ते आप मोबाइल में अपनी छवि केंद्रित करने ही में पूरी तरह मशगूल न होकर सागर की प्रकृति से अपनी प्रवृति को भी एकाकार करना चाहते हो। इसलिए "बिरकुल" क्षेत्र घूमने की योजना जाजपुर के प्रवास के दौरान कई बार बना किंतु अमली जामा नहीं पहना सका।कोलकाता आने के बाद भी योजना बनते हुए भी कार्यान्वित नहीं हो पाया। वैसे देखे तो यह जगह कोलकाता और जाजपुर रोड के लगभग मध्य में है। दोनों स्थान से लगभग दो सौ किमी की दूरी पर है।
सप्ताहांत के दो दिन सरकारी अवकाश है। किंतु कोलकाता प्रवास अभी तक या तो विभिन्न कारणों से ध्यान नहीं गया या फिर और कई कारण रहे होंगे। उनमें से शायद जगन्नाथ पूरी की गाहेबगाहे कई यात्राएं इसका कारण हो सकता है ,लेकिन सैन्धव के भिन्न क्षेत्र के अनुभव और उसमें उठती तरंग का रोमांच कुछ अलग ही है।हर सागर में लहर एक सी उठती है लेकिन उसके राग हर कोई कई रूप में आनंदित होता है।
वैसे यहां बंगालियों में उनके छुट्टी में पर्यटन क्षेत्र के रूप में आकर्षण में एक नाम उभर कर आता है। कोई अगर कही जाने का प्लान बना रहा हो और अगर आप उनसे पूछेंगे कि कहा का प्लान है। तो उनका उत्तर आयेगा देख छी "दीपू दा" मोदे जाबो। दीपू दा अर्थात दीघा, पूरी अथवा दार्जिलिंग इनमें कही भी जाऊंगा। हमने भी सोचा पूरी और दार्जिलिंग घूम ही चुके है तो फिर दीघा भी देख ही लिया जाए।
ऐसे प्रस्ताव सामान्यतः ध्वनिमत से ही पास हो जाते है, फिर भी गृह मंत्रालय के समक्ष औपचारिकता वश रखा गया, कि उलाहना सुनने को मिले कि जब सारे फैसले पीएमओ ले ही रखा है, फिर हम आखिर कौन है। किंतु जब योजना अनुरूप हो तो चाहे घर हो या सरकार कोई विरोध नहीं होता। अतः हम यात्रा की रूप रेखा तय करने कई पहलुओं को देखने की कोशिश करने लगे।खुद की गाड़ी या यात्रा के अन्य साधनों पर विमर्श के बाद यह तय कर लिया गया कि अपने संसाधन ही यात्रा के लिए उपयुक्त होगा। अब ठहरने के लिए विभिन्न जुगाड़ साधनों में विकल्प को तलाशने का प्रयास किया गया। किंतु चुकी अंतिम योजना अंतिम समय में तय हुआ तो लगभग सभी सरकारी गेस्ट हाउस के संपर्क सूत्र ने बताया कि मैं समय से थोड़ा पीछे प्रयास किया ,अब कोई गेस्ट हाउस खाली नहीं है। अब चूंकि समय के पहले मुझे खुद पता नहीं था कि हम जाने वाले है तो फिर उनको कैसे बताता। अतः अंतर्जाल के बिछे दुनिया में होटल को खंगाल कर हमने अपने लिए एक अदद होटल बुक कर दिया।वैसे आपको इस समय लगभग ढाई से तीन हजार में अच्छे होटल मिल जायेंगे। वैसे आप जानते ही है कि मूल्य हमेशा मांग के समतुल्य होता है। सप्ताहांत में होटल के चार्ज अन्य दिनों के साथ तुलनात्मक अध्ययन से पता चल गया कि बंगाली "दीपू दा" की ओर सदैव आकर्षित रहते है।
वैसे मौसम विभाग ने इस पूरे क्षेत्र को "येलो अलर्ट" के दायरे में रखा था। यह जानकर दिल का घबराना वाजिब है। इन स्थिति में अब्दुल अहद साज़ का ये शेर दिल को दिलासा देने के लिए उपयुक्त लगा -

दोस्त अहबाब से लेने न सहारे जाना
दिल जो घबराए समुंदर के किनारे जाना!!
इसलिए सोचा चल कर एक बार बादलों के कोलाहल के बीच लहरों की अटखेलियां क्यों न देखा जाय। फिर समुद्र आसमान से गिरते मोती को कैसे समेटता है इन दृश्य को दिखना भी अपने आप में एक रोमांच ही है।वैसे इंसान अनुमान तो लगा सकता है, लेकिन वो कितना सही होगा प्रकृति अपनी प्रवृति के अनुरूप इस इंसानी क्षमता को जानता ही रहता है।अपने इच्छानुसार ऐसे मनःस्थिति में हम विज्ञानी भविष्यवाणी से ज्यादा प्रकृति की प्रवृति को अपने अनुकूल मान फैसला ले लेते है।अतः हमने निकलने का फैसला कर लिया। जब ये सीपियां न जाने कब तक इन बूंदों की आश में आसमान की ओर निहारते रहते है तो, अभी तो हमे इन बूंदों को सागर तक पर थिरकते देखने का अनुकूल समय है।तभी तो आचार रामचंद्र शुल्क ने कहा -

स्वाति बूँद जब सीप में, करे प्रवेश अघात।
सहि पीड़ा वह रत्न बन, जग में होय विख्यात॥
बेशक आप कितने भी संकल्प कर ले कि सुबह जल्द से जल्द निकल चलेंगे।लेकिन अगर आप अपने वाहन से निकलना तय करेंगे तो समय का संकल्प आपके सुविधा पर सदैव थोड़ा प्रभाव डाल ही देता है। अतः जहाँ हम पांच बजे निकलने की योजना बना रखे थे, लेकिन हमे निकलते निकलते सात बज गये। शनिवार के दिन और सुबह का समय होने के कारण हम जल्द ही कोलकाता शहर को छोड़ते हुए शिवपुर हावड़ा के रास्ते राष्ट्रीय राजमार्ग-116 पर आ गए। किंतु यह रास्ता थोड़ा सकड़ा और भीड़ भाड़ वाला था, इसके बनिस्पत अगर दक्षिणेश्वर के रास्ते आप राष्ट्रीय राजमार्ग पकड़ते है तो आपको समय कुछ कम लग सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 116 पर चलते हुए सुबह लगभग साढ़े नौ का समय हो गया। नाश्ता के लिए हम कोलाघाट में रुके जो लगभग कोलकाता से पैंसठ की मि दूर है। चूंकि पहुंचने की जल्दी थी अतः नाश्ते में ज्यादा समय न लगाकर हम आगे की ओर निकल गए।
जैसे समुद्र की आती लहरों का कोई तय दायरा नहीं होता और आप सिर्फ अनुमान लगा सकते है। वैसे ही जब आप खुद की वाहन से जा रहे हो तो पहुंचने का अनुमान लगा सकते, क्योंकि रास्ते में आने वाले अवरोध का कोई तय दायरा नहीं हो। कोलाघाट से अभी कुछ दूरी ही तय किया था कि लगभग लंबी जाम के गाड़ी के ब्रेक लग गए। पता चला कि आगे दो ट्रक बीच रोड पर भिड़े हुए है। राष्ट्रीय राजमार्ग के व्यवधान की सूचना स्थानीय प्रशासन को पहुंच चुका था। काफी मशक्कत के बाद लगभग रोड के कुछ दायरों को खाली करा लिया गया, जिसमें छोटे वाहन निकल सकते थे।लगभग डेढ़ घंटे के बाद फिर से गाड़ी ने रफ्तार पकड़ लिया।
अब हम तामलुक पहुंच गए। लगभग सौ कीमी की यात्रा अर्थात दीघा और कोलकाता के मध्य। तामलुक पूर्व मेदनीपुर का जिला मुख्यालय है। रूपनारायण नदी के तट पर बसा यह शहर प्राचीन काल में 'ताम्रलिप्त' के नाम से प्रसिद्ध था और एक प्रमुख बंदरगाह था। अगर आप खड़कपुर के रास्ते आ रहे है तो भी आपको तामलुक आना होगा।दीघा भी पूर्व मेदनीपुर जिला अंतर्गत आता है। अब हम दीघा के रास्ते कार का रुख राष्ट्रीय राजमार्ग 116 B पर मोड़ लिए। अब सड़क के किनारे के नजारे धीरे धीरे तटवर्तीय क्षेत्र के वनस्पतियों से आच्छादित हो गया और हरीतिमा की शोभा निखरने लगा।लंबे लंबे नारियल के पेड़, झाऊ और काजू मुख्य रूप से नजर आएंगे। लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद दीघा के प्रवेश द्वार पर पहुंच गए।गूगल ने बिना किसी व्यवधान के हमे होटल तक ले आया। दिन के लगभग डेढ़ बज गए। अर्थात हम अपने अनुमानित समय से लगभग ढाई घंटे विलंब से दीघा में दस्तक दे रहे थे। समय भोजन का हो गया था। होटल में रेस्टोरेंट होने के बावजूद भी हमे वहां भोजन उपलब्ध नहीं हो पाया। मैनेजर ने कहा यहां सिर्फ उतने ही मेहमानों का भोजन बनता है जो पहले से ऑर्डर दिए होते है। अतः अभी तो नहीं किंतु अगर आप चाहते है तो रात का खाना बन जायेगा। फिर मैनेजर से कुछ आधारभूत जानकारी लेकर हम भोजन और फिर समुद्री लहरों की तलाश में होटल से निकल गए।
खाने के बाद सीधा हम समुद्र तट की ओर निकल गए। होटल से समुद्री किनारा बमुश्किल दो सौ मीटर होगा। अपराह्न का समय होने के कारण अब नहाने का कोई इरादा नहीं था।अतः हम तट से बने भ्रमण पथ से टहलते हुए एक जगह आकर इन लहरों की नृत्य का मजा लेने बैठ गए। वैसे कुल मिलकर दीघा क्षेत्रफ़ल की दृष्टि से कोई बहुत बड़ा नहीं है। फिर भी यह नए और पुराने दीघा के नाम से समुद्री किनारे बटे हुए है और यह पूरा इलाका दीघा शंकरपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी के तहत इसका विकास कार्य किया जा है।
वैसे ऐतिहासिक रूप से देखे तो ब्रिटिशकालीन भारत में पहली बार इस तट के सौंदर्य पर नजर बंगाल के पहले गवर्नर जरनैल वारेन हेस्टिंग का गया और सन 1780 में एक पत्र के द्वारा इसके खूबसूरती का वर्णन अपनी पत्नी को किया।उस समय दशकों तक ब्रिटिश अफसरों के लिए यह प्रमुख पर्यटक स्थल हुआ करता था और कहते है हाथी की सवारी करके कई दिनों की यात्रा के बाद यहाँ पहुंचते थे। स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल के प्रथम मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय ने दीघा के पर्यटन क्षेत्र के तौर पर विकसित करने में काफी दिलचस्पी लिया।
लगभग सात की मी की लंबी तट पर हम जितना हो सके टहलते हुए इन लहरों और तट के बीच संघर्ष से उत्पन्न संगीत कानों में सुमधुर संगीत सुनते हुए समुद्र की मिलों विस्तार के साथ आसमान का मिलन के दृश्य का आनंद लेते रहे। कुछ समय पश्चात नई दीघा के हलचल का अनुभव करने ई रिक्शा की सवारी कर उन तटों पर चहल कदमी करने पहुंच गए।
प्रख्यात जगन्नाथ मंदिर नई दीघा में ही है।शाम के समय फिर हम मंदिर के दर्शन के लिए पुनः एक ई रिक्शा का मंदिर प्रांगण पहुंच गए। वैसे हमे पता था कि अभी मंदिर कपाट बंद है।किंतु भगवान तो हर जगह ही है और हम तो भगवान का प्रांगण जो कि इंसानों ने बनाया है उसे ही देखने जाते।मंदिर के भव्यता पर आप मंत्रमुग्ध होकर बस उसे निहारते रहते है, लेकिन आप थोड़ा मायूस भी होंगे जब प्रभु आपको दर्शन के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। खैर हम विशाल प्रांगण को हर ओर से चहलकदमी कर इसकी भव्यता को निहार कर वापस होटल की ओर निकल गए। रास्ते से चलते हुए निशा के आगमन के साथ साथ पर्यटकों की भीड़ समुद्र को रात में निहारने पहुंच चुके थे। विभिन्न प्रकार की रोशनी से पूरा तट गुलजार होने लगा। इस रात में लहरों को केंद्रित कर लगाये गए विशाल हाई मास्ट लाइट की रोशनी में जैसे लग रहा लहरे थिरक रही हो। रास्ते भर लहरों की इन क्रीड़ा को देखते हुए हम होटल पहुंच गए। जहां मेहमानों के इच्छानुसार होटल के रेस्टोरेंट में खाना तैयार होता होता है। आपने अगर पहले से बता रखा है तो आपको भोजन उपलब्ध होगा अन्यथा आप अपनी व्यवस्था खुद करे। खाने के बाद बिस्तर पर आते समय रात के दस बज गए और कब आँख लगी पता ही नहीं चला।
खुद ब खुद सुबह पांच बजे पलकों से नींद गायब हो गया। मैं फ्रेश हो गया, मां और बेटे अभी भी तन्द्रा में थे।मै सोच ही रहा था कि अब क्या करूं ! तब ये शेर दिमाग में कौंध गया -
उस समंदर की तिश्नगी देखो,
उसको नदियों का ख्वाब दिखता है।
रात ख्वाब में समुंदर ही था। अतः अब सुबह में तट में इन लहरों को मचलते देखना चाहता था। माँ और बेटे गहरे नींद में थे अतः मैं व्यवधान न डालकर समुद्र तट की ओर निकल गया।
आसमान में बादल ने अपना डेरा जमा रखा था। अब बादल के इन बूंदों की डर से मै सुबह का समुद्री हलचल से वंचित रह जाऊ ऐसा नहीं चाहता था। आखिर ये बूंद को तो इन सागर में ही विलीन हो जाना है। होटल से निकलते ही गेट पर इक्का दुक्का ई रिक्शा हम जैसे लोगों को अपने सुप्रभात के लिए इंतजार में थे। मुहाना - मुहाना की आवाज देकर पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचने में लगे थे। मुहाना अर्थात पुरानी दीघा का वो क्षेत्र जहां दूर तक तट के साथ रेत पसरी हुई है।मै इन आवाज को नजरंदाज कर पैदल भ्रमण के उद्येश्य से निकल पड़ा। अब होटल से चलकर तट के साथ रोड पर आ गया। रास्ते के किनारे चाय की दुकान भी सजने लगी। एक दुकान पर रुककर सोचा पहले गर्म ताजी चाय की चुस्की ले ली जाय। चाय पीकर कुछ कदम चलते ही समुद्र के किनारे दूर तक रेत की सपाट चादर बिछी हुई दिखाई दिया। मैं रोड से उतरकर अब रेत पर पहुंच गया। लगभग दो कीमी का फैला हुआ दायरा का अंतिम छोर मुहाना के नाम से चर्चित है।अब धीरे - धीरे समुद्र की लहरों से पांव के संपर्क होने लगे। बीच-बीच में बादलों से आंख मिचौली कर सूरज की किरणें जब इन रेत के संपर्क में आता तो लगता जैसे सुनहरी चादर किसी ने बिछा दिया। लहरों पर सवार किरण बिल्कुल रश्मिरथी की तरह प्रतीत होता। सुबह के साढ़े सात होने को थे, मै फोन कर मां बेटे कोसपनो की दुनिया से जगाकर इस अथाह सागर की क्रीड़ांगन में प्रकृति की वास्तविक दुनिया रूबरू होने के लिया बुला लिया।
रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा है - तट सागर से फुसफुसाकर कहता है: 'मुझे लिखकर बताओ कि तुम्हारी लहरें क्या कहने के लिए संघर्ष कर रही हैं।' सागर बार-बार झाग में लिखता है और एक प्रचंड निराशा में उन रेखाओं को मिटा देता है। इस कथन का मर्म महसुस कर सकते जब नदीकांत के तट पर लहरों की इस क्रीड़ा को अनुभव के लिए आप वहां पहुंचते है। सागर में उठते तरंग और लहर किनारे पर आकर चुपचाप से खामोशी ओढ़ लेना शायद किसी निराशा का पर्याय हो।लेकिन आशा फिर लहरों का रूप धर कर फिर से उस तट से टकराने को दौड़ती है। शायद हमसे तट से टकराना ही उसकी मंजिल है लेकिन एक बार मंजिल तक पहुंच कर वापस लौटने में निराशा नहीं बल्कि आशा का वो स्वरूप है जो दुगुने वेग के साथ मचलते हुए दौड़ती है। यही तो गीता का कर्म योग है।
सुबह के साढ़े साथ बज गए थे। अब मां और बेटे भी इन सुबह का नजारे देखने के लिए मुहाने पर पहुंच गए। कुछ घंटे लहरों की अटखेलियां देखकर अब बगल में ही मछली बाजार का रंगत देखने पहुंच गए। ये विभिन्न प्रकार की समुद्री मछली का एक बड़ा बाजार है। जो मुख्यत एक्सपोर्ट के लिए है और समुद्र से मछली मारकर आने वाले मछुआरे इसी बाजार में अपनी मछली बेचते है। चूंकि सिर्फ आज का ही दिन था और हमें वापस भी निकलना था। अतः नौ बजे तक हम होटल पहुंच कर नाश्ता से निवृत हो गए।
मौसम विभाग के "पीली चेतावनी" अब तक बेअसर साबित हुआ। मौसम की नरमी ने अब तक की यात्रा को काफी अनुकूल बना रखा था।किंतु आगे का हाल हमे पता नहीं, इसलिए अब निकलना उचित लगा।निकलते समय हमें पता था कि रास्ते में कई और बीच प्रसिद्ध है, जिनमें शंकर बीच, मंदारमनी इत्यादि प्रमुख है। शंकर बीच तो दीघा से सिर्फ सात की मी की दूरी पर है, लेकिन वहां किनारा रेतीला न होकर कंक्रीट के लंबी चौड़ी सीढ़ीनुमा तलहटी बनी है। जहां आप घंटों बैठकर इन लहरों का आनंद ले सकते है। समय हमारे गिरफ्त में नहीं होता हम समय के गिरफ्त में होते है। अब समंदर भी एक और लहरों का शोर भी वही। टकराती हुई तट भी एक धरती का टुकड़ा और हमने नाम अलग नवाजा। इसलिए बैठने की इच्छा के बावजूद भी समय इजाजत नहीं दे रहा था कि इन समुद्र की आगोश में कुछ पल और व्यतीत किया जा सके। अतः समुद्र तट के साथ बने रोड पर हम मंदारमनी बीच की ओर बढ़ चले। इस क्षेत्र में काफी रिज़ॉर्ट और होटल है। यहां खासियत है कि ये रिजॉर्ट अपना प्राइवेट बीच पर्यटकों को उपलब्ध कराते है।मंदारमनी की दूरी दीघा से लगभग तीस कीमी है। मंदारमनी में कुछ देर तक इन्हीं इन्हीं नजरों को अपने अंतर्मन और मोबाइल में छवि कैद कर पुनः गूगल मैप पर कोलकाता का निर्देश दे दिया।
जैसे जैसे हम इन तटवर्ती क्षेत्र से दूर होते जा रहे थे मन में कबीरदास का दोहा गूंज रहा था -
“हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।
बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥”
अर्थात साधक जब ईश्वर रूपी समुद्र में मिलता है, तो उसका अलग अस्तित्व समाप्त हो जाता है। बिल्कुल वैसे ही हम बिना साधना के अब भी अपने अस्तित्व से अलग सागर के अस्तित्व में समां रखा हूँ।

तक पीछे से किसी वाहन ने तेज हॉर्न बजाया और मैं इन लहरों से लगा तैर कर बाहर निकल आया।तभी सामने बोर्ड पर राष्ट्रीय राजमार्ग 116-B और कोलकाता एक सौ पैंसठ की मि दिखा रहा था। अब मैं लहरों की बजाय इन रोड पर अपना ध्यान केंद्रित कर अपने गंतव्य के लिए बढ़ चला। आसमान पर बादल अब भी अपना डेरा जमा रखा था।कार के शीशे पर बारिश की बूंदे अपने अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत दिखने लगे। इन बूंदों को देखकर किसी शायर के दो पंक्तियां याद आ गए-
हर बूंद में उसके, एक दरिया-ए-हस्ती है,
समंदर की हर बूंद, एक नई मस्ती है !!








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