Saturday, 25 July 2026

विकास कहां है..?

            बहुत दिन हो गए...!उसकी कोई खोज-खबर नहीं, न कही कोई चर्चा आखिर वो गया कहाँ..! गाहे बगाहे कभी गाँव के चौपाल पर या कभी चाय के दुकान पर नहीं तो कभी अखबार के पन्ने पर और कभी कभी मीडिया के स्क्रीन पर..! हर कही तो वो चर्चा में था..! लेकिन अब, अब कहां है वो..? आखिर चला तो नहीं गया और गया तो आखिर गया भी कहां, कुछ तो अता पता नहीं ..!

       कितने वर्षों से सुन रहा था, वो आने वाला है..! हां अब वो जरूर आयेगा और अब उसे आने से कोई रोक नहीं सकता..! सब इंतजार में थे, आखिर उसके आने से बहुत कुछ बदलने वाला था..! आँखो में उम्मीद की चमक लिए गांव के रुखी सुखी वाले दिहाड़ी किसान से लेकर शेयर मार्केट के तोंदू सटोरिए तक सभी उसकी उसपर ऐसे चर्चा कर रहे थे, जैसे वो उन सबका अपना है, नहीं..नहीं सपना है !

        तो फिर क्या सपना टूट गया या फिर जो अपना था वो कही छूट गया..! आखिर गया तो गया कहां और अब वो किसी को याद क्यों नहीं आ रहा है?

        मैं समझ गया इन चार पंक्तियों से आगे बढ़ने की आप में न धैर्य रहा और न समय ..! मैं जनता हूं उसके इंतजार ने आपके धैर्य रखने की क्षमता को कुप्रभावित किया है..! या फिर ऐसा तो नहीं है कि वो आ भी गया और घर घर में छा भी गया। अब ये कहावत तो आपने सुना ही होगा कि घर की मुर्गी दाल बराबर..! ऐसे में जनता हूं ये मुहावरा भी समय अनुकूल नहीं है..! क्योंकि मुर्गी की बात छोड़िए दाल मिल रहा कि नहीं फिलहाल उसपर फोकस कीजिए..!

खैर छोड़िये इन मुहावरों की बाते, क्योंकि ये पुराने हो गए और अर्थ भी खो रहे है..! इसलिए अब नए अर्थ में नए मुहावरे भी गढ़े जा रहे है..!

  तो मैं कहा कह रहा था कि अब वो चर्चा से बाहर क्यों है, आखिर कहां है, किसी को कुछ पता है तो आप बता सकते है..! अब भी नहीं समझे अरे मै "विकास" की बात कर रहा हूं। वही "विकास" जो कभी हर चर्चा में  मुख्य बिंदु हुआ करता था ! आजकल पता नहीं क्यों "विकास" ओझल हो गया है..! ऐसा तो नहीं गलती से "कॉकरोच" की भीड़ में गुम हो गया है ? आपको कही "विकास" दिख जाए तो जरूर बताना..!आखिर आप भी ढूंढ ही रहे होंगे...है कि नहीं..!!

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