Sunday, 28 May 2017

बैगपाइपर

                एक राजा था । काफी वर्षो से राज्य कर रहा था।उसे जो राज्य की विरासत मिली थी उसने काफी मेहनत से उसे सवारने का प्रयास किया। उसका राज्य पहले की अपेक्षा काफी मजबूत भी हो गया।लोग मेहनत कर अपना रोजी रोटी भी चला रहे थे।पहले तो कुछ पडोसी राज्यो ने परेशान भी किया किन्तु जब लगा की इससे टकराना ठीक  नहीं तो अमन चैन से ही आगे बढ़ाना उचित समझा।किन्तु बीच बीच में ऐसा कुछ हरकत कर जाता की राजा और प्रजा दोनों बेचैन हो जाते। इसी में कुछ लोग जो राजा के विरोधी थे।अब राजा के खिलाफ प्रलाप जनता के बीच करने लगे। रोज रोज अब जनता के बीच जाकर राजा के विरुद्ध कोई न कोई आरोप लगा देते। जनता जो की अपने में व्यस्त रहता पहले तो अनसुना रहा,लेकिन हर रोज कुछ न कुछ सुनकर अब उसके मन में भी संदेह उठने लगा। राजा के गुप्तचर उसको इस बात की सुचना समय समय पर देते रहते किन्तु वह अपने काम में व्यस्त रहता और कुछः नहीं कहता। अब जो यह देखते तो उनके मन में भी शंका उठने लगा। हर रोज राजा के खिलाफ कोई न कोई प्रवंचना होता और राजा है कि कुछ कहता नहीं। राजदरबार और उसके मातहत को भी राजा के इस व्यवहार पर शंका होने लगा। अब कुछ लोग सोचने भी लगे कही कुछ गड़बड़ तो नहीं। आखिर राजा कुछ कहता क्यों नहीं।
              दिन बीतने लगे।धीरे धीरे प्रजा भी राजा के व्यवहार पर शंका करने लगे। अब अगर दूसरे राज्य द्वारा कुछ कर दिया जाता तो विरोधी इसके लिए अब राजा की निष्ठां पर प्रश्न उठाने लगे। जनता भी धीरे धीरे अब दैनिक कार्य कलापो से ऊपर उठ राष्ट्रभक्ति स्वाभिमान ,संस्कृति के मूल्याङ्कन में विचार विमर्श शुरू कर दिया। विरोधी ने राजा के अब तक के कार्य का मूल्यांकन करना शुरू किया। अब जनता के मन में भी शंका के कीड़े पनप चुके थे। सो उन्होंने विरोधीयो के किये जा रहे मूल्यांकन को सही मानने लगे। इसका आधार किया है और किसकी तुलना में मूल्याङ्कन है इससे अब किसी को कोई मतलब नहीं था। मन में अब जो ज्वार उठ रहे थे उसमे वास्तविकता कम और भाव ज्यादा थे। धीरे धीरे प्रजा और खिलाफ होने लगा। विरोधी के बात पर अब प्रजा यकिन  करने लगा। लोगो ने एक तरह से बिना राजपठ के उसे राजा मानने लगे।
         अब राजा को ये पता चला की जनता में उसके प्रति अविश्वास हो गया तो उसने अपने सभी दरबारियों को बुलाकर मंत्रणा करना शुरू किया। इस तरह से जब प्रजा विरोध में हो तो कितने दिन तक राज पाठ सुरक्षित रहेगा। यह सोचकर उसने यह निर्णय लिया की क्यों न विरोधी नेता को राज्य सौप दिया जाय और देखे ये राज्य की खुशहाली के लिए किया करता है। यह कहकर उसने अपने पूरे मंत्री परिषद् के साथ इस्तीफा देकर विरोधी नेता को राज्य सौपने की घोषणा कर दी।
           इस फैसले के साथ ही पूरे राज्य में ख़ुशी मि लहर फ़ैल गई। चारो ओऱ ढोल नगर बजने लगे आतिशबाजियों से पूरा राज्य गूँजने लगा। लोगो को लगा की अब मसीह आ गया और जिस स्थिति में है उससे बहुत बेहतर उनकी स्थिति हो जायेगी। विरोधी नेता ने राज्य ग्रहण के साथ ही शब्दों के सुनहरें भविष्य रच दिया।लोगो ने कहना शुरू किया कि जो इतना अच्छा बोलता और सोचता है तो कितना अच्छा काम करेगा।  उसने अपने सबसे काबिल लोगो को अपने मंत्री परिषद् में रखा ।बेसक जनता न पसंद करते हो।किन्तु अब राज्य तो उनके पास था। लोगो के आँखों में वादों के लंबे पेहरिस्त तैरने लगे। तत्परता ऐसी की लगने लगा सब कल ही पूरा हो जाएगा।
             अब राजा बनते ही उसे कुर्सी में छिपे कांटे चुभने लगे। सो वो समझ यहाँ से बाहर रहने में ही भलाई है। यह सोचकर उसने पडोसी और अन्य  देशो का भ्रमण शुरू कर दिया। जनता को भरोसा दिया की जब रिश्ते पड़ोसी के साथ मधुर होंगे तो तनाव नहीं होगा और तनाव नहीं होगा तो हम विकास पर ध्यान देंगे। फिर अपना राज्य खूब विकास करेगा। जनता ने उसकी इस सोच का दिल खोल के स्वागत किया और मगन हो सुन्दर भविष्य के सपने संजोने लगे। किन्तु कुछ दिन बीतने पर जनता को अपनी हालात में कोई सुधार नहीं नजर आया। जनता सवाल करती उससे पहले राजा कोई नया दांव खेल देता और जनता फिर ताली बजाने लगती। बीच बीच में कुछ काम जो पिछले राजा ने अधूरे छोड़ रखे थे उसके पूरा होते ही मुस्कुराकर खूब जनता का अभिवादन लेता था। किंतु जैसे ही जनता अब मूल्यांकन करती फिर से कुछ ऐसा कर देता की समर्थक ताली पीटते किन्तु जनता के हाल जस के तस थे। करते करते कुछ वर्ष बीत गए किन्तु जनता की हालत जस तस बल्कि और ख़राब होने लगी। जनता अपनी मन की बात कहना चाहता है लेकिन राजा झरोखे से अपनी मन की बात सुनाकर गायब हो जाता।
           किन्तु जनता सब कुछ के बाद अब भी खुश और मोहित है। उसे कर्म के फल का कोई मलाल नहीं है उसे पता है उसका राजा रात रात भर जगता है।खूब सोचता है और बाते करता है।सभी को अपनी मन की बात भी बताता है। किन्तु कुछ लोग अब पहले वाले राजा को ढूंढने में लगे है। लेकिन अब भी एक लंबी लाइन है जो "बैगपाइपर" के पीछे है। राजा एक नई धुन बजा देता और भीड़ पीछे पीछे होकर मदमस्त हो खूब ढोल नगारे पीटने लगता। दुखी और व्यथित लोगो के अब आवाज उसमे ग़ुम हो जाते।
         पहले वाला राजा अब भी उसी राज्य में है। जो कभी काम के बोझ से मुस्कुरा तक नहीं पाता था । अब कभी कभी जनता को देख मुस्कुरा देता है। जनता अब समझ नहीं पा रहा है कि यह राजा की नाकामयाबी देख कर मुस्कुरा रहा है या जनता की स्थिति देख कर...???

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-05-2017) को
    "मानहानि कि अपमान में इजाफा" (चर्चा अंक-2636)
    पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. कहानी के माध्यम से गहरा व्यंग व्यवस्था पर ... अबट ख़ूब ...

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