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Sunday, 7 August 2016

रस्मी बादल


फिर लौट आया है       
वो कारवां बदलो का,
जो रुखसत हो जाता है जाने कैसे
बिन बरसे ही इन राहों से।
नजर टिकती है हर वर्ष कि भांति
कि अबकी शायद  बरस जाये
 धो दे कहल सब अंतस के।
बहुत गरजते है सब इस मौसम में
लहलहाने को मचलता मन
सींच देगा ये अबकी बार धरा ऐसे
उर्वरकता बस लहलहा उठेगी।
शोर है , कोलाहल भी छाई है
ये मास ही है कुछ ऐसा
बोने को बीज आतुर सब
सुगबुगाहट देशभक्ति चीत्कार सी  लगती ।
बरसेंगे मन सबके, सावन के फुहारों से
कुछ कर गुजरने कि
बयार मन को लहलहा देगा।
हर बार ये ऋत कुछ ऐसा ही लगता है ,
रस्मी बादल जो न शायद बरसता है।
मिट्टी में दरारें नमीं पर प्रश्न करते
अगर बरसते बादल तो ये कैसे इतना दरकते।।
फिर लौट आया है
वो कारवां बदलो का
जो रुखसत हो जाता है जाने कैसे
बिन बरसे ही इन राहों से।      

Thursday, 26 September 2013

दूरियाँ


किसी तीली की वहां जरुरत नहीं,
दिल जहाँ लोगो के जलते है,
कौन यहाँ आग बुझाये अब,
पानी की जगह नफरत ढोते है। ।

किसी पे अब ऐतबार क्या करे,
अब सब खुद में अनजाने से है,
जिनको समझा था मददगार,
उन्ही हाथों ने आशियाने जलाएं है। ।

प्रेम से नफरते बढ़ रही है अब ,
नफरत से भी प्रेम का जूनून है,
इन्शानियत अब सरेआम चौराहे पर,
इन दोनों के बीच पीसने को मजबूर है। ।

बढती जा रही बंजर जमी में,
जज्बे दलदलों में धंस सी रही ,
दिलों की हरयाली मुरझाई सी,
नागफनी हर जगह है पनप रही। ।

कौन ये बेचता है और खरीदार कौन,
भरे बाजार में इनका मददगार कौन,
सब जान कर भी अनजाने से रहते है,
जिन्दा लाश से हर जगह दीखते है। ।