Sunday, 13 October 2013

रावण दहन


                
 स्वधर्म का बोध नहीं रहा 
बिंबों  पर कुंठा निकालते है 
कितने चिंगारी भरकाने वाले 
दशानन पर तीर चलाते है।  
पुरातन को ढोते आये  
वर्तमान को खोते जाते है 
अपने ग्रह का ध्यान नहीं 
नव ग्रह की चिंता जताते है।  
मौके की तलाश है बस 
छद्म भेष में मारीच छाये है
जलते दशानन हर वर्ष की भांति 
फिर खुद के हाथ जलने आये है। । 

------मंगलकामना एवं विजयादशमी की
 हार्दिक शुभकामनाओं सहित-------------- 

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर .
    नई पोस्ट : रावण जलता नहीं
    नई पोस्ट : प्रिय प्रवासी बिसरा गया
    विजयादशमी की शुभकामनाएँ .

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  2. बहुत सुंदर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

    आग्रह है- मेरे ब्लॉग में भी समल्लित हों
    पीड़ाओं का आग्रह---
    http://jyoti-khare.blogspot.in


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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (14-10-2013) विजयादशमी गुज़ारिश : चर्चामंच 1398 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बेहतरीन, सुंदर रचना !
    विजयादशमी की शुभकामनाए...!

    RECENT POST : - एक जबाब माँगा था.

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  5. बहुत बढ़िया कटाक्ष किया है और सटीक भी.
    अर्थपूर्ण अच्छी रचना,
    बधाई.

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