Monday, 14 October 2013

मन का आँगन

जीवन में पाने की भाग दौड़ 
या दौड़ते हुए जीवन खोने की होड़  
पता नहीं क्या ,
आज कुछ वक्त निकल आया 
जाने कैसे ,
वक्त का मै या फिर मेरा वक्त ,
दो पल चैन से गुजारूं।  
अपने मन के आँगन में 
कुछ वक्त आज मै इसको निहारूं।   
झाँका जो धीरे से 
मन के झरोखे में ,
धुंधली परत जाने क्या 
भर आया था उस कोने में। 
मटमैले  रंगों का ढेर था जमा 
कबसे न देखा उसका था निशाँ। 
खर पतवार जाने कैसे कब घुस आये थे 
इस दौड़ में कब मन से लिपट समाये थे। 
कभी इसको माँ -बाबूजी ने 
करीने से सजाया था ,
वक्त के साथ इस आँगन में झांकना 
ये भी बताया था। 
किन्तु आपा-धापी में 
ये सब छुट गया , 
इसकी स्वच्छता का ध्यान 
खुद में रखना भूल गया। 
इस गंदगी के छीटें 
सफलता से बेशक न डिगाते  है , 
औरों की बात क्या अपनों के ही नजर में  
शायद गर्त तक गिरातें है।  
सबसे पहले बैठ कर  
अब इस को बुहारुङ्गा ,
शीतल विचारो से सींच 
उसे और निखारुंगा। 
शरीर  के साथ-साथ 
मन भी स्वच्छ साफ़ रहे
समय गुजरे अपने रफ़्तार से 
इसमें झांकना निर्बाध रहे। ।  

10 comments:

  1. खुद के अंदर झांकना हमेशा ही अच्छा होता है ... मन को साफ़ रखना जीवन को प्रेरणा देता है ...

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  2. मन से निकली सुंदर और सार्थक अनुभूति
    प्रभावशाली रचना
    बधाई

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  3. मन का आत्म-प्रक्षालन बहुत जरूरी है. सुन्दर रचना.

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  4. बिलकुल सही कहा। शारीर के साथ ही मन को भी स्वच्छ रखना जरूरी है.

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आप की इस प्रविष्टि की चर्चा शनिवार 26/10/2013 को बच्चों को अपना हक़ छोड़ना सिखाना चाहिए..( हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल : 035 )
    - पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर ....

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    1. हार्दिक आभार ...

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  6. सुंदर सार्थक रचना |बहुत ही सुंदर |

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  7. गुमनाम शख्शियत की लेखनी में दम है भई !!
    प्रभावशाली !

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