Sunday 14 July 2013

फुटपाथ

नीचे जिन कंक्रीट के रास्ते पर 
दौड़ती सरपट सी गाडिया 
शायद  उनपर  चलते बड़े लोग ।   
पर ऊपर भी साथ लगा 
है कुछ का आशियाना 
संभवतः समय से ठुकराए लोग।
पेट की भाग दौड़ में 
कारो और  सवारियो की रेलम पेल में 
दिन के भीड़  में गुम  हो जाते है।
आहिस्ता-आहिस्ता सूरज खामोशी की ओर 
चका चौंध और आशियाना जगमग
कुछ कुछ रुकती रफ़्तार है ।
पसीना में भींगी दो जून की रोटी 
हलक में उतारा है गुदरी बिछा दी 
पसर गए भूल कर आज,कल के लिए।
पहुचने के वेग मन के आवेग में 
न खुद पे यकी, होश है नहीं कही
रास्ते  को छोड़ा और जा टकराया है।
नींद में ही चल दिए,कुछ समझ भी न पाया 
फुटपाथ पर ऐसे ही  जिन्दगी मौत पाया है।
आज सब कुछ कल सा ही वही दौड़ती गाड़ी
बस पसरे हुए गुदरी का रंग बदल गया है ।। 

Wednesday 10 July 2013

आज का सच ही बन्दन है

ब्यग्र मन कल की फिकर में 
आज को ही भूल गया, 
उज्वलित प्रकाश है चहु ओर फिर भी 
सांध्य तिमिर ने घर किया।।
धड़क रहा दिल  बार -बार पर 
वो स्वर संगीत न सुन सका 
कब तलक  छेड़ेगी सरगम 
फिक्र में ही बड़ता  चला।।
है बड़ी दिल में तम्मान्ना 
बौराई बादल बरसे यहाँ, 
जब चली रिमझिम फुहारे 
सर पे पहरा दूंडता फिर रहा।।  
स्वप्न में पाने की चाहत 
है नहीं किसके दिल में 
पर नींद में भी रुक न पाया  
पहली किरण की चाहत में।।
अर्थ पाने की चाहत,
खुशियो की जो मंजिले,
अर्थ का अनर्थ करते 
जब सब कुछ इससे तौलते ।।
कल तो कल था , आयेगा कल,
कल को किसने देखा है।
आज की ही दिन है बस, 
जो जिन्दगी की रेखा है।
फितरते अनजाने पल की 
है मचलती धार सी, 
तोड़ दे बंधन कब तट का 
और बह जाये जिन्दगी।।
आज खुशियों का झरना 
आज ही गिर कर संभालना 
आज ही बस दुख प्लावित 
आज ही अमृत का बहना 
आज ही दुश्मनों का वार 
आज ही दोस्तों का ढाल 
आज  का रज ही चन्दन है  
आज का सच ही बन्दन है ।।

Sunday 7 July 2013

आज रविवार है।

काश सभी को इनका आनंद ......
सूरज की किरणों का 
दीवारों पे वार 
अलसाई आँखों का 
पलकों से जदोजहज 
खुलने को तैयार नहीं 
अरे कुछ और कर इंतजार 
आज रविवार है।।


मोहे कहा विश्राम 
पर ऐसा क्यों हुआ 
जब नजर टिकी उसपे 
घडी की टिक-टिक 
जाने कैसे चल-चल 
यहाँ तक पंहुची  
क्या वो भी ठमक गई 
आज रविवार है।।

काट रहे जो पल 
या पल जिनको काट रहा 
जाने आज कहा की देहरी
हमारा रविवार कब आएगा   ....?
कदम ढूढते जाना होगा   
क्या भूख की होगी हार 
कही भूख ठिठक गयी 
आज रविवार है।।

समय के वार से
घायल कराह रहे 
हर दिन शुष्क आंतो को 
पसीने बहा कर ठंडक पहुचा रहे 
दिन न बता बुझ जायेंगे
लड़ने दे कुछ और दिन,चाहे  
आज रविवार है।। 

Thursday 4 July 2013

श्रधान्जली के मायने

                               लाल गलियारा एक बार फिर से कर्तव्यनिष्ठ के रक्त से सन गया। उदेश्य विहीन उदेश्य ने कुसमय काल चक्र के घेरे में लील कर मासूमो को अपने से दूर कर दिया। गलतिय उनसे हो गई अपने को बंधे ढर्रे में घीसी पिटी कानूनों के लकीर पर चलने का हौसला जो कर बैठे। प्रत्येक अख़बार ने अपने कागज काली कर दी। समय समय पर जो इनके समर्थन और अत्याचारों की अनगिनत कहानियो से कलमो की स्याही सुखाते रहे है।उनके कलमो  में कुछ स्याही इन समय के लिए भी बची हुई है। जो उजाड़ दिए गए शहीद का दर्ज पा गए। रशमो अदागाई में कोई कमिया  नहीं रह गई है।इस कवायद में इतने अभ्यस्त हो गए है की हर बार सिर्फ इन आतंक का शिकार होने वाले के नाम बदल जाते है बाकि सब पूर्ववत सा होता है। फिर से वही घटना स्थल का दौर , वही खामियों का विशलेषण, मुआवजे ज की घोषणा  संतप्त परिवार को दिलासा।यही तो नियति है यही तो कर्म है इन कर्मो से कैसे कभी बिमुख नहीं होते। इन आचरणों को निति नियंता ने अपने में आत्मसात कर रखा है। शायद इनके कर्मो की पूर्णाहुति इन्ही आडम्बरो से ढक दिया जाता है की इन घटनाओ का दुहराव कैसे हो जाता है इस पर इनको सोचने का वक्त नहीं मिलता या जरुरी नहीं समझते।पुनः रणनीति बनाई जाएगी ,मुख्यधारा में लेने  के लिए अनेको घोषणा का अम्बार  लग जायेगा। किन्तु साथ-साथ इनसे लड़ने के लिए तैयार बैठे जांबाजो को सद्विचार दिया जायेगा की ये भी अपने ही है कुछ समय के लिए ये गुमराह हो गए या भटक गिये है। अपने कर्तव्य के दौरान इन बातो को कभी नजरंदाज नहीं करे नहीं तो आप मानवाधिकार के उलंघन के दोषी पाये जायेंगे।लालधारियो को बेशक हम पकड़ने में अक्छम हो किन्तु आपको अन्दर करने में हमारी छमता जग जाहिर है। आखिर हमने तो आपको कहा नहीं की इस सेवा में आपकी जरुरत है आप अपनी इक्छा से आये है येही तो इसका श्रृंगार है।
                            भटक तो बहुत कोई जाते है उनको ही रास्ते दिखाने के लिए हर साल इन जम्बजो को सपथ दिलाई जाती है न की निति नियंता के अकर्मण्यता का शिकार बनने के लिए विचारणीय है। इस प्रकार से अगर इन पूंजियो को हम नपुंशक विचार और अक्छम कार्यशैली के हाथो किसी गुमराह की बलि चड़ने दे तो वो दिन दूर नहीं जब रास्ता  दिखने वाले खुद ही गुमराह हो जाये।देश के वास्तविक तान बाना कमजोड न परे इसके लिए मजबूत निर्णय सिर्फ कागजो पर न होकर वास्तविकता के धरातल पर उसका परिलक्छन दिखाई  पड़ना चाहिए।भय बिन होहु न प्रीत ऐसे ही नहीं कहा गया है।
                          अंत में उसी रश्म का निर्वाह करते हुए किन्तु दिल से मै  इस कायरता पूर्वक अंजाम दी गए घटना में शहीद हुए कर्तव्यनिष्ठ अधिकारिओ के प्रति हार्दिक संवेदना तथा उनके परिवार को इस दुःख से जल्द से जल्द उभरे ऐसा भगवन से कामना करता हु। 

Monday 1 July 2013

प्रकृति की प्रवृति

                              उत्तराखंड की तबाही दिल दहलाने वाली है। हजारो अनगिनत लोगो का  इस प्रकार काल के गाल में समा जाना सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं दिलो को झकझोरने वाला है। पल भर में भगवान के दर्शन को जाने वाले तीर्थयात्री भगवान के पास पहुच गए। जिन किसी ने  भी अपने परिचित या और भी कोई खोया सिर्फ वो ही नहीं  हर कोई इस त्रासदी  से दुखी है।इसे प्राकृतिक  घटना कहे या मानवीय भूलो भूलो की दुर्घटना, जाने वाले चले गए।सामने आई  आपदा पर जोर - जोर से चिल्लाना और फिर उतनी ही तेजी के साथ उसे भुला देना सामान्य सी आचरण हो गई है।किस-किस को कोसु किसको-किसको दोषी माने।और यही पूर्बवत सा आचरण इस के बाद पुरानी फिल्मो के प्रसारण की तरह जारी है। हर कोई दोषी को ढुंढने में लगा है। इन शोरो में हजारो दबे लोगो की चीख ,सहायता के लिए पुकारते लोगो की आवाज दब कर रह गयी है।फिर भी जो कर्मयोगी है किसी न किसी रूप में इनके पास पहुचने का प्रयास कर ही रहे है।
                                आखिर इतने बड़े विनाशलीला में किसका हाथ है। जब विनाश लीला प्रक्रति ने मचाया है तो उसमे साधरण मानव का हाथ भला कैसे हो सकता है। कुछ लोगो या ये कहे की पर्यावरण  के विशेषज्ञ ने तो सीधा मत व्यक्त किया है की हम लोगो ने अपने पर्यावरण के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ कर रखा है ये उसी का दुष्परिणाम है। अगर हमने ये छेड़छाड़ बंद नहीं किया तो आने वाले समय में और भयावह परिणाम हो सकते है। मुझे ये पता नहीं की 1  9 9 9  में उड़ीसा में 2 5 0 की मी की भी  तेज रफ़्तार से आई उस महाविनाशकारी चक्रवातीय तूफान में मानवीय धृष्टता कितनी थी जिसने कुछ ही पलो में कितने सपने  हवा के झोको में उड़ाने के साथ-साथ जल प्लावित कर दिए।बीते वर्षो में  बिहार और गुजरात में आये भूकंप यदि हमारे विकास का परिणाम है तो 1 9 3 4 ई की बिहार का भूकंप किसका दुष्परिणाम था जिसमे लिले गए लोगो का शायद सही आकड़ा भी न हो,यही स्तीथी आज भी कायम है अलग अलग कोनो से अपने अपने आकडे दिए जा रहे है।।शायद चीन अठारवी सदी में आई भुखमरी के लिए या फिर पिली नदी के बाढ  के लिए इस प्रकार विकसित हो की उसे छेड -छाड़ माना जाय  ऐसा इतिहास तो नहीं कहता। 
                                 प्रकृति सदा से शक्तिशाली है इसमें शायद किसी को संदेह हो किन्तु लगता है हमने उससे शक्तिशाली होने का भ्रम पल लिया है। और अगर विकास छेड़ छाड़ है तो क्या उत्तरांचल को वैसे ही रहने दिया जाय या फिर कश्मीर में श्रीनगर से रेल के जुड़ने को आने वाले समय की किसी आपदा का सूचक माना जाय।क्यों न सभी पहाड़ी जगह  को अन्य स्थान सम्बन्ध विच्छेद कर दिया जाय।जैसे की अंदमान निकोबार के कुछ स्थान है। जब कोयले की सीमित भण्डारण ज्ञात है तो अब क्यों न पहले की तरह लालटेन युग का सूत्रपात किया जाय। दोनों बाते तो साथ-साथ नहीं हो सकती। क्या इतनी बड़ी तबाही का कारण विकास हो सकता? ये सोचने के लिए भी तो विकास करना ही होगा।डायनासोर का इस पृथ्वी पर से अनायास विलुप्त हो जाना,कुछ तथ्यों का पौराणिक कथा में परिवर्तन हो जाना क्या मनुष्य के क्रमिक विकास से कोई लेना देना  है?आदि काल से प्रकृति की यही प्रवृति है,ज्वालामुखी की प्रकृति उसके लावा में है ,सुमद्र अपने प्रकृति से लहर को  कैसे अलग कर सकता है,नदियो का श्रींगार उसकी उफनती धारा है।ये प्रवृति तो विकास के कारण प्रकृति ने विकसित नहीं किया है। सृष्टी के आरंभ से ऐसा ही है।  सीमित और पर्यावरण संतुलित विकास का कोई नया फार्मूला जब तक इजाद नहीं होता ये क्रम तो ऐसे ही चलेगा।
                                जिन चीजो पर हमारा बस नहीं उसको किसी का कारण मानना शायद अपने आपको धोखा देना होगा। जिन के ऊपर हमारा बस है वैसे सूचना हम नजरंदाज कर गए,हमें करना क्या है वो सोचने में घंटो गुजर गए,देश के सभी नागरिक न होकर अपने-अपने प्रांतो के लोगो को फूल मालाओ से स्वागत में लग गए।संभवतः यही सोच का  विकास जहरीली लत की तरह सभी की सोच को सोख कर सारे पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है जिससे जिन्हें हम अपने बीच बचा कर ल सकते थे उन्हें भी खो दिया। हमें कोसने की बजाय हम क्या कर सकते है ऐसे आपदा के समय ये सोचने की जरुरत है। जरुरत इस बात की है सिर्फ आधुनिक उपकरण रखे नहीं वक्त से उसका सही इस्तेमाल भी हो। आपदा प्रबंधन की इकाई बना देने से सिर्फ आपदा रूकती नहीं ,आपदा होने पर उसका निपटने की छमता पे बहस करने की प्रवृति हो। हमारे एजेंसिया हमें सही हालत की जानकारी दे न की संयुक्त राष्ट्र की शाखाये हमें बताये।जब प्रकृति का आरम्भ ही  महा प्रलय से है तो भिन - भिन रूपों में वो चलता ही रहेगा बात सिर्फ इतनी है की जो हम कर सकते है वो करे या फिर किसी अन्य आपदा के लिए अभी से बहाने सोचे।  

Saturday 22 June 2013

है हमने किया, क्या गुनाह ?

है हमने किया,क्या गुनाह ?
जो नभ ने यु ठान लिया 
अमृत बरसे जिस दरिया से 
धार काल बन क्यों निगल गया ?


धरती गरजे अम्बर गरजे 
थर्राई पाषाणों की शिला 
देव भूमी के इस आँचल को 
कफ़न बना किसने है लीला ?

मलय कांति की खुसबू फैलती 
डमरू  तुरही चहुँ दिश बजती 
वो गुंजित मंगल सी ध्वनी 
         क्रंदन में कौन बदल गया ?




है हमने किया,क्या गुनाह ?
जो नभ ने यु ठान लिया, 
अमृत बरसे जिस दरिया से, 
धार काल बन क्यों निगल गया ?

पुष्प लता तरुवर से शोभित, 
मृगछाला से सदा शुशोभित, 
उस भोले के आसन प्रांगन में 
रेत पाषण कौन बिछा गया ?

कणक किरण से सजने वाले ,
अमृत वन से छाने वाले ,
इस धरा पे किसने ऐसा 
कलुषित गरल बौछार किया ?


है हमने किया,  क्या गुनाह ?
जो नभ ने यु ठान लिया 
अमृत बरसे जिस दरिया से 
धार  काल बन क्यों निगल गया ?

Sunday 16 June 2013

मंजिल की निशां नहीं बस दिल में आशाये है

क्या पाना हमें जिन राहों पर कदम बढते आये है? 
मंजिल की निशां नहीं बस दिल में आशाये है। 
न दीखता कोई दूर तलक मेरे आगे ,
फिर भी ख्वाब हमने सजाये है।
ये पत्तिया ये दबे दूब सारे ,
कर तो रहे कुछ ये भी इशारे। 
इन्ही पगडंडियो पर कोई तो है गुजरा 
जिनको इन्होंने दिए कुछ सहारे। 
इन्हें देख कर दिल में  रौशनी झिलमिलाये है। 
मंजिल की निशां नहीं बस दिल में आशाये है।।

चले हम कहा से अब कहा जा रहे है ?
उलझते सुलगते बस बड़े जा रहे है।
जिनको सुना मंजील अब मिल गई है, 
इन्ही राहो पे वो भी टकरा रहे है।
दिखा दूर झिलमिल वो मिलता किनारा 
पास आने पे खुद को  वही पा रहे है। 
पर चलने की चाहत नहीं डगमगाए है। 
मंजिल की निशां नहीं बस दिल में आशाये है।। 

ये जीवन है पथ, पथिक हम चले है, 
क्या पाना है मुझको ये द्वन्द लिए है। 
कर्तव्य पथ पर तो बढना ही होगा ,
पर पाना है क्या यहाँ कौन कहेगा ?
कदम दर कदम ख्वाहिश गहराता जाता 
किसी मोड़ पर काश कोई ये बताता।
है उम्मीद पे दुनिया बिश्वास गहराए है।
मंजिल की निशां नहीं बस दिल में आशाये है।। 

वक्त की बात


बिहार की राजनीती पर चंद पंक्तिया ........

न हमको है फायदा न उनको कोई लाभ 
फिर क्यों चले हम यु साथ साथ।।

बिहार में भले टूटी है तारे 
सभी को दिखाई देती है दरारे।। 

मगर हमारी मंजिल तो दिल्ली है यारो 
दिवालो पे लिखे इबारत खंगालो।। 

कर्म ही धर्म है सब कहते रहे है 
सेक्युलर का खेल यु ही चलते रहे है।।

अगर ये पासा अभी हम न फेके 
वो बैठे ताक में हमें नीचे घसीटे।।

इन बातो को दिल पर न रखना सदा 
वक्त को आने दो हम दिखाएँगे वफ़ा।।

कुछ दूर अलग अलग होंगी राहे 
कुछ तुम जुटालो कुछ हम बनाले।। 

फिर ये दरारे खुद मिट चलेगी 
अगर दिल्ली की गद्दी एन डी ए को मिलेगी।।

राजनीती में ये सब चलता रहा है 
वक्त की बाते है सब घटता रहा है।।


Friday 14 June 2013

आज का पल


इसी दौड़ - दौड़  के जीने का मजा है 

दौड़ने  को  न मिले मौका वो जिन्दगी सजा है ।।


जियो मस्ती में 

सीरियल को देख  के समय ना गबाओ 

कुछ समय माँ के चरणों में भी  बिताओ।।

रेत पे नंगे पाँव टहलने वाले अब भी टहलते है 

जो चैनल् में है उलझे उनका मन कहा बहलते है।।

रखने  वाले इन्टरनैट के साथ पड़ोस का भी हल रखते है 

दोस्ती निभाना जानो तो ऐसे तार  भी मिलते है।।


जिन्हें प्रकृति से प्यार है उन्हें सब याद है  

डूबते और उगते सूरज बीती नहीं ,आज की ही बात है।।

कमबख्त इस दुनिया में अभी भी बहुत मजा है 

आप लूटना न जानो तो ये आपकी सजा है।।  


पल-पल को गुजरे वक्त से जोड़ना बेमानी है 

हर पल को जो न जिए उसकी नादानी है।।


कल गुजर गए आज बस आज का ही  राज है,

जो जिए इन पलो को  वही असली महाराज है।।


Sunday 28 April 2013

मर्दित होते मान बचाये

भ्रमित मन पग पग पर है भ्रम ,
हवा दूषित आचार में संक्रमण ,
क्या घूम चला विलोमित पथ पर 
अब संस्कार का क्रमिक संवर्धन ?

पशु जनित संस्कार कुपोषित ,
सामाजिक द्व्दन्द बिभाजित ,
कानूनों की पतली चादर 
कटी फटी पैबंद सुशोभित।। 
आओ अपना हाथ बढाये 

हाहाकार मचे अब तब ही ,
नर पिशाच जब प्यास बुझाये। 
काली दर काली हो कागद ,
और नक्कारे में भोपू छाये।। 

बंजर चित की बढती माया 
काम लोलुप निर्लज्ज भ्रम साया, 
अविकारो का विशद विमंथन 
गरल मथ रहे गरल आचमन ।।

भेदन सशत्र अविकार काट हो 
शल्य शुनिश्चित चाहे अपना हाथ हो। 
हाथ बड़े अब रुक न पाए 
मर्दित होते मान बचाये ।।  

Sunday 10 February 2013

क्या करे अब वक्त नहीं पास है

कल जो बीत गए आज न कुछ हाथ है ,
ढूंड रहा परछाई पर रोशनी नहीं साथ है।
मजनुओ को जो चाहा उतार दे दरख़्त पर,
चल परा पानी सा अब स्याही सुखी दवात  है।
यही कहते अब न कोई आस है, 
क्या करे अब वक्त नहीं पास  है।।

चेहरे के  धुल  पोछकर देखना जो चाहा है 
पाया की अब आयना खुद को दरकाया है।
उनकी बाते  काँटों से चुभन देती थी
  सुनना चाहा तो हलक न कुछ बुदबुदाया है।
यही कहते अब न कोई आस है ,
क्या करे अब वक्त नहीं पास  है।।

कदम हर  कदम अब खुद से अंजान है,
मुड़ के जो देखा तो न कोई पहचान है। 
साथ भीर में चाहा तलाशे  किसी को,
न मिला सब को किसी और की प्यास  है।
यही कहते अब न कोई आस है, 
क्या करे अब वक्त नहीं पास  है।।

बहती हुई धार के मौजों  को पहचान, 
हवा के झोको से न रह अंजान, 
कोसते हुए जिन्दगी में भी क्या रखा है ?
सूखे पतों को  क्या वर्षा से आसरा  है ?
यही न कहते रहो अब न कोई आस है, 
क्या करे अब वक्त नहीं पास  है।

Saturday 9 February 2013

विचार मोदी परिवर्तित है



                 बहुत दिनों के बाद चुनावी परिद्रिश्य  से बाहर आकर किसी राजनेता का भाषन सुना। दिनाक 06.02.2013 को श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में श्री नरेन्द्र मोदी का ब्याख्यान काफी मायनों में अलग है।सामान्तया मोदी उन गिने हुए नेताओ में है जिनकी किसी भी कार्य को राष्ट्रीय मीडिया अपने सोच के अनुसार विश्लेषन करता है।मोदी एक दायरे में बांध दिए गए है और उनके किसी भी कम को एक विशेष चश्मे से देखा जाता है।मोदी अब व्यक्ति विशेष न होकर रूपक स्वरुप हो चुके है ,जिनके किसी भी बक्तब्य को उनका अपने इमेज की बदलने की कोशिश ही बतया जाता है।कोई नेता चार बार चुनने के बाद अपने इमेज को लेकर ज्यादा ही आश्वस्त होगा भला उसे क्यों बदलना चाहे। उनके विचारो का विश्लेषन बर्तमान या भविष्य को ध्यान में न रखकर हमेसा से भूतकाल में उनके विशेष योगदान के सन्दर्भ में  ही ज्यादातर विश्लेषक करने की कोसिश  करते है।

                       ये एक अजीब मानसिकता है की किसी नए विचार को समय के अनुसार बदलाब के रूप में उसका स्वागत न  कर हमेशा  से अपने सोच के रेखा अंतर्गत ही रहना चाहते है।किन्तु ये समझते नहीं की जनता की भी अपनी एक सोच और समझ होती है।जहा किताबी अवधारणा से भी परे की जीवन की यथार्त अब्धारना होती है।जिसे की मोदी ने अपने संबोधन में छात्रो के सम्मुख  रखा तथा तालियों की गरगारहट  युवा की स्वरोक्ति को दर्शाता है।समय के साथ यथार्त परिवर्तन को देश के सामने एक मौका के रूप में देखना चाहिए सिर्फ आलोचना के लिए आलोचना नहीं होनी चाहिए।इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता की मोदी के साशन कल में गुजरात की प्रगति सभी के लिए विचारनीय तथा अनुसरनीय है।कानून अपना कार्य करता है ओर अगर मोदी के खिलाफ कोई आरोप बनता है तो अवस्य ही विधि समत फैसला उनको स्वीकारना होगा।किन्तु तब तक उनके  साशन में हुए  सर्वांगीं विकास की अवधारणा जिनको की उन्होंने छात्रो के सामने रखा  उसे  अपने-आप को  ब्रांड रूप में परिवर्तन करने की कोशिश  न मानकर हमें उन्हें एक कारगर शासक मानाने से गुरेज नहीं करना चाहिए। अगर ऐसा होता तो बाल्मीकि कभी रामायण नहीं लिख पाते।साथ साथ यह भी विचार करने योग्य है की जनता से ज्यादा येपड़े लिखे विश्लेषक,चिन्तक  धर्म ,जात -पात को कही विकास के ऊपर तर्हिज तो नहीं दे रहे है। अगर किसी गलती के लिए दंड का प्रावधान है तो अच्छे  कार्यो की जमकर सराहना की जानी चाहिए।

Monday 15 October 2012

हकीकत

कालीखो से घिरे दीप को न देख
इस लौ को थोड़ा और जगमगाने दे,

दबी हुई थी हवा, अब बहक गई है    
रोक मत कदम बहक जाने दे।

ये गरम हवा का झोका ही सही,
दिलो में जमे बर्फ तो गलाने  दे।

हर रोज एक नई तस्वीर छपती है
थक जाय  नैन पर उसे निहारने दे।

 जो  ढूंडते अब  एक अदद जगह
 रौशनी से उनका चेहरा तो नहाने  दे।

न्याय की तखत पे बैठे है जो
उनके बदनीयत की बैशाखी अब हटाने  दे।

दिलो में घुट रही है धुआ लोगो के
इन्ही चिंगारी से आशियाना जलाने दे।

जो भीर रहे शासक से, सिरफिरे ही सही
नियत से क्या हकीकत तो जान लेने  दे।

Monday 8 October 2012

कई बार सोचा तुझे शब्दों में उतार दू

कई बार सोचा तुझे शब्दों में उतार दू

जिस धरा के अंग अंग में रास ही बसी  हो,
प्रेमद्विग्न अप्सरा भी जहा कभी रही हो।
फिसल परे जहा कभी नयन मेघो के,
ऐसा  रंग जिस फिजा  में  देव ने भरा हो।
बचे नहीं कोई यहाँ इसके महक से ,
कभी किसी ने  कदम जो  यहाँ  रखा हो।
इन्ही वादियों में बिखरे मनका न गूँथ सकूँ  
कई बार सोचा तुझे शब्दों में उतार दू,
लयबद्ध कर उसको विस्तार दू।।

थी खनकती तार वो जिसमे सुर संगीत है,
शब्द में न उतर सका ये वो मधुर गीत है।
वो हसीन लम्हों ने छेड़ा जो तान था ,
गुन्जनो के शोर सा  छलकता गान था।
थी हसी समा जैसे मोम से पिघल गए ,
चांदनी हसीन रात जाने कबके  ढल गए ,
जलज पात जिन्दगी कैसे स्याही सवार दू।
कई बार सोचा तुझे शब्दों में उतार दू,
लयबद्ध कर उसको विस्तार दू।।

रूप को ख्याल कर, क्या उसे आकार  दू
रूह में जो बस गए कैसे साकार  दू।
आभा उसका ऐसा की शब्द झिलमिला गए
केसुओ की छाव में नयन वही समा गए ।
चांदनी यु लहरों पे हिचकोले खाती है।
दूर दूर बस वही नजर आती है।
कायनात की नूर कैसे कुछ पदों में शार दू ,
कई बार सोचा तुझे शब्दों में उतार दू,
लयबद्ध कर उसको विस्तार दू।।

पहली बार उससे यू टकराना,
वो नजर की तिक्छ्नता पर साथ  शर्माना।
कदम वो  बडा चले पर झुक गयी नजर,
धडकते दिल की अक्स भी मुझे  दिखी जमीं पर।
भों तन गई मगर पलक झिलमिला गए,
अर्ध और पूर्ण विराम सुरमा में समां गए।
वाक्य न बन सका कैसे विराम दू ,
कई बार सोचा तुझे शब्दों में उतार दू,
लयबद्ध कर उसको विस्तार दू।।

पल पल वो पल ,पल के संग बंध गए,
छण बदलकर आगे आगे दिनों में निखर गए।
हर पल अब नजर  को किसी की तलाश था,
वो चमन भी जल रहा इसका एहशाश था।
प्यास थी अब बड़  चली दुरी मंजूर नहीं,
कदम खुद चल परे जिधर हो तेरा यकीं।
ऐसे एहशास कैसे अंतरा में बांध दू  ,
कई बार सोचा तुझे शब्दों में उतार दू ,
लयबद्ध कर उसको विस्तार दू।।

ठहर गए वक्त तब मेजो के आर पार ,
मिल रहे थे सुर दो कितने रियाज के बाद।
थी सड़क पे भीर भी और शोर भी  अजीब था ,
टनटनाते चमच्चो में भी सुर संगीत था .
और फिर साथ साथ हाथ यु धुल रहे ,
मिल गए लब भी और होठ थे सिल गए ,
उस सिसकती अंतरा को किस छंद में बांध दू  ,
कई बार सोचा तुझे शब्दों में उतार दू,
लयबद्ध कर उसको विस्तार दू।।
                                                  .

Sunday 7 October 2012

मोहताज

दो वक़्त की रोटी के लिए जो भी  मोहताज है,
उनके लिए क्या टू जी या कोयला का राज है।

महल मिला बडेरा को या नहर कोई पी  गया,
गरीब की दवा को भी कोई यु ही लिल गया।
गाय के  चारे को जो रोटी समझ के खा गये 
तोप के गोले भी जो युही पचा गए   ।।
आदर्श घर न मिल सका उसका क्या काज है,, 
दो वक़्त की रोटी के लिए जो भी  मोहताज है,
उनके लिए क्या टू जी या कोयला का राज है।।

जमी  असमान हो या   खेत खलिहान हो ,
 ताबूतो को भी ले गए या तेलगी का काम हो ।
जहा नजर घुमाये हम , ये भिखारी छा गए
इनको  देख के अब  भिखारी भी  शर्मा गए।।
सत्यम की बात हो या खेलगांव का राज है,
दो वक़्त की रोटी के लिए जो भी  मोहताज है,
उनके लिए क्या टू जी या कोयला का राज है।

रोटियो को मांगते गरीब हमने देखा है
जिनके पास कमी नहीं वो अमीर देखा है।।
ऐसे अमीर बढ गए जो मन के गरीब  है,
जिनके पास सब कुछ,पर लूट ही नसीब है।।
जनता अब जानता  है सबको पहचानता है,
पैसे वाले भूखे नंगे बेल अब मांगता है।
आज नहीं तो कल अब खतम इनका राज है,
दो वक़्त की रोटी के लिए जो भी  मोहताज है,
उनके लिए क्या टू जी या कोयला का राज है।।

Sunday 30 September 2012

तेरी दुनिया




भीर हाथ बांधे  खरी, वो परा लहू से सना
थी  निगाहें ढूंडती  सभी की,कौन है यु  परा।
न मिला एक हाथ ऐसा,जो की देता साथ,
बैचैन आंखे सभी कोई अपना न हो काश।
बच न पाया, बच ही जाता,कम्बखत जो कुछ ऐसा होता।
की लहू का रंग सबका, मजहबो सा जुदा  होता।।


तेरी बनाई  दुनिया तेरे बनाये लोग,
तेरे ही नाम से लड़ रहे और सब रहे है भोग।
है तेरी नियत में खोट ऐसा हमको लगने लगा 
भूल न जाये हम तुझे इसलिए यह इल्म दिया।
इस जहा में तेरी रचना और भी कितने परे 
पर हमें अब तू बता तेरे नाम पे कितने लड़े।।


है सभी के अब जहन में, कौन  अपना और पराया 
किसको भेजा तू यहाँ और कौन कही और से आया।
जो ना इसपे अब तू जागा ,देर बहुत हो जायेगा 
तेरी दुनिया यु रहेगी, पर कौन यहाँ बच पायेगा।
जो तेरे बन्दे न हो तो कायनात का क्या करोगो
तुम भी खुद को  ढूंढ़ते, फिर हमें ही याद करोगे।।

Tuesday 25 September 2012

फिक्स डायरेक्ट इनकम (एफ डी आई)

                          बात तो सही है अगर हरा भरा सावन सालों भर किसी के लिए है तो वो हमारा  मीडिया ही है  कभी मंदी नहीं छाता है,इनके रोजगार के लिए सरकार कोई न कोई योजना समय समय अपने पिटारे से खोलती रहती है।और ये मीडिया वाले को तो समझ तो आता नहीं बस लगते है आलोचना करने। आलोचना -समालोचना भी ऐसा की अंत तक कोई निष्कर्स  नहीं निकलता और अंतिम ओवर में निर्णय सीधे दर्शको  के हाथ में छोर देते है।अगर निर्णय ये हम जैसे ढाई आखर पड़े हुए को ही करना है तो इतने ज्ञानी जानो को बुलाने की क्या जरुरत है हमें ही बुला लिया करे।

                         अब देखिये ये एफ डी आई(फिक्स डायरेक्ट इनकम ) का क्या सुन्दर नीति लागु किया तो सभी को उसमे संशय सरकार के नियत में दिख रहा है।जिनकी नियत में खुद खोट हो उनको तो दुसरे में भी खोट नजर आएगा ही,अब ऐसे सक्की लोगो के कारण सरकार अपना राजधर्म तो छोड़ नहीं सकती।इसलिए  तुलसीदासजी ने रामायण में कहा है"जेहि के रही भाबना जैसी प्रभु मुरत देखि तिन्ह तैसी " अब बाकि पार्टियों के भावना में ही खोट है तो सरकार क्या कर सकती है। और ये समाचार प्रबंचक भी सरकार के आलोचना में अस्तुतिगान को 24x7 चलाने में लगे हुए है, समाचार पे समाचार ,सीधी बात से प्राइम टाइम और विशेस तक ये एफ डी आई का मुद्दा छ गया। आखिर अभी भी कुछ पार्टी जनता और गरीबो के हित से अपने आप को अलग नहीं रखा है,इसलिए समाजबादी हनुमान हमेसा संजिबानी लिए तैयार है आखिर इस रंछेत्र में सरकार इन्ही गरीबो के हित के कारन ही तो है। फिर ये भी तो कहा गया है "बड़े सनेह लघुन्ह पर करही।गिरी निजि सिरनि सदा त्रीन धरही।। ये गुनी ज्ञानी सरकार इस बात को समझती है तभी तो ये गरीब किसानो के लिए इतना प्रयास रत है की अपने आपको दाव पर भी लगा दी।तभी तो ये जानते हुए भी की पेड़ पर पैसा नहीं लगता ,ये  पेड़ में फल को सडा कर सीधे पैसे उगने की नीति बनाये ताकि हमारे किसान को कोई समस्या ही न रहे।इसलिये तो इस नीति को एफ डी आई(फिक्स डैरेक्ट इनकाम) की नीति कहा गया है।लेकिन बाकि सभी बिपक्छी पार्टियो को सब गलत ही दीखता है।

                     सभी चिंतित है ,पता नहीं ये सरकार  आखिर क्यों किसानो के लिए इतना परेशान है और क्यों आखिर किराने और रहरी वालो से हमारी सरकार नाराज हो रखा है।हमें तो यही नहीं समझ आ रहा है की अगर एफ डी आई  जायेगा क्या परेशानी हो जाएगी। एक महोदय का कहना है की ये किरना और रहरी वाले ख़तम हो जायेगे।अजीब बात है सरकार तो गरीबी उन्मूलन के लिए पता नहीं कितना कार्क्रम चला रही है ,नए-नए मानक तय किया जा रहा है,पर कम्बखत न गरीब कम हो रहे है और न ही गरीबी।अगर इस एफ डी आई से ये कम हो जायेगा तो इसमें परेशानी क्या है।ये तो भला हो वोलमार्ट महोदय का की उन्होंने इस महान सेवा का बीरा हमारे लिए अपने कंधो पर उठाने को तैयार बैठे है।बरना आजकल कौन से कंपनिया इस तरह के सामाजिक कार्य में अपना सहयोग देती है।ये सरकार बहुत सोच समझकर फैसला किया है क्योकि फिक्स डैरेक्ट इनकाम  (एफ डी आई) ये तो नाम से ही जाहिर है।फिर भी बे-बजह सभी गरीबी की डीग्री लिए पड़े -लिखे लोग हमारे पी एम के सर्ट उतारने में लगे हुए है।अगर इतने बड़े अर्थशास्त्री कोई शास्त्र सम्मत बात बता रहे है तो उसे समझाने की कोसिस करनी चाहिए।भाई देश में इतना अनाज हर साल होता है पर सरकार आपके घर तो रखेगी नहीं और रखने का गोदाम बना नहीं सकते क्योकि विपक्छ तो सिर्फ 2जी और कोयला कौन खा रहा है उसी के पीछे परे है ,इनको गोदाम बनाने का समय दे तब ना।कितना अच्छा सुबिचार है की ये कंपिनया गोदाम बना कर उसे जमा करेगी उससे भी नहीं होगा तो अपने देश के गोदाम में जमा कराएगी आखिर "अन्न देबो भव "बर्बाद करना तो पाप है,ये गेरुआ बस्त्र बाले भी नहीं समझ रहे।उनकी मति क्यों मारी गई।टाई सुट में जब रंग बिरंगी गाड़ियो  में सीधे खेत से सामान उठेगा तब हमारे किसान के  प्रफुलित मनोदसा को कोई समझाने की आखिर कोशिश  क्यों नहीं कर रहा? ये सब छोटे मोटे बनिया हमारी किसानो की ऊपर उठते देखना नहीं चाहते इस लिए पानी  पी कर हमारे ज्ञानी अर्थशास्त्री के पीछे पर गए। जबकि ये बार बार बताया जा रहा है की हम 1991 की हाल पर है और उस अवस्था से अभी के बजिरे आला बहार लाये थे ,अब तब से अभी तक का जमा पूंजी अगर 2जी ,कोमंवेल्थ ,कोयला में खर्च हो गया है तो कही न कही से पैसा लाना होगा न ,आखिर ये जमा भी इन्ही ने क्या था।
           आपने देखा नहीं कोमन्वेल्थ के समय किस प्रकार से झुग्गी झोपड़ी खत्म हो गया और आज दिल्ली कैसी है ,इन सब बातो को समझाते हुए भी नियत पर संदेह करे यह ठीक नहीं।जिसे घोटाले का नाम देकर बेवजह बदनाम करने की कोसिस की जा रही है ,दरअसल ये घोटाले की नीति देश के कोष को लम्बे समय तक सुरक्षित  रखने की नीति है।जिसे विशेष   परिस्थिति के लिए हर सरकार अपने समय में जारी करती है।आखिर देश का खजाना जब खाली होगा तब इसे उपयोग में लाया जायेगा,अफवाहों से बचने की कोशिस करे।ये मंत्रीगण देश की जनता को बढिया से जानती है और उनको पता है की कुछ लोगो के अत्यधिक ज्ञान की डफली जो बजाये घूम रहे है उनको फोर देंगे,आप भी भुलावे में न आये इनकी नेकनीयती पर संदेह न करते हुए समझने की कोशिश करे।

Thursday 20 September 2012

ये क्या जो गर्दिसे दीदार है।

वो  जो बैठे आसमां में, हसरतो से देख रहे,
ये क्या जो गर्दिसे दीदार है ?

बादियो से सिसकिया गूंजती है,
और उनको संगीत-उल्फ़ते आभास  है।
पेट बांधे घुटनों के बल  परे है
वो  समझते कसरतो का ये  खेल है।
वो जो  बैठे आसमां में, हसरतो से देख रहे
ये क्या जो गर्दिसे दीदार है ?

है गले तक बारिसो की सैलाब ये,
उनको मंजर सोंखिया ये झील की गहराई है।
चश्मे-शाही की बदलते सूरते भी,
हलक की प्यास बुझाते रंगीन ये जाम है।
वो जो बैठे असमा में, हसरतो से देख रहे
ये क्या जो गर्दिसे दीदार है ?

हर गली में भय का साया, निःशब्दता छाया हुआ,
वो समझते नींद के आगोश में चैन से  खोये हुए है।
रहनुमा जो मुल्क की तक़दीर पर खुद  भिर रहे ,
अमन का पैगाम भी बाटते वो चल रहे।
वो जो बैठे असमाँ में , हसरतो से देख रहे
ये क्या जो गर्दिसे दीदार है ?

कालीखो से अब यहाँ, है किसी को भय नहीं,
दूर तलक फैली हुई जो कोयले की राख है।
मुल्क की मजहुर्रियत में, मुर्दान्गिया सी छाई है 
है हलक जो खोलते भी, उनकी ही परछाई है।
वो जो  बैठे असमाँ में, हसरतो से देख रहे
ये क्या जो गर्दिसे दीदार है ?

क्या कफ़न था हमने बांधा,ऐसा हो मुल्के-वतन,
उल्फ़ते-शरफरोसों की, ये क्या इनाम है?
गोरो की उस गर्दिशी में भी, ना थी ये वीरानिया,
लुट लो मिलके चमन को,अच्छा ये अंजाम है।
वो जो बैठे असमाँ  में, हसरतो से देख रहे
ये क्या जो गर्दिसे दीदार है ?

Monday 17 September 2012

छुट गई वो मंजर पीछे ,जिसको ढूंडा करते है



छुट गई वो मंजर पीछे ,जिसको ढूंडा  करते है,
जाने किसकी खोज में हम सब आगे आगे बड़ते  है।।

खेतो की चादर सुनहरी जो लहराया करती थी,
पिली-पिली सरसों से जब  धरती यु लरजती थी।
कोयल की कु-कु की तान ,लहरों से टकराती थी,
सर सर सर सरकती बहती, हवा नहीं शहनाई थी।

छुट गई वो मंजर पीछे ,जिसको ढूंडा करते है,
जाने किसकी खोज में हम सब आगे आगे बड़ते   है।।

वो गाँव की गली संकरी जिसका कोई नाम नहीं ,
जहा द्वार पर सबका दाबा ,जहा कोई अनजान नहीं,
हर घर एक रसोई अपना,कोई चाची -ताई थी,
अपना घर क्या होता है,न कोई समझाई थी।।

छुट गई वो मंजर पीछे ,जिसको ढूंडा करते है,
जाने किसकी खोज में हम सब आगे आगे बड़ते  है।।

आम की बगिया में मंजर और टिकुला का आना  था ,
वोही अपना  राजमहल और मचान सिंघासन था।
रात-रात भर उस बगिया में सारे सपने  अपने थे ,
चंदा मामा साथ हमारे लुका छिपी खेलते थे।।

छुट गई वो मंजर पीछे ,जिसको ढूंडा करते है,
जाने किसकी खोज में हम सब आगे आगे बड़ते  है।।

अब तो  अब हम खुद से ही  अनजाने है,
रिश्ते कब के भूल गए कौन   किसे पहचाने है।
कंक्रीटो ने अब बगिया के  राजमहल को लुट लिया ,
नदिया और कोयल की बोली सबसे नाता टूट गया।।

छुट गई वो मंजर पीछे ,जिसको ढूंडा करते है,
जाने किसकी खोज में हम सब आगे आगे बड़ते  है।।

Monday 10 September 2012

खुद को बदले


पिछले दिनों  हिंदुस्तान समाचार पत्र में एक खबर प्रकाशित हुई।कुछ झारखंड के  छात्र  जो की  दरोगा के परीछा में असफल हो गए है वो धरना पर बैठे है।उनका मांग है  की अगर उनका चयन दरोगा के लिए  नहीं किया गया तो वो सभी नक्सली बन जायेंगे। आरोप है की भ्रष्टाचार तथा  त्रुटिपूर्ण प्रणाली के कारन उनका चयन नहीं हो सक।अगर वो नक्सली बन जाते है तो इसकी जिम्मेदारी सरकार  और पुलिस प्रशासन की होगी।संभवतः चयन में कुछ त्रुटी हो, भ्रष्टाचार जिस कदर मुह बाये हर जगह खरा है उससे इंकार किया ही नहीं जा सकता है।  किन्तु ये प्रबृति कुछ और ही इंगित करती है।समाज में फैल रहे असंतोष और बिघटनकारी  सोच की एक नई  प्रबृति  पनप रही है ,जहाँ  किसी भी मांग को जोरजबर्दस्ती से पाने की चाहत है।समाज  में ऐसे अक्षम सोच के लोग बड़ते जा रहे है जिनके लिए उदेश्य सरकारी नौकरी से ज्यादा कुछ नहीं अन्यथा नक्सल भी रोजगार का एक अबसर मुहैया करता है,इस बात से इत्तेफ़ाक रखते है। इनके नक्सली   बनने से किसे नुकसान होगा बिचारनिय है।
                                            
                      खैर रामचरितमानस में एक प्रसंग है "कादर मन कहू एक अघारा,देव देव आलसी पुकारा।"प्रसंग शायद अनावश्यक नहीं है।हमारी प्रवृती इस ओर ज्यादा झुकती जा रही है।नकारात्मकता का प्रभाव ज्यादा प्रभावी होता जा रहा है।भ्रस्टाचार के खिलाफ जब आन्दोलन चलाया गया तो ऐसा लगा की शायद साऱी  समस्याओ का जर ये नेतागण तथा हल सिर्फ जनलोकपाल बिधेयक है।आन्दोलन का स्वरुप से लगा की यह अंतिम समर की तयारी है किन्तु हम जहा से चले पुनः अपने आपको वही पा  रहे है।शायद अन्ना की तरह किसी और देव के इंतजार में है।और जब इस तरह के वाकया आता है तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है की अनैतिक  रूप से दबाब डाल कर कुछ पाने के चाहत समाज के प्रत्येक तबके में किसी न किसी रूप में हर जगह ब्याप्त है।प्रेमचंद ने "नमक का दरोगा" कहानी में इस चाहत को दर्शाया था की मासिक बेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते घटते लुप्त हो जाता है।जबकी उपरी कमाई बहता हुआ स्रोत है , जिससे प्यास सदैब बुझती है। यह सोच संभवतः  बढता जा रहा है। मौके की तलाश में सभी बैठे है जब तक मौका नहीं तब तक इस भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरी सिद्दत से है।यह  प्रत्यकछ  रूप से प्रशासन और सरकार  के कार्य कलाप में दिखता है क्योकि ये सभी भी इसी सोच के समाज से आते है उनसे हम बिसेस की उम्मीद करते है शायद समस्या यही है।
           
     बस्तुतः देखा जाय तो यह एक ऐसी समस्या और मानसिकता है जिसका अपने सुबिधानुसार ब्याख्या  करने की  प्रबृति  हममें  बिकसित हो गया है।कोई भी समस्या देश या समाज के हित या अनहित से  ब्याख्या नहीं की जाती बल्कि उसको ब्याख्या करने के समय हम अपने हित-अनहित,अपने बिचारधरा जातिगत ,पार्टीगत और न जाने क्या क्या हिसाब लगाने के ही बाद हम किसी राय  को कायम करते है जिसमे की देश हित का कही कोई स्थान नहीं होता किन्तु कोई भी बात देश हित के  प्राथमिकता के ऊपर प्रचारित की जाती है।सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ है किन्तु सभी के पैर में अपने अपने हित बेरी लगी हुई है जिसे खोल कर कोई भी आगे  नहीं बढना चाहता है।सही और गलत की ब्याख्य यदि युही  सुबिधानुसार की जायगी तो समस्या अपनी जगह यथावत बना रहेगा।  इसलिए  भ्रष्टाचार के बिरुद्ध अपार जनसमर्थन होते हुए भी यह अंजाम तक भी नहीं पहुच पाया है।हम  समस्या का समाधान अपनी सुबिधानुसार चाहते है।नहीं तो एक से एक घोटाले होते जा रहे है चाहे सरकार किसी की हो  कुकृत्य के लिए अलग-अलग दलील पक्ष  और बिपक्ष के द्वारा  नहीं दिया जाता।आजकल समस्या, समस्या स्वरुप न होकर बिचार्धरास्वरुप   बट गया है।हम पहले सही या गलत के ऊपर बहस न कर अपनी सोच के अनुसार उसका ब्याख्या करने में लगे है।नहीं तो अभी जिस प्रकार से कोयला घोटाले के ऊपर सभी दल अपने अनुसार इसके लिए आरोप प्रत्यारोप कर रहे है उससे तो यही लगता है की गलती को सुधारने की मनसा न होकर उसे सिर्फ दोषारोपन कर अपने को सही साबित किया जाय।आम जन भी किसी  समय अपनी  ब्याक्तिगत सोच और  विचारधारा से उपर नहीं उठ पाते  और सभी राजनीतिकदल जनता की इसी कमजोरी का फायदा उठाने में लगे है।क्योकि हमें एक के बाद एक भुलने की आदत है।
                 किसी भी  समाज की सोच,संस्कार,आचार,ब्याभहार ,प्रबृति न तो  एक दिन में बनी नहीं है और न ही ये इतनी जल्दी बदल सकती है किन्तु प्रयास तो किया ही जा सकता है।बस्तुतः भ्रष्टाचार  के खिलाफ आन्दोलन सिर्फ सरकार के खिलाफ था हम सिर्फ और सिर्फ  सरकारी काम काज से भ्रष्टाचार को  समाप्त करना चाहते है।इस आन्दोलन के संचालको के ऊपर कोई संसय न ही था और है किन्तु समर्थक की प्रवृत्ति  तथा सोच इमानदार है इसपर एक प्रश्न चिन्ह तो है ही।रामचरितमानस में प्रसंग है "जल संकोच बिकल भई मीना ,अबुध कुटुम्बी जिमी धन हिना " और जिस प्रकार सभी में धन की लालसा है वो किसी न किसी रूप में पाना चाहते है , परिस्थिति का फायदा उठाने की चाहत शायद ज्यादा है जो की इस प्रकार के आन्दोलन को कमजोर करता है।बस्तुतः भ्रस्टाचार भ्रस्ट  आचरण के साथ संधि है और आचरण क़ानूनी कम और नैतिक रूप से जयादा जबाबदेही होनी चाहिए।किन्तु इसे अभी सिर्फ और सिर्फ कानून के दयारे तक ही बहस में रखा जा रहा है। गीता में कहा गया है महापुरुष जो आचरण करते है सामान्य जन उसी का अनुसरण करते है।वह अपने अनुसरणीय कार्य से जो आदर्श प्रस्तुत करता है,संपूर्ण विश्व उसका अनुसरण करता है।किन्तु आज के परिदृश्य में ऐसे लोगो की कमी हो गई है जिनको की लोग अनुसरण कर सके।समुद्र में जब लहरे तट  की ओर आती है तो जमा मैल फेन रूप में उस लहर पर सबार होकर तट तक आता है किन्तु ये कितने दिनों से जमा हो रहा है ये पता नहीं। इसी प्रकार आज की परिस्थिति एक दिन की नहीं है ये समाज में काफी समय से चल रहे पतन और छाई हुई प्रबृति  का परिणाम है जिसे एक दिन में दूर करने की अपेछा नहीं की जा सकती है।समस्या है की मिटटी ब्याप्त जहर को दूर न  कर हम पेड में दबा दिए जा रहे है और चाहते है की हमें स्वस्थ तथा सुन्दर फल मिले।जो की संभव नहीं।हमें मिटटी में ब्याप्त जहर को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। किन्तु जिस प्रकार से अन्ना समर्थक राजनीती में आना चाहते है हम शायद ये मौका गबा रहे है।

हर कोई इस परिस्थिती से ब्याकुल लगता है और इससे निजात पाना चाहता है किन्तु किसी के इंतजार में प्रतीक्छारत है। ब्रिह्दारन्यक उपनिषद में ब्याकुल मनुष्य का बर्णन इस प्रकार से हुआ है -"कृपन मनुष्य वह है जो मानव जीबन की समस्या को हल नहीं करता और अपने आप को समझे बिना कूकर -सूकर की भांति  इस संसार को  त्याग कर चला जाता है।कम से कम हर ब्यक्ति अपने आप से ईमानदारी बरतने का प्रयास करे एक तीली प्रकाश का जलाये अपने आस पास अगर प्रकाशित कर सके तो समाज में स्वतः अँधेरा कम होगा और इस प्रकार के दिग्भ्रमित युवा शायद इस प्रकार से कृपणता वश कुछ ना मांग अपने जीवन को दिशा देने वाले एक चिराग सिर्फ और सिर्फ अपने लिए रोशन कर सके तो उससे भी इस देश का भबिष्य उज्जवल होने की पूर्ण आशा है।