Wednesday, 31 August 2016

दिल्ली और बारिश

                       
                                 क्या आप दिल्ली में रहते है ? हम तो खैर नहीं है फिलहाल वहा। तो फिर आपको दिल्ली की बारिश रुलाई या आपने रास्तो पर पटे पानी के सैलाब को स्विमिंग रोड समझ उसको पार करते  समय इंग्लिश चैनल पर विजय की खुशफहमी का अहसास किया, अगर नहीं है तो उसे कोसने की जगह नगरपालिका का शुक्रिया अदा करे और इसका आनंद ले । इन रोड पर बहते धार को देखकर भावुक होने से बचे। लगता है अपने लोगो में भावुकता की कमी हो गई है तभी तो मीडिया हमें भावुक होने के बहाने देता और खुद भी भावुक हो जाता है। पहले पत्रकारिता में भावुकता कम तथष्टता ज्यादा होता था किन्तु समय कि मांग ने लगता है कुछ प्रभाव बदल दिया है ।असहिष्णुता का राग अलापते-अलापते ये खुद कही असहिष्णु तो नहीं हुए जा रहे है। ये तो हमारे सांस्कृतिक उद्घोषणा है की हम आलोचना को अपने उत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील औजार समझते है। तभी तो कबीर ने कहा -"निंदक नियरे    राखिये " और हम है की सबके सब पीछे ही पर गए। 
                              अब ऐसा भी क्या कह दिया।  बहुत छोटा सो सवाल तो पूछा ,आखिर जब दिल्ली के रोड पानी से तृप्त हो तो भला ये जानने में कोई गुनाह तो नहीं है की आखिर पहुचने के लिए और कौन से साधन लिए गए,रोड पर कार और नाव एक साथ हो इससे सुन्दर दृश्य और क्या होगा? उन्होंने तो अगर देखा जाय तो भरतीय छात्रों के अंदर किसी भी कार्य को पूरा करने की जिजीविषा को सलाम किया। और हम है की उनकी आलोचना समझ बैठे है। लगे हाथ हमने अपने सरकारों को भी कोसना शुरु कर दिया। लेकिन हम भूल रहे है की हमारे यहाँ हर साल रूप बदल-बदल कर ये सैलाब कही न कही आता ही रहता है। कही के सड़क जाम हो जाते तो कही के कही पूरा क्षेत्र ही कट जाता। इन सबसे नीति-नियंता वाकिफ है। अब अगर वो दिल्ली को दुरुस्त कर दे फिर हम दिल्ली के बाहर वाले ही कहना शुरू कर देंगे कि हमारे साथ भेद-भाव किया जा रहा है। आखिर ऐसी परिस्थिति के दिल्ली में उत्तपन्न होने के बाद ही बाकियों का दुख-दर्द समझा जा सकता है। नहीं तो उड़न  खटोला पर बैठ का इन स्थितियों का जायजा लेने जाना पड़ता है। इससे सरकारी खजाना पर बोझ पड़ता वो अलग। दिल्ली का ये सब नजारा सरकारी धन का दुरूपयोग रोकने में मददगार है हम ऐसा क्यों नहीं सोच सकते। ताज्जुब है। हमें भी ख़ुशी होती है जब सबको एक प्रकार से देखा जाता है। और रही दिल्ली की सुंदरता की बात तो यह सिर्फ राजधानी है और हम है कि दिल्ली को "राजरानी" समझने लगे है। दिल्ली सभी को मोहती है स्वभाविक रूप से विश्व के अन्य गणमान्य भी दिल्ली के इस सुदरतम नज़ारे का आनंद लेने आ सकते है। पर्यटन विभाग को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। 
                      ऐसे मीडिया भी तो दिल्ली में बारिश न हो तब समाचार और बारिश हो जाए तो समाचार। वो तो नगरपालिका से लेकर मंत्री तक खुश होंगे की अपना मीडिया देश की आलोचना सुनना नहीं पसंद नहीं करता , नहीं तो जवाव देते या न देते कैमरा तो पीछे-पीछे तो आता ही। हम है की विश्व की महाशक्ति को अपनी तकलीफ सुना-सुना कर करार पर करार करने में लगे है ऐतिहासिक दस्तावेज की किताब मोटी होती जा रही है। अब जब अगर आप ऐसा समझते है की यह आलोचना है तो हमें तो खुश होना चाहिए की दिल्ली की इस समस्या को विश्व के महाशक्ति ने अगर खुद संबोधित किया है तो इस पर भी एक करार कर ही लेगा ताकि दिल्ली को इससे निजात मिल सके। इस पक्ष को देखने में क्या बुराई है।  बाकी जो इन सैलाब में घिरे है वो चैनलो पर ये दिल्ली जैसे निम्न कोटि का सैलाब कितना देखे। 

Saturday, 27 August 2016

दाना मांझी के बहाने



हम संवेदनशील होने का दम्भ भरते ,
पर जाने वो कब का दम तोड़ चूका है।
कभी -कभी हम दाना मांझी के बहाने
हर ओर से चीत्कार कर,
उस संवेदनशीलता की छाती पर चढ़ बैढ़ते।
इस आशा में की कही ,
इन शब्दो का प्रहार जो कुछ दिन तक मुँह बाएँ,
टीवी की ड्राइंग रूम से ,नुक्कड़ खाने तक
कुत्ते की रोती कर्कश आवाजो में भौकेगा।
शायद संवेदनशीलता जाग जाए।।
किन्तु वो तो कब का जा चूका ,
जब से दुनिया बाजार
और इंसान सिर्फ खरीदार बन के रह गया,
ये ना किसी मांझी की चिंता है
न किसी के दाना की ,
बस सरोकार इस संवेदन के बहाने
बाजारों का सांस चलते रहने की ,
बेसक उसकी कीमत
इंसानी सांस ही क्यों न हो ,
इंसान तो जाने के लिए ही आया है
बाजार का जिन्दा रहना ज्यादा जरुरी है
क्योंकि जब तक हम है
हमें बाजार की जरुरत के बारे में
घुटी में मिलाकर बताया गया है।
ऐसे कितने जिन्दा और मुर्दा लाश 
हम सबके कंधे पर रोज ही घूमता है। 
और हम सब इस इसे न देख 
बस ढूंढते की अगला मांझी
कब इस गठरी को अपने कंधे पर ले निकले 
और फिर हम संवेदना को तलाशे । ।

Wednesday, 17 August 2016

जरा हट के...

                              मैं वाकई चिंतित हूँ ,मानव को लेकर। मैं ही क्यों मुझे लगता है लगभग हर कोई चिंतित रहता है इस मानव को लेकर। खासकर बुद्धिजीवी वर्ग। चिंता के लिए बुद्धि बहुत ही आवश्यक पक्ष है। अभी तक तो पढ़ते आये थे की "चिंता से चतुराई घटे " किन्तु अब लगता है की चतुराई के साथ चिंता आवश्यक है नहीं तो पता नहीं कौन सी जमात में समझे जाएंगे। मैं उलझन में भी हूँ और असमंजस में भी। आखिर ये कुदरत की कौन सी रचना है जिसके रंगों-रोगन का कार्य आज तक बदसूरत जारी है। धरती पर जीवन के उद्भव से लेकर सिर्फ इंसान ही एक ऐसा जीव है जिसका विकास के क्रम अनवरत जारी है। बाकी सब के सब जीव बनाने वाले के काफी कृपापात्र निकले ,जिस रूप में थे आज तक उसी रूप में चल रहे है। आखिर उनके लिए भी कुछ करने को रहने दिया जाता।  मुझे पता नहीं क्यों ऐसा है जिसे ऊपर वाले की सबसे खूबसूरत रचना हम मानते ,ये कभी -कभी सबसे निकृष्ट प्रतीत होता है। आखिर ऐसा क्यों है बाकि किसी भी जीव के मूल स्वाभाव में कोई परिवर्तन नहीं है और एक इंसान है जिसकी प्रवृति बदलता ही जा रहा है। हम सृष्टि के प्रादुर्भाव से संभवतः बदलते ही जा रहे है।  क्या हमारे साथ बनाने वाले ने नाइंसाफी की कि हमें अधूरा बनाकर छोड़ दिया या और कह दिया बाकी बचा हुआ काम हम खुद ही देख ले और हम अनवरत लगे हुए है। नहीं तो इंसान के इस धरती पर कदम रखने के साथ ही आखिर किस खोज में हम बेतहासा लगे हुए है ?
                           मुझे लगता है की इस धरती पर कोई ऐसा काल नहीं रहा है जब आज के जो समस्याए मुंह बाए खड़ी  है वो नहीं रहा हो।बेसक समय समय पर उसके रूप बदलते रहे हो।  अर्थात समस्याएं हमें प्रारब्ध से मिली हुई है और ये अनवरत रहने की ही सम्भावना है। उसके अनुपात में समय समय पर बेसक फेरबदल चलता रहेगा। तो क्या इंसान इंसान ही रहेगा या और कुछ बन जाएगा।क्या आश्चर्य नहीं है कि सबसे बुद्धिमान जीव खुद को मानने वाला इंसान ,आजतक खुद से ही संघर्षरत है ? पूरी मानव समिष्टि क्या दुख की क्षीर सागर पार करने में कभी कायम होंगे या ये रूप बदल बदल कर हमें उसपर विजय पाते रहने की आत्मप्रवंचना का अवसर ही मिलता रहेगा? कही न कही मुलभुत रचना में ही कोई मूल गलतियां बनाने वाले ने जानबूझकर तो नहीं छोड़ दिया। और हम है की उसकी गलतियों को सुधारने का भ्रम पाले बैठे है और वो बैठा बैठा मुस्कुरा रहा हो। 
                            क्या ये जरा हट के भी सोचने और चिंता करने की कोई गुंजाइस है या कही मैं भी तो नहीं सोचने का भ्रम पाल रखा हूँ।     

Sunday, 7 August 2016

रस्मी बादल


फिर लौट आया है       
वो कारवां बदलो का,
जो रुखसत हो जाता है जाने कैसे
बिन बरसे ही इन राहों से।
नजर टिकती है हर वर्ष कि भांति
कि अबकी शायद  बरस जाये
 धो दे कहल सब अंतस के।
बहुत गरजते है सब इस मौसम में
लहलहाने को मचलता मन
सींच देगा ये अबकी बार धरा ऐसे
उर्वरकता बस लहलहा उठेगी।
शोर है , कोलाहल भी छाई है
ये मास ही है कुछ ऐसा
बोने को बीज आतुर सब
सुगबुगाहट देशभक्ति चीत्कार सी  लगती ।
बरसेंगे मन सबके, सावन के फुहारों से
कुछ कर गुजरने कि
बयार मन को लहलहा देगा।
हर बार ये ऋत कुछ ऐसा ही लगता है ,
रस्मी बादल जो न शायद बरसता है।
मिट्टी में दरारें नमीं पर प्रश्न करते
अगर बरसते बादल तो ये कैसे इतना दरकते।।
फिर लौट आया है
वो कारवां बदलो का
जो रुखसत हो जाता है जाने कैसे
बिन बरसे ही इन राहों से।      

Wednesday, 28 October 2015

इच्छाएं ...

आसमान की गहराई अनंत
जैसे हमारी इच्छाएं  ,
गहराते बादल बस उसे ढकने का
चिरंतन से करता विफल प्रयास
दर्शन मोह से विच्छेदित कर
आवरण चढ़ाने को तत्पर  ,
एक झोंका फिर से
उस गहराई को अनावृत कर देता।
और फिर से अनगिनत
टिमटिमाते तारे की तरह
प्रस्फुटित हो आते
कुछ नई लतिकाओं की चाह ,
जब  धीर गंभीर सागर भी
मचल जाते है चन्द्र से बसीभूत हो
तो हम तो मानव है।
सम्मोहन के लहरों 
पर सवार हो उसे पाने की प्रवृति
ही तो  प्रकृति प्रदत है ,
उत्तकंठ लालसा छदम दर्शन से त्याग 
कर्म सापेक्ष न हो 
कही अकर्यमन्यता का पर्याय तो नहीं। । 

Monday, 26 October 2015

......दरार ...

दरारें दिखती है    
दरकती और दहकती सी 
सब कुछ खामोश है ,
बस जैसे ऊपर वाष्प आच्छादित हो 
और नीचे पानी में उबाल है। 
मौन अंदर ही अंदर चीखता है 
काश कोई दिल की आवाज सुने 
किस कदर प्यासे है 
जैसे की धरती अब बंजर हो चली हो। 
आक्रोश और नफरत 
भरे बाजार बिक रहे है 
प्रेम के सौदाई ने नए मुकाम गढ़े 
और नफरत को प्रेम से दिल में बसाया है। 
हकीकत है कि चिंता के लिए 
सभी चिंतित होते है 
रहनुमाओ की फ़ौज तलाश रही है 
इन चिन्ताओ को अपने रहनुमा के लिये। 
अपने ढर्रे पे  तो जिंदगी  लौट ही आती है
कभी रुकी तो नहीं 
बस कुछ के सितारे विलीन हो जाते 
और कितनो के सितारे इसमें चमक जाते है।

Friday, 25 September 2015

अक्षर ,शब्द और हमारे मायने....

शब्द जैसे मात्र अक्षरो का समूह
अपने अर्थ की तलाश में ,
एक दूसरे से टकराते और लिपटते।
वाक्य बस शब्दों का मेल,
आगे और पीछे खोजते अपने लिए
इक उपयुक्त स्थान ,
अपने होने का निहतार्थ और पुर्णता के लिए।
किन्तु एक मात्रा ,अक्षर ,शब्द या वाक्य
सब तो अपने आप मे परिपूर्ण है,
और फिर भी बदल जाते भाव संग सार भी ,
जब समुच्चय में उपयुक्त न स्थान है।
ये तो बस कठपुतली मात्र  है,
किसी सोच और संकल्पना की
जो उभारते है बनके मात्र साधन,
किन्तु खुद झेलते है दंश 
अनर्थ के अपमान का,
त्रिस्कृत  और धिक्कार शब्दों सा । 
पूर्णता भी स्थान और संग में
अपना चेहरा बदलता  है,
अक्षर और शब्दों का विन्यास
शायद ऐसा ही कुछ कहता है।
हमारे अर्थ भी किसी के साथ होने 
या न होने के मायने तय करते है। 
एक उपयुक्त स्थान,
मानक न कोई आगे या पीछे का 
निहित जीवन ध्येय तब ही पूर्ण होते है ।

Saturday, 19 September 2015

बस सच सामने आना चाहिए.....


                   हमें खेलने की आदत है।  पता नहीं कब से सब खेलते आये है।  धर्म  से,जाति  से, क्षेत्र से, जज्बातों और न जाने कितने नए -नए खेल सामने आते रहते है और ये कहानी रोज यूँ  ही चलती जाती है।  कुछ करने के हजार बहाने है और न करने के हजार फलसफे। अब हम जैसे तो दर्शक बन बस अपनी क्षुद्र बुद्धि के अनुसार उसपर बस तालिया ही बजाते निकल जाते। इस आशा में की इस बार शायद हमारे लिए कुछ खास होगा। किन्तु क्रमिक चक्रिक परिवर्तन हमें वही लेकर खड़ा कर देता है,जहाँ से कुछ नया का भान कर हम प्रस्थान करते है ।  कुछ नया होने  का उत्साह आखिर हम किन बिन्दुओ का विश्लेषण कर के करते ये तो बस विश्लेषण का ही विषय है। लेकिन इसी बहाने कुछ नया हो जाय तो क्या छिद्रान्वेषी की भूमिका निभाए या सराहना करे  दिमाग यहाँ किंकर्त्यवबिमूढ़ हो जाता है। 
                   जिस राज को राज रखने के प्रयास कब से जारी था। उसे अब पर्दा के अंदर बेपर्द किया गया है।  आने  वाले कल में ये कितने का राज खोलेंगे ,देश और समाज के उच्चतम मानदंडो को ढ़ोते हुए कदमो को ये राज पिटारे से निकल कर कही लकवा न मार दे।  वैशाखी के सहारे इतिहास के विरासत को ढोते-ढोते थक चुके इन कदमो पर इसका प्रभाव पड़ा तो आने वाली कितनी पीढ़ी इससे प्रभावित होगी कहना मुश्किल है। खैर कुछ नया करने के लिए बिलकुल ५६ '' का चौड़ा सीना हो ये भी नहीं जरुरी है। किन्तु इन कदमो से बहुत सी छातियो में धड़कने सांय -सांय कर धड़कना शुरू कर दिया होगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सब-कुछ करने के पहले शतरंज के विसात के आदि अगली चाल से पहले कौन इतिहास के झरोखे से झांकेगा ये तो अब आने वाला कल ही बताएगा। 
                      परन्तु हमें तो बस आम जान की तरह अपने नायक के विषय में जो हकीकत है उतने से ही मतलब है। स्वभाबिक तौर पर अगर राष्ट्रनायक के विषय में कुछ दशको में गुजरे अतीत एक सच के रूप में सामने न आकर किस्से-कहानियों के रूप में वर्णन हो तो उस देश की प्राचीनतम इतिहास तो हमेशा  संदेह के घेरे में रहेगा। अतः जो भी हो बस सच सामने आना चाहिए। 

Friday, 18 September 2015

अनगढ़े पात्र

चौतरफा शोर और कोलाहल 
भीड़ भरे राहे,
रौंदते कदम व  सरपट  चक्के
अनजान से मंजिल तक,
अनगिनत ये मूक दर्शक
कतार बंद बैठे  
जाने किस इन्तजार में। 
खामोश लब याचना भरे कातर दृष्टि
उसकी ख़ामोशी उस कोलाहल में भी 
जाने कितना कुछ कहती है,
शब्दों में कुछ पनपता नहीं 
पर निगाहे चीत्कार करती है। 
खनकती है टकराकर 
जब कटोरी की दुनिया से सिक्के  
अकुलाहट भरे लब 
सूखी टहनियाँ सी
फ़रफ़राती है।  
इस रंगमंच पे गढ़े है 
ये कैसे अनगढ़े पात्र भी 
इनको देख, गढ़ने वाले भी 
शिलाओं में मुँह छिपाते है।
इन्हे देख पुनर्जन्म पे 
हम यकीं शायद करते है ,
क्योकिं प्रारब्ध का गढ़ भाव 
सब बस आगे-ही-आगे 
बढ़ते जाते है।   

Tuesday, 8 September 2015

नन्हा फरिस्ता

खामोशी चीखती है लहरों से  टकरा कर  
औंधे मुँह लेटा जैसे माँ के गोद  में 
न सुबकता न ही रोता कंकालो की बस्ती से दूर
लगता है गहरी नींद में सोता  ।

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जिंदगी खुद से शर्मसार है
मौत उसको मुँह चिढ़ाती
चिटक रही सूखे टहनियों सी
दम्भी सभ्यता के वट वृक्ष की  ।

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नन्हा फरिस्ता लहरो से खेलकर 
मुस्कुरा के चल दिया 
पाषाण ह्रदय शिलाओं को भी 
आंसुओ से तर गया। 

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कितने नींद से जागे अब 
उसे सोता सोचकर  
कई राहें अब खुल गई नई 
उन बंद आँखों को देखकर। 
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Saturday, 5 September 2015

आप सभी को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामना 


अब आडम्बर कोई नहीं,सब तेरा प्रभु इंतजार करे ,
कुछ शुक्ल नहीं दिखता बस चारो ओर अज्ञान भरे। 

कल्कि का कालिख उड़ रहा सब ओर तम  अँधेरा है,
भीग रहे कितने नयने यहाँ छाया अँधियारा गहरा  है। 

कर्तव्य का कोई मोल नहीं मोह ने सबको लीला है, 
गीता ज्ञान की बाते सिर्फ टकराती मंदिर शिला है। 

जो लाँघ चले मंदिरशाला तेरे विकृत गुणगान करे, 
चौसंठ कला नहीं कोई बस रसिया कह सम्मान करे। 
  
इस बार फिर तू आएगा हम मधुर धुन पर नाचेंगे,
कितने ही बिकल विलापो को बस कुछ पल ही  ढाकेंगे। 

अबकि आकर मुरली मनोहर कुछ ऐसा चक्र चला देना, 
शिश अलग अज्ञान का कर पुनः ज्ञान रवि फैला देना। 

Saturday, 7 March 2015

अब हम चलते है ।

कही कुछ ठिठक गया
जैसे समय, नहीं मैं । 
नहीं कैसे हो सकता
जब समय गतिशील है
फिर कैसे ठिठक गया,
अंतर्विरोध किसका
काल  या मन का ?
मन तो समय से भी
ज्यादा गतिमान है
फिर कौन ठिठका
काया जड़ या चेतन मन ?
समय का तो कोई बंधन है ही नहीं
फिर ये विरोधाभास क्यों
मन को समझाने का
या खुद को बहलाने का?
पता नहीं क्या
बस अब हम चलते है । 

Thursday, 14 August 2014

जश्ने-आजादी

भूल कर याद करना
और याद कर भूल जाना
बदलना दीवार की तस्वीर को 
या नई दीवार ही बनाना। 
कस्मे ,वादे और
सुनहरी भविष्य के सपने
यादो में धंसे शूल
और भविष्य के सुनहरे फूल। 
सब कुछ पूर्ववत सा
पहले ही जहन में उभर आता है
रस्मो अदायगी ही मान
सब जैसे गुजर जाता है। 
फिर नया क्या है
ये उमंगें कुछ-कुछ
जैसे  बनवाटी  तो नहीं। 
मर्म छूती  है कही क्या 
या महज दिखावटी तो नहीं। 
किससे ये छल 
या खुद से छलावा है। 
एक दिन की ये बदली तस्वीर 
किसके लिए ये  दिखावा है। 
यादों को जो रोज नहीं जीते 
इस दिन का इंतजार है
करने के इरादे का क्या 
जब लफ्फाजी का बाजार है। 
तालियां बजाकर कब तक 
गर्दिशों के दिन जाते है 
जूनून एक रोज का क्यों हो 
हर दिन जश्ने-आजादी मनाते है।  

Wednesday, 9 July 2014

खाली मन .....?? ?

जब यहाँ कुछ भी नहीं था 
तब भी बहुत कुछ था 
कुछ होने और न होने की 
कयास ही बहुतो के लिए
बहुत कुछ था। 
फिर मै बैचैन क्यों होता हूँ 
की अब मेरे मन में क्या है ? 
नहीं कुछ उमड़ने घुमड़ने पर भी 
कही न कही अंतस के किसी कोने में 
कुछ बुलबुले छिटक उठते है 
और अपनी नियति में 
जाने कहाँ सिमट जाते है। 
इन बुलबुले से किसी 
धार बन जाने की चाहत में 
बस बुलबुले का बनना और 
मिट कर शून्य में विलीन हो जाना    
मन में एक क्षोभ जाने क्यों 
भर जाता है।  
अनायास कितने प्रकार के 
तरंग छिटक जाते है 
कुछ समेटु उससे पहले ही 
कितने विलीन हो  जाते है।  
किन्तु एक बुलबुले में खोना भी 
कितना कुछ कह जाता है। 
शून्य सा दिखता ,शून्य को समेटे 
शायद सब शून्य है,ऐसा कह जाता है। 
बाह्य प्रकाश के पाने से 
कैसी सतरंगी छटा छटकती है 
खाली मन को भी 
उम्मीदों के कई रंग भर जाती है। 
शून्य  मन क्या शांत और गंभीर है, 
या इस निर्वात को भरने की 
झंझावती तस्वीर है ,
जद्दोजहज जारी है 
मन में कुछ नहीं होना 
क्या बहुत कुछ का होना तो नहीं है ? 

Thursday, 3 July 2014

छोटी सी ख़ुशी

                                     मैं  कभी-कभी सोचता हूँ की आखिर विकास के अवधारणा के साथ -साथ ,क्या  मन में उत्त्पन्न खुशी  के अवधारणा के साथ  कही कोई संबंध  है ? या क्या ऐसा तो नहीं की मन में उठने वाले खुशियों के तरंग  के आयाम के साथ विकास या कहे कि सुख -सुविधा के आयाम में पारस्परिक न होकर अंतर्विरोधी सम्बन्ध हो। विकास जब शारीरिक सुख सुविधाओ का अनन्य भोग देता है तब दिल के हिलोरों में ठहराव कैसे महसूस हो रहा है।क्या दोनों अलग इकाई है या एक होते भी अलग -अलग है?पता नहीं ऐसा क्या हो रहा है जिससे लगता है की परेशानी तो थी किन्तु मजा ज्यादा था। इस मजा का कोई ऐसा पैमाना नहीं मिल पा  रहा जिसपे उसे तोल सकूँ  या कोई गणितीय सम्बन्ध स्थापित कर सकूँ की पहले के असुविधा और दिल में उमंग और आज की सुविधा और घटते ख़ुशी की  तरंग को किस इकाई में विवेचन करूँ। क्या ऐसा कोई सिद्धांत है जिसपर इसका परखा जा सके?
                                   अभी-अभी कुछ दिन पहले अपने गाँव से लौटा हूँ। बदलाव बदसूरत जारी है। विकास के पटरी पर दौरता हमारा रेलवे स्टेशन प्रगति के पथ पर अग्रसर है।पटरियों ने छुद्र से अपने आपको विस्तारित रूप में परिवर्तित कर दिया है।पहले से कही ज्यादा ट्रेने अलग-अलग गंतव्य  के लिए उपलबध है। पर पता नहीं क्यों ऐसा महसूस होता है कि अब आसानी से उपलब्ध ट्रेने पहले के मुकाबले यात्रा के रोमांच को उसी अनुपात में कम कर रहा है। नहीं तो फिर  बचपन की कौतूहलता का उमंग उम्र के बढते बोझ से दब सा गया।कुछ तो ऐसा है की दोनों के बीच तारतम्य या सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा है।  ऐसा तो नहीं अज्ञान के भाव में उमंग कि लहरे ज्यादा हिलोर मारती है और ज्ञान कि बहती धार में उमंग हिचकोले खाता हुआ डूबता प्रतीत होने लगता है। कुछ तो ऐसा ही है ,नहीं तो क्यों ऐसा हुआ कि आज जब पटरियों पर दौड़ती ट्रेन प्लेटफॉर्म कि ओर अग्रसर था तो मन यंत्रवत सा सिर्फ और सिर्फ उसके आने का इन्तजार कर रहा था। पहले वाली वो घंटियों के टन -टन जो कि ट्रेन के आने कि सुचना होने के साथ शुरू होती थी और उमग और कौतुहल काले -काले धुओं  और इंजन के पास आने की तीव्रता के अनुपात में बढ़ती थी वो नदारद था। ऐसा तो नहीं कि अभी भी कुछ ऐसा महसूस करने का प्रयास कर रहा हूँ जहाँ उम्र के इस पड़ाव पर महसूस करने की चाहत बचकानी लगे। या ट्रेने की तरह तेज भागती जिंदगी  इसमें खोने या महसूस करने का अब समय ही नहीं देती। इन छोटी सी ख़ुशी और उमंग दिल में नहीं कौंधने के कारण एक ही साथ कई सवाल दिल में कौंध गए।शायद बड़ी ख़ुशी के चाह में स्वाभाविक रूप से उठने वाले छोटी -छोटी  ख़ुशी कहीं न कहीं हर कदम पर स्वतः ही दम तोड़ देता और हमें पता भी नहीं चलता। या उमंग और ख़ुशी ने अपना रूप बदल लिया हो और मैं उसे समझ नहीं पा रहा हूँ। मन कि निश्छलता प्रकृति स्वरूप न रह कर अपनी प्रकृति समय के साथ जाने कैसे बदलती है? शायद यही कहीं इसकी प्रकृति तो नहीं ?       

Sunday, 29 June 2014

आसमां से परे

आसमां से परे
एक आसमां की तलाश है, 
सुदूर उस पार क्षितिज के 
जहा धरती और गगन 
मिलने को बेकरार है।  
और जो अब तक मिल नहीं पाये 
बस और थोड़ा दूर 
न जाने अब तक कितने फासले नाप आये 
किन्तु फिर भी वही  दुरी, पास-पास है।  
और इसपर पनपते जीव ने 
उस धरती से  कांटे नहीं तो 
आसमां के शोलो को ही 
बस दिल में बसाया है। 
हैरत नहीं की उसने भी 
इन दोनों के प्यार को बस 
छद्म ही पाया है। 
प्रतीत होता है और है का अंतर 
सबने ज्ञान से अर्जित किया है, 
प्रेम की पहली परिभाषा ही 
अब यहाँ दूरियों में अर्पित किया है। 
जिसको किसी की चाह नहीं 
हर किसी ने दुसरो में वही देखा है। 
मैं  प्रेम का सागर हूँ 
बाकी में सिर्फ  नफरत की ही रेखा है। 
न देखे इस आसमां से बरसते शोलों को
या धरा पर चलते फिरते शूलों को,  
चलो इससे परे कोई आसमां ढूंढेंगे  
जहाँ धरती गगन एक दूसरे को चूमेंगे। । 

Monday, 26 May 2014

आशा भरी पहल


                              इतिहास गतिमान है। बिलकुल समय की धार की तरह। हर वक्त पल-पल का लेखा जोखा कही न कही रखा जा रहा है। अंतर बस इतना है की कुछ पल स्वर्ण अक्षरो में दर्ज होते है और कुछ के लिए बस नीली स्याही उकेड़ दी जाती है। वक्त की धूल भरी कितनी भी मोटी  परत उसके ऊपर क्यों न चढ़ जाए स्वर्ण अक्षरो में दर्ज समय अपनी चमक यो ही बिखेर देते है बाकी इतिहास के पन्नो में धूल धूसरित हो जाते है। बदले हुए स्थिति इतिहास के कई मान्यताओ को बदल कर रख देता है। पुराने पन्नो को पलटने से बेहतर है की कोई नए अध्याय की शुरुआत की जाय।उसमे दर्ज तथ्यों के ऊपर ही मंथन छोड़ या तो अब नए कायदे शुरू करने का समय है या नहीं तो कम से कम  इसे तो परखा तो जा ही सकता है। हेकड़ी भरी एक उद्घोषणा लाखो कड़ोरो के मन को आलादित कर सकता है किन्तु वो जीवन से जुड़ी मानवता के बंधन को बस तार-तार ही करती है। यूँ तो भारतीय इतिहास उन मनीषियों और मानवता के रक्षको से भरा परा है जो  सम्पूर्ण सृष्टि समुच्चय को ही अपने वाणी और कर्तव्य से उद्घोषित  करता रहा है।
                          तमाम कड़वे अनुभव के वावजूद भी नयी सुबह के उम्मीद का दामन न छोड़ने कि सोच  ही मानव समाज को एक नयी दिशा और ऊर्जा  देता है। आग्रह और पूर्वाग्रहों के बीच का कोई न कोई रास्ता तो अख्तियार करना ही होगा। असंवाद की दीर्घकालिक परिणीति सिर्फ और सिर्फ अविश्वास की खाई को और गहडा ही कर सकता है। उस अंधकूप की ओर जहाँ उम्मीद की कोई स्याह किरण भी न दिखाई पड़े , कदम बढ़ाना किसी के भी हित में नहीं होगा। अपने हितो की रक्षा और दूसरों के हितो का सम्मान ही इस देश की युगो पुरानी परमपराएँ है। बदलती मान्यताओ के साथ भी हमने अपने परम्परा को कायम रखा है। एक नयी पहल एक नए युग का सृजन कर सकता है। भविष्य के गर्भ में छिपे परिणाम को अभी तो जानना कठिन है किन्तु यदि नेकनीयत से कोई भी कदम उठाया जाता है परिणाम सकारात्मक होते है। विगत अनुभव अवश्य ही ऐसे विचारो के ऊपर ग्रहण लगते हो किन्तु अपनी ओर  से एक पहल सामने वाले को पुनः एक बार सोचने को मजबूर तो करेगा। इतिहास इस बात का साक्षी है की युद्ध की अंतिम परिणति भी शांति के के मेज वार्ता पर ही हुई है। फिर कदम को उतना बढाने से पूर्व क्यों न एक बार पुनः मिल बैठ कर प्रयास किया जाय। बेसक ये अतिश्योक्तिपूर्ण हो किन्तु कितना अच्छा हो यदि मानव सीमा से आजाद हो पाते। 

Saturday, 24 May 2014

सब भरा-भरा है----

ये तो पूरा भरा है . . . 
                   हाँ अब हमें भी पता चल गया है। सब कुछ भरा -भरा सा ही है। अभी तक नैराश्य भाव से ग्रसित था मैं और पहली बार पता चला की अरे गिलास तो आधा नहीं पूरा ही भरा है। आधा पानी से और आधा हवा से। इस दर्शन ने सब कुछ देखने और समझने की शक्ति में जैसे अकस्मात  परिवर्तन कर दिया । मैं अब दुखी हूँ उन लोगो के लिए जो इस दर्शन से अपने आपको आत्मसात नहीं कर पाये है। अचानक लगता है जैसे कितना कुछ बदल गया है। कल तक इन विभिन्न विकास के आकड़ो पर नजर डालता तो देश की शासन व्यवस्था पर मन में सवालिया प्रश्न  हिचकोले लगाने लगते। वंचितो के समूह का तात्कालिक दायित्व से इतर सभी कुछ  संचितो के लिए विशेष रूप से किया जा रहा है ऐसा ही लगता था।किन्तु अब स्थिति में परिवर्तन सा हो गया है। अभी तक के सरकार को कोसने के सिवा और कोई भी रचनात्मक सोच मन में नहीं उठते थे। किन्तु अब सभी पूर्व सरकारों के पूर्वाग्रह से मैं अपने-आपको मुक्त महसूस करने लगा हूँ। मन कितना हल्का सा लगने लगा है। 
             अब देश के अंदर निरक्षर और साक्षर से लगता है लोग बस खेल रहे है। आखिर ये समझ में क्यों नहीं आ रहा है की देश की ७०% जनता का मस्तिष्क यदि किताबो के पन्नो से भरा हुआ है तो बाकि बचे हुए जनता ने किताबी पन्नो से इतर प्रत्येक दिन के जद्दो-जहद भरी विषय के पुस्तक और आखर इन मस्तिष्क में बिठा रखे है। किताबी ज्ञान से भरी जीवन  से बेहतर है सांसारिक ज्ञान को जीवन में उतारा जाय। क्या  बेमतलब के प्रश्नचिन्ह कुछ लोगो ने अपनी शिक्षा व्यवस्था खड़ा कर रखा है? इन आकड़ो को अब बदलना चाहिए। हम सौ फीसदी साक्षर है कुछ किताबो में छपे अक्षरो से और कुछ जीवन के घिसने से बने अक्षरो से। इन फलसपों को पता नहीं पूर्ववर्ती सरकार क्यों नहीं समझ सके। आने वाला कल पता नहीं गरीबी रेखा के नीचे रहने वालो के साथ कौन सा दर्शन  पेस करे। आधी रोटी से पूरी रोटी तक पहुंकते-पहुँचते पिछले सरकार के कितने सांसद संसद के दहलीज छोड़ जाने कहा पहुंच गए। किन्तु अब तो आधी रोटी के लिए बेचैन लोगो को वो भी मिलेगा या नहीं ये कहना दुश्वर है। कही ये धारणा  योजनागत रूप न ले बैठे की जिनका पेट रोटी से नहीं भरा हुआ है उसमे अंतरियाँ  और हवा तो भरे  है। फिर रोटी कि क्या आवश्यकता है ?
         समस्या कही कुछ नहीं है। बस नजरिया ही एक समस्या है। दर्शन जीवन का अंग है। इससे रूबरू होते ही कितनी छोटी-बड़ी समस्या अपने -आप दूर हो जाती है। इसका अनुभव अब मुझे होने लगा है। सब जस के तस होने के वावजूद भी फिजा में लगता है रूमानी ख्याल तैरने लगे  है। हम भी इसमें डूबने-उतरने लगे है।  अपने वृहत अध्यात्म और दर्शन के ज्ञान-कोष पर संदेह हो रहा है। ऐसे तो पढा नहीं है।  किन्तु मुझे दुःख बस इस बात का है कि जीवन दर्शनयुक्त  ये गूढ़ बाते अभी तक किसी मास्टर ने क्यों नहीं समझाया।   गंगा की सफाई के लिए तो नए प्रोजेक्ट बन जायेगे किन्तु मैल से पटे दिमाग को स्वच्छ करने के लिए कौन से आयोग का गठन किया जाएगा ये देखना अभी बाकी है। जो समस्या में समस्या नहीं बल्कि उसका हल देखे। काश आधा भरे ग्लास में आधा हवा कॉंग्रेस ने देखा  होता तो शायद आज ऐसी दुर्गति न होती। किन्तु अब लगता है उन्हें भी सब सही दिखने लगा है।अगर नहीं तो कोई नया नजरिया पेश करे। 

Wednesday, 21 May 2014

उफ़ ये गर्मी .....

                             सुबह का समय ब्लॉग पर बैठने का उपयुक्त लगता है। मौसम में तल्खी थोड़ी कम होती है। हलकी -हल्की संवेदना भरी हवा दिमाग को थोड़ी ठंडक और राहत पहुचाती है। किन्तु अब जैसे लग रहा चुनाव के ज्वार से निकलने के बाद भी तापमान शेयर बाजार में उछाल की तरह जारी है। सारे इंसानी इंतजामो पर मौसम ने अपना रंग चढ़ा रखा है। तापमान भी शायद इन परिणामो से उत्साहित होकर कुलांचे भड़ने को बैचैन दिख रहा है। समझ नहीं पा रहा हूँ कि इसके लिए किसपर नजर टिकाऊ। ऊपर वाले कि कुदृष्टि समझूँ इसे या जमीन पर रहने वाले विभिन्न  पेशेवर लोगो कि दूरदृष्टि, द्वन्द कायम है। ऐसे तो सारे कारणों  में से एक कारण बहुत ही आसान दीखता है क्यों न इसके लिए भी पूववर्ती सरकार को ही जिम्मेदार मान लिया जाय।  घर तो खैर घर है जहाँ बहुत प्रकार के इंसानी मरहम उपलब्ध है किन्तु खुला आसमान आकर्षित नहीं कर रहा है। मुक्ति की तमाम आग्रहों के बावजूद भी लगता है कही कैद हो जाना ही बेहतर। उधर मौसम बिभाग ने भी रस्म अदायगी करते हुए बता दिया है। फुहारे पड़ने में अभी लगभग पंद्रह दिन का वक्त है। इतने दिनों तक अभी कितने लोग जल-जल जिएंगे कहना मुश्किल है। चुनाव में जले और भस्म हुए के लिए वो मानसून कोई नया जीवन दान दे पायेगा  या नहीं ये कहना तो मुश्किल है। किन्तु जिसको सिर्फ ताप लगा वो अवश्य ही बूंदो में अपने संताप के डुबोने का प्रयास तो  कर ही  सकते है। जो इनसे इतर है वो इसके श्रृंगार से खुद को सुशोभित करने को आतुर तो होंगे ही। 
                          बहुतो के लिए प्रचंड ऊष्मा के तल्ख़ तेवर अब भी मन मष्तिष्क में  शीतोष्ण प्रभाव कायम रखे होंगे। चेहरे पर छाई भावना की भावुकता युक्त लहर में बह कर इस गर्मी में भी ताल तालिया में डुबकी का आनंद महसूस कर रहे होंगे। दिक्कत बस उनके किये है जो अपने जीवन दर्शन में भावना में बहना मनुष्य की कमजोरी समझते है और कमजोरी से निजात पा कर लू से टकरा-टकरा कर हौसला कायम रखे है। किन्तु भावना प्रधान देश के नागरिको के लिए ही छह ऋतुओ का सौगात है। प्रचंड तीखी धुप में मन -मस्तिष्क पर अपना नियत्रण रखने का अभ्यास  ही तो हमें ऐसे पांच वर्षीय आयोजन में उठते ताप को सहन करने का क्षमता प्रदान करता है। 
                  अब खिड़की से आने वाली हवा साँप की तरह फुफकार छोड़ रही है। बेहतर यही लगता है कि फुफकार डस ले उससे पहले उनका रास्ता बंद कर दिया जाय। किन्तु हम अपने आपको को कहा तक बंद रख पाएंगे ये तो पता नहीं । कही प्रकृति ने ये मौसम इस लिए भी तो नहीं बनाया कि स्वछंद उन्मुक्त विचार के हिमायती मानव मस्तिष्क कभी-कभी बंधन को महसूस करे  और इसका अभ्यास भी कायम रहे। खैर इससे पहले की ये फुफकार किसी को डसे हम तो यही आशा करते है कि जल्द ही खुला आसमान श्वेत -श्याम चादरों से ढक जाए और दिल खोल कर बुँदे नाचे।  जिसमे भीगकर प्रकृति के गर्मी और मानव ताप किसी में भी झुलसे लोगो के दिल में ठंडक पहुंचे।     

Saturday, 17 May 2014

ये परिणाम क्या कहता है

                                     लोकतंत्र के महापर्व का फैसला आखिर आ गया। अंतिम परिणाम कुछ स्वाभाविक के साथ-साथ अप्रत्याशित भी है। किसी भी देश का जनादेश देश की दशा तथा दिशा तय करने के लिए ही होता है। किन्तु इस बार का जो परिणाम आया है उसको देख के तो   यही लगता है की यह देश की इतिहास को भी दिशा व् दशा देगा। यह अब जाता रहा है की जनता अब किसी के लिए कोई किन्तु परन्तु नहीं छोड़ना चाहती है।   पिछले एक दशक के जनतांत्रिक आकड़ा ये कहता है  की विभिन्न मोर्चे पर अनिर्णय की स्थिति का कारण जनता के  ही   निर्णयों पर थोप दिया जाता है। अब जनता  परिणाम चाहती है  इसलिए   उसने मोटे-मोटे अक्षरो में परिणाम दीवारो पर लिख दिया है। आकांक्षा के अनुरूप सम्पूर्ण समावेशित विकास की गाडी यदि पटरी पर नहीं दौड़ती है तो उसे पुनः उसके हाथो से लगाम खिंच लिया जाएगा।
                      ये परिणाम साफ-साफ़ कहता है की अब जनता बेकार की लफ्फाजी से ऊब गई है। मुद्दो से हटकर मुद्दे बनाने की राजनितिक दलों की आदत से भी अजीज आ गई है।  उसने हर एक की बात को बड़े ध्यान से देखा और सुना है। किसी भी देश की विकास इतिहास के विभिन्न मोड़ पर थमती और सुस्ताती है जहाँ से यह निर्णय इतिहास के पन्ने में दर्ज होता है की अब कारवां किस राह तय करेगा। यह परिणाम इतिहास के एक ऐसे मोड़ को दर्ज करेगा ,जहाँ से देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के एक नए युग का सूर्योदय दीखता है। यह जनता में जागृत एक ऐसी प्रवृति को वयक्त करता है कि वह मात्र वोट का प्रतिक भर नहीं बल्कि ये निर्णय लेने में अब सक्षम है कि भावनात्मक बातो की जगह अब कार्यात्मक बातो के के ऊपर दृष्टि उसने आरोपित कर दिया है। अब दिल ही नहीं बल्कि दिमाग लगाने का समय आ गया है। 
                  आजादी के बाद से ही बिभिन्न चले सामाजिक और राजनितिक आंदोलनों ने बेशक अनेक उपेक्षित और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में राजनैतिक चेतना जो जगाया उसका स्थान इतिहास में योगदान के रूप में दर्ज तो अवश्य होगा। किन्तु उस उपलब्धि को कुछ ही लोगो के द्वारा  हर बार सिर्फ चुनावी फसल काटने भर से वो वर्ग का उथ्थान हो जाएगा ऐसा नहीं है और उसे पहचान कर उससे ऊब चूँकि  जनता ने उन आंदोलनों के जमात को नकार दिया है। ये परिणाम  स्पष्ट रूप से उन हासिये पर रहे वर्गों की भी उद्घोषणा है कि अब सांकेतिक सक्ता से कुछ नहीं होगा। जमीं पर उस उपलब्धी को परिलक्षित करना होगा। जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के उथ्थान का कारण बन सके।  पहली बार किसी गैर कांग्रेसी पार्टी को जनता ने इस प्रकार का बहुमत दिया है। सेंसेक्स की उचाई कितनी भी छू ले एक राष्ट्र के स्तर पर दुर्भाग्य होगा जो एक भी व्यक्ति को एक साँझ भूके पेट सोना पड़े। मंगल की यात्रा पूरी भी हो तो भी अभिशाप है कि देश में एक भी निरक्षर रहे। समस्या कि फेहरिस्त बेसक लंबी हो किन्तु काम  करने कि मंशा और उसके लिए अपेक्षित पुरुषार्थ यदि किया जाय तो कोई भी समस्या ऐसा नहीं जिसका निदान नहीं हो। जनता ने उसी भरोसे और विश्वास को चुना है। 
                ये परिणाम साफ़ -साफ ये दिखाता है कि बीते कल राजनैतिक सोच और शैली को अब बदलना होगा। बाते अब सिर्फ और सिर्फ तरक्की और विकास कि होगी। नकारात्मक सोच को त्याग कर अब सकारात्मकता कि ओर सभी को कदम बढ़ाना होगा। यदि जो भी पार्टी इस पर खड़ी नहीं उतरती है जनता उसे इतिहास का हिस्सा बनने को बाध्य कर देंगे।आज जिस पार्टी पर जनता ने अपना भरोसा जताया है ,उसे उस जन-आकांक्षाओं पर उतरने का प्रयास अवश्य ही करना होगा ,नहीं तो वे भी गद्दी  से उतार दिए जाएंगे।  अब राजनैतिक पार्टियों को अपना एजेंडा फिर से सेट करना होगा क्योंकि इस परिणाम के द्वारा जनता ने सभी के लिए अपना एजेंडा तय कर दिया है।